यूपी में बुलडोजर एक्शन सही या गलत? इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीशों में मतभेद, अब CJ करेंगे फैसला?
UP News In Hindi: इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने आपराधिक मामलों से जुड़े आरोपियों की संपत्तियों पर बुलडोजर कार्रवाई को लेकर अलग-अलग निष्कर्ष दिए हैं. जिसके बाद अब चीफ जस्टिस मामले सुनवाई करेंगे.

उत्तर प्रदेश में कथित अवैध निर्माणों और आपराधिक मामलों से जुड़े आरोपियों की संपत्तियों पर होने वाली बुलडोजर कार्रवाई को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच एकमत नहीं हो सकी. जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने इस मामले में अलग-अलग निष्कर्ष दिए हैं. दोनों न्यायाधीशों के मतभेद के चलते प्रकरण को अंतिम निर्णय के लिए चीफ जस्टिस के समक्ष भेज दिया गया है. अब चीफ जस्टिस तय करेंगे कि सुनवाई किसी तीसरे न्यायाधीश से कराई जाए या नई बेंच गठित की जाए.
हमीरपुर के फैमुद्दीन की ओर से दाखिल याचिका से जुड़ा है पूरा विवाद
विवाद की शुरुआत हमीरपुर जिले के फैमुद्दीन और अन्य की ओर से दाखिल याचिका से हुई. याचिका में कहा गया कि उनके रिश्तेदार आफान खान के खिलाफ नाबालिग से रेप, आपत्तिजनक वीडियो बनाने और कथित धर्मांतरण के दबाव जैसे गंभीर आरोपों में बीएनएस, पॉक्सो, आईटी एक्ट और उत्तर प्रदेश गैरकानूनी धर्मांतरण निषेध कानून के तहत मुकदमा दर्ज है. घटना कथित रूप से 'इंडियन लॉज' नामक इमारत में हुई थी. जांच के दौरान फैमुद्दीन को भी गिरफ्तार किया गया.
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि प्रशासन उनके मकानों, इंडियन लॉज और एक आरा मिल के खिलाफ सीलिंग और ध्वस्तीकरण की तैयारी कर रहा है, जबकि मुख्य आरोपी का इन संपत्तियों पर कोई स्वामित्व नहीं है. उनका आरोप था कि बिना समुचित नोटिस और सुनवाई के कार्रवाई करना सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय किए गए सिद्धांतों के विपरीत है.
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जस्टिस अतुल श्रीधरन की सख्त टिप्पणियां
राज्य सरकार ने अदालत में दावा किया कि याचिकाकर्ताओं ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया है. सरकारी पक्ष के अनुसार इंडियन लॉज सिंचाई विभाग की भूमि पर बना अवैध ढांचा है, जिसे हटाने के निर्देश पहले ही दिए जा चुके हैं. वहीं आरा मिल के खिलाफ वन विभाग की अलग कार्रवाई चल रही है क्योंकि वहां से प्रतिबंधित प्रजाति की लकड़ी मिलने का दावा किया गया है.
अपने विस्तृत फैसले में जस्टिस अतुल श्रीधरन ने मशहूर शायर बशीर बद्र की पंक्ति लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में का उल्लेख करते हुए कहा कि एक आम नागरिक के लिए घर केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत, पूंजी और पूरे परिवार की सुरक्षा का प्रतीक होता है. ऐसे आशियाने को अचानक ढहा देना परिवार को गंभीर संकट में डाल सकता है.
केवल FIR के आधार पर घर गिराना दंडात्मक प्रशासनिक कार्रवाई जैसा
जस्टिस श्रीधरन ने टिप्पणी की कि केवल एफआईआर दर्ज होने के आधार पर किसी व्यक्ति का घर गिराना दंडात्मक प्रशासनिक कार्रवाई जैसा प्रतीत होता है. उन्होंने सुझाव दिया कि एफआईआर दर्ज होने के बाद दो वर्ष तक आवासीय भवनों के ध्वस्तीकरण पर रोक होनी चाहिए, जब तक कि सार्वजनिक भूमि को तत्काल खाली कराना अत्यावश्यक न हो. साथ ही उन्होंने तीन वर्ष से अधिक पुराने अवैध निर्माणों पर कार्रवाई से पहले एक वर्ष पूर्व नोटिस देने का सुझाव भी रखा.
फैसले में न्यायमूर्ति श्रीधरन ने प्रशासनिक भ्रष्टाचार और संस्थागत जवाबदेही पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा कि कई मामलों में अधिकारी पहले अवैध निर्माण होने देते हैं और बाद में वर्षों बाद कार्रवाई करते हैं. अपने फैसले में उन्होंने हाल में चर्चा में रहे राम मंदिर चंदा चोरी विवाद का भी उल्लेख करते हुए सामाजिक और नैतिक जवाबदेही पर टिप्पणी की. साथ ही भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कानूनी उपायों पर विचार करने की आवश्यकता भी जताई.
जस्टिस श्रीधरन ने याचिकाकर्ताओं के मकानों और इंडियन लॉज के खिलाफ प्रस्तावित ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को रद्द करते हुए कहा कि मुख्य आरोपी के दूर के रिश्तेदारों की संपत्ति को निशाना बनाना उचित नहीं माना जा सकता. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के बुलडोजर मामलों से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों का भी हवाला दिया.
जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने जताई असहमति, केवल इन बातों पर रहे सहमत
दूसरी ओर जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने फैसले के कई अहम हिस्सों से सहमति नहीं जताई. उनका कहना था कि कानून में एक वर्ष पहले नोटिस ऑफ इंटेंट देने जैसी कोई व्यवस्था नहीं है. उनके अनुसार उत्तर प्रदेश नगर नियोजन एवं विकास अधिनियम में पहले से नोटिस और सुनवाई की पर्याप्त प्रक्रिया मौजूद है, इसलिए अदालत को नई समय-सीमा तय करने से बचना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट की शक्तियां व्यापक जरूर हैं, लेकिन उनका प्रयोग न्यायिक संयम के साथ होना चाहिए.
हालांकि फैसले के कई पहलुओं पर मतभेद रहा, लेकिन दोनों न्यायाधीश इस बात पर एकमत रहे कि बुलडोजर कार्रवाई से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सभी दिशा-निर्देशों का उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में सख्ती से पालन किया जाना चाहिए.
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