चौधरी बनेंगे सत्ता की चाबी या इस बार भी भाजपा खोलेगी ताला
सपा-बसपा-रालोद का गठबंधन मिलकर भाजपा को रोकने की पूरी तैयारी में है। हाल ही में हुए कैराना लोकसभा उपचुनाव में ये महागठबंधन भाजपा को हराने में सफल भी रहा था।

लखनऊ, एबीपी गंगा। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी में भाजपा को अप्रत्याशित नतीजें देखने को मिले थे। हालांकि, इस बार के चुनाव में हालात कुछ बदले-बदले से नजर आ रहे हैं। सपा-बसपा-रालोद का गठबंधन मिलकर भाजपा को रोकने की पूरी तैयारी में है। हाल ही में हुए कैराना लोकसभा उपचुनाव में ये महागठबंधन भाजपा को हराने में सफल भी रहा था। कहते हैं कि पश्चिमी यूपी का मतदाता चुनाव का ट्रेंड निर्धारित करता है। यही वजह है कि सपा-बसपा-रालोद के अलावा कांग्रेस ने जाटलैंड में पूरी ताकत झोंक रखी है। वहीं कांग्रेस भी यहां सियासी जमीन खोजने की तलाश में है। बताते चलें कि लोकसभा चुनाव 2019 में प्रारंभिक चरणों में मतदान पश्चिमी उत्तर प्रदेश में होंगे। यही वजह है कि भाजपा भी यहां नजरें गढ़ाए हुए हैं। हालांकि, त्रिकोणीय मुकाबले से यहां राजनीतिक दलों के बीच दिलचस्प जंग देखने को मिलेगी।
कैराना उपचुनाव ने बदली फिजा कैराना के वोटर्स ने लगभग सभी दलों को मौका दिया है। 1984 में ये सीट कांग्रेस के पास रही तो वहीं 1989 और 1991 में जनता दल ने इस पर कब्जा जमाया। 1996 में जनता ने सपा के मुनव्वर हसन को सांसद बनाकर भेजा। 1998 में यहां भाजपा की जीत हुई, लेकिन 1999 और 2004 में लगातार रालोद का कब्जा रहा। 2009 में बसपा की टिकट पर तबस्सुम हसन यहां से चुनाव जीतकर संसद पहुंची। हालांकि, 2014 में भाजपा के हुकुम सिंह ने यहां से जीत दर्ज की। हुकुम सिंह के निधन के बाद 2018 में उपचुनाव कराए गए। इस बार तबस्सुम हसन ने रालोद की टिकट पर चुनाव जीतकर भाजपा को हराया। बता दें कि तबस्सुम हसन को समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस का समर्थन हासिल था।
जाटलैंड में भाजपा का जोर भाजपा की नजर वैसे तो पूरे उत्तर प्रदेश पर है, लेकिन पश्चिम यूपी से पार्टी को अधिक उम्मीदें हैं। वहीं, कैराना उपचुनाव के बाद भाजपा की टेंशन भी बढ़ गई है। इसके साथ ही सपा-बसपा का करीब दो दशक बाद हुआ गठबंधन और रालोद का साथ आना भी जाटलैंड के गणित को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा का दलित-मुस्लिम फार्मूला और कांग्रेस व रालोद का गठबंधन फेल साबित हुआ था। तब की सत्ताधारी पार्टी सपा भी यहां कोई खास कमाल नहीं दिखा पाई थी। यहां तक कि रालोद प्रमुख अजित सिंह अपने पुश्तैनी संसदीय क्षेत्र बागपत में अपनी सीट भी नहीं बचा पाए और तीसरे स्थान पर खिसक गए।
मुस्लिम सीटों पर कौन पड़ेगा भारी पिछले चुनाव में मुस्लिम बहुल सीटों पर धुव्रीकरण के चलते भाजपा की प्रचंड जीत हुई थी। इस क्षेत्र में आने वाली सभी 19 सीटों पर भगवा लहराया था। जबकि 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में 95 सीटों में से 75 सीटें भाजपा की झोली में गई थी। मोदी लहर को रोकने के लिए सपा, बसपा और रालोद साथ आए हैं। तो वहीं प्रियंका गांधी की एंट्री से कांग्रेस में खासा उत्साह है। इस वजह से लोकसभा चुनाव वाकई में दिलचस्प होगा।
वर्ष 2014 में भाजपा बनाम विपक्ष-वोट प्रतिशत
सीट भाजपा सपा-बसपा-कांग्रेस
1.सहारनपुर- 39.59, 58.23,
2.कैराना- 50.54, 43.72
3.मुजफ्फरनगर-58.98, 38.46
4.बिजनौर- 45.92, 48.21,
5-नगीना- 39.92, 55.28,
6-मुरादाबाद- 43.01, 51.28,
7-रामपुर- 37.42 59.76,
8-संभल- 34.00 59.01
9-अमरोहा- 48.26, 48.69
10-मेरठ- 47.86, 49.85,
11-बागपत- 42.15, 35.30,
12-गाजियाबाद- 56.50, 35.01,
13-गौतमबुद्धनगर-50.00, 44.23,
14-बुलंदशहर- 59.84, 30.80,
15-अलीगढ़- 48.34, 48.54,
16-हाथरस- 51.87, 38.01,
17-मथुरा- 51.29, 19.50,
18-आगरा- 54.53, 42.53,
19-फतेहपुर सीकरी-44.06, 48.22।





















