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खतरे में पड़ सकती है जुफर फारूकी और वसीम रिज़वी की कुर्सी, ऑडिट में खेल कर वक़्फ़ बोर्डों पर काबिज़ होने का आरोप

शिया और सुन्नी वक्फ बोर्ड के चेयरमैन बनने के प्रक्रिया के पीछे मनमानी चल रही है. यही नहीं, इस पर काबिज होने के लिये नियमों को ताक पर रख दिया गया.

प्रयागराज:  यूपी में लूट- खसोट के बड़े सेंटर के तौर पर बदनाम शिया और सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्डों में मेंबर व चेयरमैन बनने की प्रक्रिया में परदे के पीछे बड़ा खेल होने और गड़बड़झाला किये जाने का मामला सामने आया है. आरोप है कि सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के मौजूदा चेयरमैन जुफर फारूकी और शिया वक़्फ़ बोर्ड के निवर्तमान चेयरमैन वसीम रिज़वी अपने-अपने बोर्ड में जिस मुतवल्ली कोटे से मेंबर बने हैं, उसका चुनाव लम्बे अरसे से गलत व मनमाने तरीके से किया जा रहा है. मुतवल्ली कोटे से हुए इस साल भी हुए इनके चयन को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है. मामला अब अदालत के पाले में हैं, लेकिन यह ज़रूर कहा जा सकता है कि दोनों की कुर्सियां अब कानूनी दांवपेंच में फंसती हुई नज़र आ रही हैं.

गंभीर आरोप लगते रहे हैं

जुफर फारूकी और वसीम रिज़वी दोनों पर ही पिछले काफी समय से भ्रष्टाचार व लूट -खसोट के गंभीर आरोप लगते आ रहे हैं, लेकिन पहली बार इनकी कुर्सी को सीधे तौर पर चुनौती दी गई है. दोनों की कुर्सी और भविष्य के बारे में फैसला अब अदालत को लेना है, लेकिन मौजूदा हालात के मद्देनज़र यह ज़रूर कहा जा सकता है कि पिछले लम्बे अर्से से अपने -अपने बोर्डों पर काबिज़ जुफर और वसीम की आगे की राह कतई आसान नहीं होगी. 

नहीं करवाया प्रॉपर्टी का ऑडिट

गौरतलब है कि यूपी के शिया और सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्डों में कुल ग्यारह मेम्बर्स होते हैं. इनमे आठ सदस्यों का अलग -अलग कैटेगरी में चुनाव  होता है, जबकि तीन सदस्यों को सरकार नामित करती है. इन्हीं ग्यारह सदस्यों के बीच से चेयरमैन चुना जाता है. बोर्ड का सदस्य बनने के लिए मुतवल्लियों यानी वक़्फ़ की प्रॉपर्टी के ट्रस्टियों के बीच से भी दो लोग चुने जाते हैं. सिर्फ उन्ही वक़्फ़ प्रॉपर्टीज़ के मुतवल्लियों के बीच से दो सदस्य चुने जाते हैं, जिनकी सालाना आमदनी एक लाख रूपये से ज़्यादा की होती है. जानकारी यह सामने आई है कि यूपी में इक्का -दुक्का छोड़कर किसी भी मुतवल्ली ने पिछले दस सालों से ज़्यादा वक़्त से अपनी वक़्फ़ प्रॉपर्टीज का आडिट ही नहीं कराया है. 

मुतवल्ली कोटे के चुनाव एक दशक से ज़्यादा पुराने रिकार्ड के आधार पर हो रहे हैं. आशंका है कि एक दशक में तमाम वक़्फ़ प्रॉपर्टीज़ एक लाख से ज़्यादा की आमदनी के दायरे से बाहर हो चुकी होंगी, जबकि तमाम नए वक़्फ़ अब इस दायरे में आ चुके होंगे. वक़्फ़ प्रॉपर्टीज़ का आडिट रोके जाने का खेल जुफर फारूकी और वसीम रिज़वी के चेयरमैन बनने के बाद से शुरू हुआ है, क्योंकि दोनों ही पहले मुतवल्ली कोटे से अपने -अपने बोर्डों में मेंबर बनते हैं और बाद में रसूख व सत्ता पक्ष से नजदीकियां जोड़कर चेयरमैन पद पर काबिज हो जाते हैं. यह हाल तब है जब वक्फ एक्ट की धारा 46 और 47 में यह साफ़ तौर पर कहा गया है कि हरेक वक़्फ़ का सालाना आडिट अनिवार्य है.

मनमानी का खेल

दरअसल वक़्फ़ प्रॉपर्टीज़ का आडिट नहीं कराए जाने के पीछे खेल यह भी है कि यूपी सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के लगातार तीसरी बार चेयरमैन चुने गए जुफर फारूकी सीतापुर की जिस वक़्फ़ प्रापर्टी के मुतवल्ली हैं, उसे लेकर भी तमाम शिकायतें हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल मुक़दमे के मुताबिक़ जुफर फारूकी ने अपने अंडर वाली वक़्फ़ प्रॉपर्टी का कुछ हिस्सा खुद ही किराए पर ले रखा है, जबकि वक़्फ़ लीज रूल्स -2014 में नियम यह है कि कोई भी मुतवल्ली उस प्रॉपर्टी में अपना कोई इंट्रेस्ट जनरेट नहीं कर सकता, जिसकी वह देखभाल कर रहा है. जुफर फारूकी ने कई हज़ार स्क्वायर फिट ज़मीन किराए पर ली हुई थी. आरोप यह भी है कि कुछ ज़मीनें परिवार वालों को एलाट कर दी गईं और कुछ तो बेच भी दी गईं. सबसे ज़्यादा विवाद प्रॉपर्टी संख्या 13 - 14- 24 और 90 नंबर को लेकर है. इसके साथ ही मुसाफिरखाना बनाने के नाम दी गई ज़मीन का भी दुरूपयोग किया गया है. 

जुफर के मुतवल्ली बनने पर भी विवाद है, क्योंकि कागजों में उनके भाई बरकत अहमद मुतवल्ली हैं. एक अन्य भाई उमर अहमद पर भी साल 2014 के मार्च महीने में वक़्फ़ प्रॉपर्टी पर दूसरों को पैसे लेकर काबिज कराने का आरोप है. मुक़दमे में दाखिल डाक्यूमेंट्स के मुताबिक़ प्रॉपर्टी में हेराफेरी को लेकर जुफर फारूकी के खिलाफ मुकदमा भी हुआ, लेकिन चेयरमैन बनने के बाद उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज केस को खुद ही वापस ले लिया. सवाल यह उठ रहे हैं कि जुफर फारूकी जिस वक़्फ़ प्रॉपर्टी से जुड़े हुए थे, जब बड़े पैमाने पर उसमे बंदरबांट कर दिया गया तो अब कुछ हिस्सा बचा भी है या नहीं. अगर बचा नहीं है तो वह मुतवल्ली नहीं हुए और बिना मुतवल्ली रहे हुए वह वक़्फ़ बोर्ड के मेंबर और चेयरमैन नहीं बन सकते. आशंका यह भी है कि सीतापुर की वक़्फ़ प्रॉपर्टी कुछ बची भी हुई है, तो क्या उसकी सालाना आमदनी एक लाख रूपये रह भी गई है या नहीं.  

लगातार बढ़ रहा है विवाद

इसी तरह से शिया सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के निवर्तमान अध्यक्ष वसीम रिज़वी पर भी बिना आडिट वाले वक़्फ़ मुतवल्लियों के बीच से चुने जाने का आरोप है. शिया वक़्फ़ बोर्ड के चेयरमैन का चुनाव इसी विवाद के चलते रुका हुआ है, जबकि वसीम रिज़वी इस साल भी मुतवल्ली कोटे से मेंबर चुन लिए गए हैं. मुतवल्ली कोटे का चुनाव इसी साल 19 मई को हुआ है. वसीम रिज़वी पर भी आरोप है कि वह राजधानी लखनऊ की जिस वक़्फ़ प्रॉपर्टी के मुतवल्ली हैं, उसमे वह परिवार समेत खुद भी रहते हैं. इस प्रॉपर्टी पर भी पैसे लेकर दूसरों को कब्ज़ा कराने का आरोप है. इस मामले में भी शिकायतें हुई थीं, आवाज़ें उठीं थीं, लेकिन वसीम रिज़वी के खुद चेयरमैन होने की वजह से सारा मामला ठंडे बस्ते में चला गया था. वसीम रिज़वी के खिलाफ प्रयागराज के गुलाम हैदर इमामबाड़े की ज़मीन पर मनमाने तरीके से निर्माण कराए जाने के मामले में नामजद एफआईआर भी दर्ज है. उनके खिलाफ दर्ज दो आपराधिक मुकदमों की जांच सीबीआई को भी सौंपी जा चुकी है. वसीम रिज़वी की वक़्फ़ प्रॉपर्टी की सालाना आमदनी के भी एक लाख रूपये से कम होने की आशंका जताई जा रही है. 

कार्रवाई की सिफारिश की गई थी

वक़्फ़ बोर्डों के चुनाव में नियमों की अनदेखी व मनमानी किये जाने और जुफर फारूकी व वसीम रिज़वी के कार्यकाल में लिए गए फैसलों पर सेंट्रल वक़्फ़ काउंसिल ने भी 31 मार्च 2017 को अपनी रिपोर्ट दाखिल की थी. इस रिपोर्ट में इन दोनों पर लगे कई गंभीर आरोपों को सही मानते हुए इनके खिलाफ कार्रवाई किये जाने, पद से हटाए जाने और प्रॉपर्टीज़ जब्त किये जाने की सिफारिश की गई थी, लेकिन सत्ता पक्ष से नजदीकियों के चलते सिफारिशों को नज़रअंदाज़ करते हुए उन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. 

असद मुनीर और अल्लामा ज़मीर नक़वी ने इन्ही सब गड़बड़ियों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल की है. अर्जी में यूपी सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के चुनाव को रद्द कर सभी वक़्फ़ प्रॉपर्टीज़ का आडिट कराने के बाद नए सिरे से चुनाव कराए जाने और गड़बड़ियों की जांच कराए जाने की मांग की गई है. इस अर्जी में यूपी सरकार के साथ ही सूबे माइनॉरिटीज वेलफेयर सेक्रेट्री, चुनाव के रिटर्निंग आफिसर और सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के साथ ही चेयरमैन ज़ुफर फारूकी को व्यक्तिगत तौर पर पक्षकार बनाया गया है. जस्टिस केजे ठाकर और जस्टिस दिनेश पाठक की डिवीजन बेंच ने इस मामले में सुनवाई करते हुए सभी पक्षकारों को नोटिस जारी कर उनसे जवाब तलब कर लिया है. कोर्ट ने चुनाव से संबंधित सभी दस्तावेज भी तलब कर लिए हैं. याचिकाकर्ताओं की तरफ से अदालत में सीनियर एडवोकेट सैयद फरमान अहमद नक़वी ने पक्ष रखा. उनके मुताबिक़ अदालत इस मामले में अब नौ जुलाई को फिर से सुनवाई करेगी. इसी तरह से शिया सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड में मुतवल्ली कोटे से हुए मेम्बर्स के चुनाव को भी कोर्ट में चुनौती दी गई है. इस मामले में अभी सुनवाई नहीं हो सकी है. 

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