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अमित शाह ने जो सपने देखे वो एक-एक कर सच होते चले गए, जानें- कैसे मुश्किल दौर में चमका ये सितारा

देश के गृह मंत्री की गद्दी पर बैठना पता नहीं अमित शाह का सपना था या नहीं मगर ये सच है कि जो सपने अमित शाह देखते रहे वो एक-एक कर के सच होते गए।

नई दिल्ली, एबीपी गंगा। अमित शाह भले ही केंद्र में गृह मंत्री अब बने हो लेकिन इस कुर्सी का तजुर्बा उन्हें गुजरात से ही हासिल है। बतौर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की गुजरात में पारी के दौरान गृह मंत्री अमित शाह रहे। सियासत में कदम रखने के साथ ही बड़ी जल्दी अमित शाह ने न केवल पार्टी में जगह बनाई बल्कि तेजी से जिम्मेदारियां भी संभाली। उम्मीदों पर खरा उतरने का उनका हुनर पार्टी के भीतर उन्हें मुकाम तक पहुंचाता रहा और गुजरात से शुरू हुआ उनका ये सियासी सफर केंद्र में गृह मंत्री तक जा पहुंचा है।

सियासत में चमके शाह

देश के गृह मंत्री की गद्दी पर बैठना पता नहीं अमित शाह का सपना था या नहीं मगर ये सच है कि जो सपने अमित शाह देखते रहे वो एक-एक कर के सच होते गए। गुजरात के संपन्न परिवारों में शुमार भाई अनिल चंद्र शाह का ये लाडला सियासत में आना क्यों चाहता था? इस सवाल का जवाब तो उनके करीबियों को भी नहीं पता लेकिन सियासत में एंट्री के बाद ये सच है कि अमित शाह को बुलंदियां छूने में वक्त नहीं लगा।

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आडवाणी की सीट है और अटल जी का बंगला

80 के दशक में छात्र जीवन से राजनीति में एंट्री लेने वाले अमित शाह की जिंदगी का पहला बड़ा मौका तब आया जब उन्हें 1991 में गांधी नगर सीट पर बीजेपी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी के प्रचार का जिम्मा मिला। शाह ने अपनी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाते हुए हर बूथ पर पकड़ बनाई। इसके बाद गुजरात में ही 1996 के दौर में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के चुनाव लड़ने की इच्छा के मुताबिक अमित शाह ने उनके प्रचार का जिम्मा उठाया। तभी तो आज शाह की झोली में आडवाणी की सीट है और अटल बिहारी वाजपेयी का बंगला।

बड़े नेताओं पर छोड़ी छाप

यही वो मौके थे जब अमित शाह ने भाजपा के बड़े नेताओं पर अपनी छाप छोड़ने में कामयाबी हासिल कर ली। अब तक अमित शाह बीजेपी नेता के साथ स्टॉक ब्रोकर के तौर पर दोहरी जिम्मेदारी निभा रहे थे। 1996 में उनके काम से खुश होकर पार्टी ने 1997 के चुनाव में सरखेज विधानसभा से मैदान में उतार दिया। नतीजा न सिर्फ अमित शाह ने यहां से जीत दर्ज की बल्कि अपनी सियासी पारी में इसके बाद लड़े चुनाव में जीत का इतिहास दर्ज कराया। अमित शाह लगातार यहां से तीन बार 1998, 2002 और 2007 में चुनाव जीतते आए।

अमित शाह ने जो सपने देखे वो एक-एक कर सच होते चले गए, जानें- कैसे मुश्किल दौर में चमका ये सितारा

मुश्किल दौर भी देखा

2012 में अमित शाह ने सरखेज से सीट बदलते हुए नारनपुरा की सीट पर उतरने का फैसला किया और जीत दर्ज की। इसी दौरान मोदी सरकार में शामिल होते हुए अमित शाह बतौर गृह मंत्री अपनी जिम्मेदारी संभालते रहे। अपनी सियासी यात्रा में अमित शाह इस दौरान कई अहम पदों पर काम कर चुके थे। उनकी भूमिका का लगातार विस्तार होता गया। अमित शाह कई वजह से सुर्खियों में भी रहे एक वक्त तो ऐसा भी आया जब उन्हें सोहराबुद्दीन एनकाउंटर के मामले में अपनी गद्दी भी छोड़नी पड़ी और कोर्ट के आदेश पर गुजरात से बाहर वक्त बिताना पड़ा।

कभी पस्त नहीं हुए हौसले

इतनी आफत के बावजूद अमित शाह का हौसला पस्त नहीं हुआ उन्होंने खुद को संभाला और सियासत की जंग के लिए तैयार किया। आखिरकार एक वक्त ऐसा भी आया जब 2014 में मोदी की भूमिका को समझते हुए पार्टी ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया और जीत की बिसात बिछाने के लिए तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया।

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देश ही हिफाजत का जिम्मा

शाह के सजाए सियासी मैदान से होते हुए मोदी दिल्ली के तख्त तक पहुंचे, तो पार्टी ने शाह का कद बढ़ाते हुए उन्हें देश भर में भाजपा की विजय पताका फहराने का जिम्मा देते हुए अध्यक्ष बना दिया। इसके बाद जो शाह ने किया, वो इतिहास में दर्ज हो चुका है और शाह का ये इतिहास उन्हें इस मुकाम पर ले आया है कि कल तक गुजरात के गृह मंत्री  रहे अमित शाह आज देश के गृह मंत्री हैं। एक सूबे का जिम्मा उठाने वाले हाथों में अब देश की हिफाजत का जिम्मा है।

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