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Cyber Attacks in India: साइबर सिक्योरिटी के मामले में भारत की रैंकिंग कितनी, इस मामले में अमेरिका-यूरोप हमसे कितने आगे?

Cyber Attacks in India: क्या भारत टियर-1 रैंकिंग के बावजूद साइबर हमलों से सुरक्षित है? कागजी और जमीनी हकीकत के बीच कितना है फर्क जान लीजिए सिर्फ क्लिक में.

Cyber Attacks in India: इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन (आईटीयू) के ग्लोबल साइबर सिक्योरिटी इंडेक्स (जीसीआई) 2024 में भारत को शीर्ष टियर 1 यानी रोल-मॉडलिंग देशों की श्रेणी में रखा गया था, जहां भारत ने 100 में से 98.49 का अच्छा स्कोर हासिल किया था. कानूनी, तकनीकी और संगठनात्मक मोर्चों पर कड़े कदम उठाने के कारण कागजी तौर पर भारत दुनिया के शीर्ष 10 देशों में शुमार है.

वहीं, इसके उलट वर्ल्ड साइबर क्राइम इंडेक्स और अन्य वैश्विक रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत साइबर क्रिमिनल्स के निशाने पर रहने वाला दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश भी है. जमीनी स्तर पर हर हफ्ते भारतीय संगठनों को औसतन 3000 से अधिक साइबर हमलों का सामना करना पड़ता है. 

सीबीएसई के पोर्टल में सेंध

भारत की डिजिटल सुरक्षा की इस जमीनी हकीकत और बुनियादी कमियों की पोल तब खुल गई जब हाल ही में सीबीएसई के री-इवैल्युएशन पोर्टल पर मैलिसियस अटैक हुआ. इस साइबर हमले के कारण पोर्टल के पेमेंट गेटवे में सेंध लगी और लगभग 50 छात्रों को सिस्टम का अनऑथराइजड एक्सेस मिल गया. जिसके कारण पोर्टल पर फीस की राशि में भारी गड़बड़ी देखने को मिली, जहां प्रति विषय फीस 1 रुपये से लेकर 68000 रुपये तक दिखाई देने लगी.

वहीं, इससे पहले एक 19 वर्षीय एथिकल हैकर ने भी सीबीएसई के ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) पोर्टल में हार्डकोडेड मास्टर पासवर्ड और कमजोर लॉगिन सिस्टम जैसी बेहद गंभीर खामियों का खुलासा किया था. हालांकि बोर्ड ने लाइव डेटा लीक से इनकार किया है, लेकिन इस घटना के बाद केंद्र सरकार को तुरंत आईआईटी मद्रास और आईआईटी कानपुर के एक्सपर्ट्स को सिस्टम के टेक्निकल ऑडिट और सुरक्षा को मजबूत करने के लिए तैनात करना पड़ा. इस घटना से पता चलता है कि हमारे महत्वपूर्ण सरकारी और शैक्षणिक डेटाबेस कितने सेंसिटिव हैं.

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अमेरिका और यूरोपीय देश कितने एडवांस?

साइबर सुरक्षा के कड़े नियम और नई टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के मामले में अमेरिका और  यूरोपीय देश भारत से काफी आगे हैं.

बजट और एडवांस्ड इंफ्रास्ट्रक्चर: अमेरिका जो जीसीआई में पहला स्थान रखता है और ब्रिटेन जैसे देश अपने कुल आईटी बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा केवल साइबर सुरक्षा और एआई से चलने वाले डिफेंस सिस्टम पर खर्च करते हैं. 

कड़े डेटा कानून: यूरोप का जीडीपीआर (जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन) दुनिया का सबसे सख्त डेटा प्राइवेसी कानून है. वहां डेटा लीक होने पर कंपनियों पर भारी जुर्माना लगता है, जिससे वे सुरक्षा से समझौता नहीं करती हैं. 

जमीनी जागरूकता: पश्चिमी देशों में सरकारी विभागों से लेकर छोटे व्यवसायों तक जीरो-ट्रस्ट सुरक्षा आर्किटेक्चर और सिक्योर कोडिंग को अनिवार्य माना जाता है. इसके उलट, भारत ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट(डीपीडीपीए) जैसे कानून तो बनाए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कड़ाई से लागू होना अभी बाकी है.

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​खबरों के खेल को समझना और उसके पीछे छिपे हर पहलू की नब्ज पकड़ना मेरी खूबी है और जुनून भी.दुनिया को करीब से जानने और जियोपॉलिटिक्स जैसे गंभीर विषयों पर लिखने-पढ़ने के कीड़े ने स्कूल के दिनों में ही काट लिया था. इस सफर की शुरुआत कानपुर के केवी ओईएफ से स्कूलिंग के बाद हुई, जिसे रफ्तार मिली पूरब के ऑक्सफोर्ड वाले तमगे से लैस इलाहाबाद विश्वविद्यालय से, जहां मैंने अंग्रेजी और राजनीति शास्त्र में बीए (BA) किया.

पॉलिटिक्स और दुनियादारी  के इसी कौतूहल को शब्दों का मंच देने के लिए मैंने पत्रकारिता का रुख किया और साल 2025 में देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान आईआईएमसी में दाखिला लिया.आईआईएमसी के उन लाल गलियारों से पत्रकारिता के ककहरे और बारीकियों को बखूबी सीखने के बाद मैं  फिलहाल एबीपी नेटवर्क के साथ बतौर प्रशिक्षु पत्रकार जुड़कर अपने सीखने के सिलसिले को नया आसमान दे रहा हूं.

मिजाज से ठेठ कनपुरिया हूं तो दुनिया के किसी भी कोने में रहूं ,अपने जैसे दो-चार को ढूंढ ही लेता हूं और संयोग से अगर कोई कानपुर-उन्नाव का मिल जाए तो फिर महफिल जमनी तय ही समझो. काम से इतर मुझे लजीज खाने का शौक है. फुर्सत के पलों में किताबें पढ़ना पसंद है और मौका मिलते ही पिच पर चौके-छक्के जड़ने यानी क्रिकेट खेलने का शौक भी बखूबी रखता हूं.सीखने-सिखाने और खबरों के सफर को जीने का यह कनपुरिया अंदाज आगे भी यूं ही जारी रहेगा.

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