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रामपुर CRPF कैंप हमले के आरोपियों की फांसी की सजा रद्द, इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला

UP News: 31 दिसंबर 2007 की रात को रामपुर में स्थित CRPF कैंप पर हमले के आरोप में निचली अदालत ने जिन आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई थी, उसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है.

सीआरपीएफ कैंप रामपुर हमले के मामले में निचली अदालत की ओर से चार आरोपियों को दी गई फांसी की सजा को बुधवार (29 अक्टूबर) को इलाहाबाद हाईकोर्ट की दो सदस्यीय बेंच ने रद्द कर दिया. अदालत ने एक आरोपी को दी गई उम्रकैद की सजा को भी बदल दिया. UAPA (आतंकवाद निरोधक कानून) के तहत सत्र न्यायालय से दी गई फांसी और उम्रकैद की सजा को समाप्त कर दिया गया, हालांकि हथियार रखने के आरोप में दस साल की सजा बरकरार रखी गई है. आरोपी दस साल से अधिक समय से जेल में है.

अदालत ने सुरक्षित कर लिया था फैसला

लगभग आठ महीने पहले पक्षकारों के वकीलों की बहस पूरी होने के बाद अदालत ने निर्णय सुरक्षित रख लिया था, जिसे आज सुनाया गया. आपको बता दें कि आरोपियों को कानूनी सहायता जमीयत उलमा महाराष्ट्र (अरशद मदनी) लीगल सहायता कमेटी द्वारा दी गई.

जमीयत उलमा-ए-हिंद ने फैसले पर दी प्रतिक्रिया

जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले पर संतोष जताते हुए कहा कि निचली अदालत ने तीन लोगों को फांसी और एक को उम्रकैद की सजा दी थी, मगर अब हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि इन लोगों पर आतंकवाद का मामला बनता ही नहीं है. इसलिए निचली अदालत का फैसला खारिज कर दिया गया, हालांकि अवैध हथियार रखने के अपराध में दस साल की सजा दी गई है.

मौलाना मदनी ने कहा कि आज जो लोग आतंकवाद के आरोपों से बरी हुए हैं, उनके परिवारों के लिए यह बहुत बड़ा दिन है, क्योंकि उन्हें 18 साल तक इस दिन का इंतज़ार करना पड़ा. इन 18 सालों में उन्होंने जो उम्मीद और निराशा के बीच दर्दनाक समय गुजारा, उसकी कल्पना करना भी कठिन है. 

'10 साल की सजा को सुप्रीम कोर्ट में देंगे चुनौती'

मौलाना मदनी ने आगे कहा कि हालांकि इस फैसले में इन्हें आर्म्स एक्ट के तहत दस साल की सजा दी गई है, लेकिन चूंकि वे पहले ही 18 साल जेल में बिता चुके हैं, इसलिए अब वे सभी रिहा होंगे. फिर भी हम इस दस साल की सजा वाले फैसले को वरिष्ट अधिवक्ताओं से विचार विमर्श के बाद सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे. हमें पूरा विश्वास है कि अन्य मामलों की तरह सुप्रीम कोर्ट से भी न्याय मिलेगा और उन पर से गैरकानूनी हथियार रखने का आरोप भी इंशाअल्लाह खत्म हो जाएगा.

हमले के आरोप में निचली अदालत ने सुनाई थी फांसी की सजा

आपको बता दें कि 31 दिसंबर 2007 की रात को रामपुर में स्थित सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (सीआरपीएफ) कैंप पर हमले के आरोप में निचली अदालत ने आरोपियों इमरान शहज़ाद, मोहम्मद फारूक, सुबहउद्दीन और मोहम्मद शरीफ को मौत की सजा और जंग बहादुर को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. 

जमीयत ने अपने बयान में कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की दो सदस्यीय बेंच जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने फैसला सुनाते हुए कहा कि आतंकवाद की धाराओं के तहत निचली अदालत की ओर से दी गई फांसी और उम्रकैद की सजा गलत है. 

सजा और जुर्माना दिया जा सकता था- हाईकोर्ट

सत्र अदालत ने जिन सबूतों के आधार पर फैसला दिया, वे इतनी कठोर सजा देने के लिए अपर्याप्त हैं. अदालत ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि आरोपियों के पास से कुछ हथियार बरामद हुए हैं, जिसके लिए उन्हें दस साल की सजा और एक लाख रुपये का जुर्माना दिया जाता है.

'CRPF जवानों और रेलवे अधिकारियों के बयान में विरोधाभास'

जमीयत ने कहा कि आरोपी साल 2007 से जेल में बंद हैं, इसलिए दस साल की सजा पूरी हो जाने पर अब उनकी रिहाई तय है. सुनवाई के दौरान जमीयत उलमा लीगल सहायता कमेटी की ओर से एडवोकेट एम.एस. खान ने अदालत को बताया था कि स्थानीय पुलिस और सीआरपीएफ जवानों के बयानों में विरोधाभास है.

रेलवे अधिकारियों की गवाही में भी स्पष्ट विरोधाभास है. पुलिस और सीआरपीएफ की ओर से 98 राउंड फायरिंग के बावजूद एक भी आरोपी को गोली नहीं लगी, जिससे अभियोजन पक्ष का दावा झूठा साबित होता है कि आरोपियों को घटनास्थल से गिरफ्तार किया गया था. इसी तरह आरोपियों के कब्जे से बरामद कथित विस्फोटक सामग्री को अदालत की अनुमति के बिना नष्ट कर दिया गया, जिससे उसकी बरामदगी संदिग्ध हो जाती है. 

एडवोकेट एम.एस. खान ने यह भी बताया कि यूएपीए, आर्म्स एक्ट और विस्फोटक पदार्थ कानून के तहत कार्यवाही के लिए आवश्यक अनुमति अवैध तरीके से ली गई थी. अनुमति पत्र में गंभीर खामियां थीं, जिनसे पूरा मुकदमा ही गैरकानूनी साबित होता है क्योंकि बिना वैध स्वीकृति के ट्रायल चलाया गया.

निचली अदालत ने 5 आरोपियों को सुनाई थी फांसी और उम्रकैद की सजा

आपको बता दें कि रामपुर की निचली अदालत ने एक ओर जहां तीन आरोपियों मोहम्मद कौसर, गुलाब खान और फहीम अंसारी को अपर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर आतंकवाद के आरोपों से बरी किया था, वहीं अन्य पांच आरोपियों को दोषी ठहराकर फांसी और उम्रकैद की सजा दी थी.

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