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Open-Source AI को सारे टेक लीडर कर रहे सपोर्ट, यह क्या होती है?

Open-Source AI: Open-Source AI मॉडल पर रेगुलेशन को लेकर छिड़ी बहस के बीच टेक लीडर्स ने एक पब्लिक लेटर लिखा है. इसमें Open-Source AI पर प्रतिबंध न लगाने की मांग की गई है.

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  • टेक्नोलॉजी दिग्गजों और कंपनियों ने ओपन-सोर्स एआई का समर्थन किया।
  • अमेरिकी सरकार से इस पर पाबंदी न लगाने की अपील की।
  • ओपन-सोर्स एआई मतलब कोड सार्वजनिक, इनोवेशन, प्रतिस्पर्धा बढ़ाता है।
  • उद्योग ने सरकारी चिंताओं पर इसके फायदे और समाधान बताए।

Open-Source AI: माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला के बाद ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन और दुनिया के पहले ट्रिलेनियर एलन मस्क ने भी Nvidia की ओपन-सोर्स एआई की पहल का समर्थन किया है. कई टेक लीडर्स और कंपनियों ने मिलकर अमेरिकी सरकार से ओपन-सोर्स एआई मॉडल्स पर पाबंदी न लगाने की अपील की है. एक पब्लिक लेटर में इन्होंने लिखा कि ओपन-सोर्स मॉडल्स पर पाबंदी लगने से इनोवेशन की रफ्तार कम हो सकती है और इससे कंपीटिशन कम होगा. साथ ही ग्लोबल एआई रेस में अमेरिका पीछे रह सकता है. आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि ओपन-सोर्स एआई का क्या मतलब है और कंपनियां इसका समर्थन क्यों कर रही हैं.

Open-Source AI का क्या मतलब?

ओपन-सोर्स सॉफ्टवेयर की शुरुआत 1980 और 90 के दशक के फ्री सॉफ्टवेयर मूवमेंट से हुई थी. इस मूवमेंट के फाउंडर का मानना था कि सॉफ्टवेयर बनाने और यूज करने वालों के पास 4 राइट्स हैं. इनमें प्रोग्राम रन करना, स्टडी और मॉडिफाई करना, ऑरिजनल सॉफ्टवेयर की कॉपीज डिस्ट्रीब्यूट करना और मॉडिफाईड वर्जन्स की कॉपी डिस्ट्रीब्यूट करना. इसके लिए सबसे जरूरी चीज थी कि प्रोग्राम का सोर्स कोड पब्लिकली अवेलेबल होना चाहिए. यही कॉन्सेप्ट ओपनसोर्स एआई का है. ओपन-सोर्स एआई का मतलब ऐसे सिस्टम से है, जिसके कोड, मॉडल वेट और ट्रेनिंग डेटा जैसे कंपोनेंट पब्लिकली अवेलेबल होने चाहिए ताकि कोई भी इन्हें यूज, स्टडी, मॉडिफाई और डिस्ट्रीब्यूट कर सके.

एनवीडिया की पहल पर साथ आईं कंपनियां

Nvidia के सीईओ Jensen Huang ने एक्स पर एक पब्लिक लेटर पोस्ट किया था. इस पर माइक्रोसॉफ्ट, मेटा, आईबीएम, डेल टेक्नोलॉजीज, पलांटिर, हगिंग फेस, मोजिला और मिस्ट्रल एआई समेत कई कंपनियों के प्रमुखों के साइन थे. इनमें गूगल के सीईओ सुंदर पिचई, गूगल डीप माइंड के सीईओ डेमिस हस्साबिस, मेटा सीईओ मार्क जुकरबर्ग, आईबीएम के सीईओ अरविंद कृष्णा आदि कई बड़े नाम शामिल हैं. इस लेटर पर ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन के भी साइन थे. उन्होंने इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि मैं चाहता हूं कि ओपन-सोर्स और प्रोपराइटरी मॉडल्स की रेस में अमेरिका जीते. इस लेटर में अमेरिकी सांसदों से ओपन मॉडल्स पर रोक न लगाने की अपील की गई है. बता दें कि यह लेटर ऐसे समय सामने आया है, जब दुनियाभर में इस बात पर बहस छिड़ी हुई है कि क्या ओपन-सोर्स मॉडल्स पर प्रोपराइटरी सिस्टम की तुलना में ज्यादा पाबंदियां लगानी चाहिए.

Open-Source AI का सपोर्ट क्यों कर रही हैं कंपनियां?

दरअसल, एडवांस्ड एआई मॉडल्स के मिसयूज और साइबर सिक्योरिटी को लेकर चिंताओं के बीच अमेरिकी सरकार कड़े नियम लाने पर विचार कर रही है. कई सांसदों ने "किल स्विच" जैसे भी सुझाव दिए हैं, वहीं ट्रंप प्रशासन भी चाइनीज ओपन-सोर्स एआई डेवलपर्स पर प्रतिबंध लगाने का विचार कर रहा है. लेटर पर साइन करने वाले टेक लीडर्स और कंपनियों का कहना है कि ऐसी चिंताओं के समाधान के लिए ओपन-सोर्स एआई पर बैन लगाने की बजाय लीगल और कमर्शियल उपाय देखने की जरूरत है. गूगल डीपमाइंड का कहना है कि स्ट्रॉन्ग और सिक्योर ओपन इकोसिस्टम होना जरूरी है ताकि दुनिया को एआई का फायदा मिल सके. लेटर में यह भी कहा गया है कि क्लोज्ड मॉडल पर भरोसा करना भी पूरी तरह सेफ नहीं है. इन मॉडल्स को मिसयूज किया जा सकता है.

Open-Source AI के फायदे क्या हैं?

  • एक्सेसिबिलिटी- Open-source AI को एक्सेस करना आसान है. छोटे बिजनेस या कम एक्सपर्टीज वाली कंपनियां भी इसे आसानी से यूज कर सकती हैं.
  • कोलैब्रेटिव इनोवेशन- डेवलपर, रिसर्चर और कंपनियां आदि सब मिलकर एआई टेक्नोलॉजी को बेहतर बनाने के लिए काम करते हैं.
  • कीमत भी कम- ओपन मॉडल यूज करने के लिए पैसे देने की जरूरत नहीं होती. इससे कंपनियों के लिए अपने मॉडल बनाने सस्ते हो जाते हैं.
  • कस्टमाइजेशन- ओपन-सोर्स मॉडल को आप अपने हिसाब से कस्टमाइज कर सकते हैं. 
  • ट्रांसपेरेंसी- ओपन-सोर्स एआई मॉडल के सारे कंपोनेंट पब्लिकली अवेलेबल होते हैं, जिससे ट्रांसपेरेंसी बढ़ती है.

Open-Source AI की चुनौतियां क्या हैं?

फायदों के साथ-साथ ओपन सिस्टम की चुनौतियों पर नजर डालना भी जरूरी है. ओपन-सोर्स सिस्टम के लिए रिस्पॉन्स टाइम फिक्स नहीं होता. यानी कोई इश्यू आने पर यह पता नहीं चलता कि इसे कब तक फिक्स किया जा सकता है. इसके अलावा मिसयूज होने का खतरा बना ही रहता है.

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इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन से पढ़ाई पूरी करने के बाद पिछले एक दशक से मीडिया इंडस्ट्री में सक्रिय हूं. फिलहाल एबीपी न्यूज के साथ काम कर रहा हूं और यहां टेक्नोलॉजी से जुड़ी खबरों, गैजेट्स, ऐप्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सोशल मीडिया और डिजिटल ट्रेंड्स पर लिख रहा हूं. फ्यूचर टेक, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और तेजी से बदलती डिजिटल दुनिया से जुड़े टॉपिक्स में विशेष रुचि है. पिछले 10 वर्षों में नेशनल, पॉलिटिक्स, इंटरनेशनल, ऑटो, बिजनेस और टेक समेत कई बीट्स पर काम करने का अनुभव रहा है. इस दौरान टाइम्स इंटरनेट, दैनिक जागरण और न्यूजबाइट्स जैसे कई मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला. 

विभिन्न बीट्स पर काम करने के अनुभव ने खबरों को अलग-अलग नजरिए से समझने और पेश करने की समझ दी. रिपोर्टिंग और कंटेंट लिखने के दौरान हमेशा कोशिश रही कि खबरों को आसान और भरोसेमंद तरीके से रीडर तक पहुंचाया जाए. 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान ग्राउंड रिपोर्टिंग करने और कई नेताओं के इंटरव्यू लेने का भी अवसर मिला. 

काम के सिलसिले में कई बड़े कार्यक्रमों, प्रेस कॉन्फ्रेंस और विशेष आयोजनों को कवर करने का मौका मिला, जहां अलग-अलग पहलुओं को समझने का अवसर मिला. डिजिटल मीडिया के लगातार बदलते दौर में नई चीजें सीखने और खुद को अपडेट रखने की कोशिश रहती है, ताकि कंटेंट को बेहतर और रीडर के समझने के लिए आसान बनाया जा सके.

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