Ayodhya News: रामलला की मूर्ति के लिए नेपाल से आ रहे हैं शालिग्राम पत्थर, यहां जानें उत्पत्ति की पूरी कहानी
Ram Mandir News: मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास ने कहा कि शालिग्राम साक्षात विष्णु के स्वरूप हैं, चाहे छोटे शालिग्राम हो या बड़े, यह गंडकी नदी से निकलते हैं.

Ayodhya News: नेपाल की गंडकी नदी से जो पत्थर रामलला की मूर्ति बनाने के लिए अयोध्या (Ayodhya) लाए जा रहे हैं, उन पत्थरों का सीधा रिश्ता भगवान विष्णु और माता तुलसी से भी है. इसलिए शालिग्राम की अधिकतर मंदिरों में पूजा होती है और इनको रखने के बाद प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता भी नहीं होती. अब ऐसे पत्थर से रामलला की मूर्ति बनेगी तो वह कितनी दिव्य होगी, यह आप खुद समझ सकते हैं. हम आपको इसी शालिग्राम पत्थर के उत्पत्ति की पूरी कहानी बताते हैं
धार्मिक ग्रंथों में शालिग्राम शिला की उत्पत्ति का उल्लेख मिलता है. कहा जाता है कि एक बार जब दानव और देवताओं का युद्ध हो रहा था, उस समय जलंधर जब युद्ध में जाने लगा तो उसकी पतिव्रता पत्नी बृंदा ने उसके लिए अनुष्ठान प्रारंभ किया. भगवान शंकर से जलंधर का घोर युद्ध हुआ और भगवान शंकर के लगातार प्रहार के बाद भी जलंधर की मृत्यु नहीं हो रही थी. इसकी वजह उसकी पत्नी बृंदा का सतीत्व था, जो उसकी रक्षा के लिए लगातार अनुष्ठान कर रही थी.
शालिग्राम पत्थर को लेकर ये है मान्यता
बृंदा के सतीत्व को नष्ट करने के लिए भगवान विष्णु ने जलंधर का रूप धारण कर बृंदा के पास गए. पति को आता हुआ देख बृंदा ने अनुष्ठान समाप्त कर पति के रूप में विष्णु जी के पैर छुए तो उसका सतीत्व खंडित हो गया और जलंधर की मृत्यु हुई. इसका भान होते ही बृंदा ने भगवान विष्णु को शिला होने का श्राप दिया भगवान विष्णु ने इसके बाद बृंदा से माफी मांगी और कहा कि तुम्हारे सतीत्व के कारण तुम मुझे लक्ष्मी से अधिक प्रिय हो इसलिए तुम तुलसी के रूप सदा पूजनीय रहोगी.
यही रिश्ता है शालिग्राम पत्थर से भगवान विष्णु का और तुलसी से वृंदा का है. अब ऐसे में जिस पत्थर में खुद भगवान विष्णु विराजमान हैं उससे अगर रामलला की मूर्ति तैयार की जाएगी तो वह कितनी भव्य और दिव्य होगी आप खुद समझ सकते हैं.
सभी मंदिरों में होती है पूजा
मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास ने कहा कि शालिग्राम साक्षात विष्णु के स्वरूप हैं, चाहे छोटी शालिग्राम हो या बड़ी यह गंडकी नदी से निकलती है. सबको सालिकराम के नाम से जाना जाता है और प्रत्येक मंदिरों में इसकी पूजा होती है. वह स्वयं प्रतिष्ठित मूर्ति होती है और इसकी प्रतिष्ठा करने की जरूरत नहीं होती है और वही पत्थर आ रहा है जिससे भारत और नेपाल का एक संबंध भी जुड़ेगा. इसी पत्थर से भगवान राम का बालक रूप प्रतिमा के रूप में अपने आप में पवित्र है और जब रामलला की मूर्ति बन जाएगी, तब और महत्व बढ़ जाएगा.
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Source: IOCL





















