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मौलाना महमूद मदनी के बयान को लेकर छपी खबरें भ्रामक, जमीअत उलमा-ए-हिंद ने किया दावों का खंडन

UP News: जमीअत उलमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना महमूद मदनी को लेकर मीडिया रिपोर्ट्स में किए गए दावों का खंडन किया गया है. मदनी की तरफ से जारी प्रेस रिलीज में इस बात पर जवाब दिया है.

जमीअत उलमा-ए-हिंद ने प्रेस रिलीज जारी कर उन मीडिया रिपोर्ट्स का कड़ा खंडन किया है जिनमें दावा किया गया था कि संगठन के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा विवाद को लेकर समुदायों के बीच बातचीत की बात कही है. संगठन ने साफ किया है कि मौलाना मदनी ने अपने किसी भी इंटरव्यू या बयान में इस तरह की कोई बात नहीं कही है. इसको लेकर जमीअत की तरफ से प्रेस रिलीज जारी कर सफाई दी गई है.

जमीअत की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि हाल ही में टीवी न्यूज एजेंसी ANI को दिए गए इंटरव्यू में मौलाना मदनी से आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत द्वारा दिए गए बयान के संबंध में सवाल पूछा गया था. जिसके जवाब में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत जी द्वारा दोनों समुदायों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंधों और आपसी रिश्तों को बेहतर बनाने के लिए संवाद स्थापित करने में किसी भी प्रगति की सराहना की है. 

मौलाना मदनी ने इस संदर्भ में 2023 में आयोजित जमीअत उलमा-ए-हिंद की 34वें आम सभा के अध्यक्षीय भाषण का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारे संगठन ने इस संबंध में पहले ही एक प्रस्ताव पारित किया था. जिसमें आपसी बातचीत को सभी समस्याओं का समाधान बताया गया था और आरएसएस के सरसंघचालक और उनके अनुयायियों को गर्मजोशी से आमंत्रित किया गया था कि आइए आपसी मतभेद और शत्रुता एवं नफरत को भुलाकर एक-दूसरे को गले लगाएं.

मौलाना मदनी ने क्या कहा?

मौलाना मदनी ने कहा कि जहां तक मस्जिदों का मामला है तो मूल तथ्य यह है कि ज्ञानवापी और मथुरा आदि मामलों में निर्णय लेने का अधिकार संबंधित मस्जिद कमेटियों का है, जो इन मामलों में शरीयत और कानूनी रूप से पक्षकार हैं और उनके पास शरीयत के दायरे में रहते हुए किसी से भी संवाद करने का अधिकार है. 

जहां तक मथुरा के मामले का संबंध है, वहां 1968 में औपचारिक रूप से अदालत की निगरानी में शाही ईदगाह कमेटी और श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ के बीच मामले के निपटारे पर आधारित समझौता हो चुका है. इसलिए, वहां कोई वास्तविक विवाद नहीं है और होना भी नहीं चाहिए.

बयान में क्या कहा गया?

विज्ञप्ति में आगे कहा गया कि जमीअत उलमा-ए-हिंद की 34वीं आम सभा में भी मौलाना मदनी ने यही रुख साफ किया था कि अदालतों और अदालतों से बाहर विवादों को सुलझाने के बजाय देश में शांति और भाईचारे का माहौल बनाए रखना सबसे अहम है.

मौलाना मदनी ने स्पष्ट किया कि ज्ञानवापी और मथुरा जैसे मामलों में निर्णय लेने का अधिकार मस्जिद कमेटियों का है, जिनके पास शरीयत और कानून दोनों का अधिकार है. 

शाही ईदगाह और श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ पर हो चुका है समझौता: जमीअत 

मथुरा मामले पर तो पहले ही 1968 में शाही ईदगाह कमेटी और श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ के बीच आपसी समझौता हो चुका है, इसलिए वहां किसी भी प्रकार का वास्तविक विवाद नहीं है. जमीअत ने मीडिया से अपील की है कि वे भ्रामक और तथ्यों से परे खबरें प्रकाशित न करें और सही जानकारी को ही जन-जन तक पहुंचाएं.

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