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सुधाकर, चंद्रशेखर के बाद आलोक मेहता..., नीतीश कुमार के सियासी रडार पर क्यों हैं लालू के रणनीतिकार?

महागठबंधन में आने के बाद नीतीश कुमार ने आरजेडी के दिग्गज मंत्रियों पर नकेल कस दिया है. आलोक मेहता के विभाग पर कार्रवाई के बाद सवाल उठ रहा है कि आखिर मुख्यमंत्री के रडार पर लालू के करीबी क्यों हैं?

सुधाकर सिंह, चंद्रशेखर के बाद नीतीश सरकार में आरजेडी कोटे से मंत्री आलोक मेहता सियासी सुर्खियों में हैं. मुख्यमंत्री कार्यालय ने राजस्व विभाग के ट्रांसफर-पोस्टिंग पर वीटो लगा दिया है. मेहता बिहार सरकार के राजस्व मंत्री हैं और उनके विभाग ने हाल ही में 480 अंचलाधिकारियों का तबादला किया था.

तबादले पर रोक का समर्थन करते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि ट्रांसफर प्रक्रिया में गड़बड़ी पाई गई थी, जिसके बाद उसे वापस लेने के लिए विभाग से कहा गया था. मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि अनावश्यक ही बहुत से अधिकारियों का ट्रांसफर कर दिया गया था. अब नए सिरे से तबादले की सूची जारी की जाएगी.

इधर, सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि आखिर आरजेडी कोटे के मंत्रियों के विभाग पर ही मुख्यमंत्री कार्यालय का शिकंजा क्यों कसता जा रहा है? पटना में पत्रकारों ने नीतीश कुमार से यह सवाल भी पूछा, लेकिन उन्होंने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया. 

इसी बीच आलोक मेहता ने पूरे मामले में चुप्पी साध ली है. आरजेडी के बड़े नेता भी इस पर कुछ नहीं बोल रहे हैं. 

नीतीश के रडार पर क्यों है लालू के रणनीतिकार?
नीतीश के सियासी फायरिंग रेंज में आकर सुधाकर सिंह मंत्री पद गंवा चुके हैं. मंत्री चंद्रशेखर करीब एक महीने से खुद के विभाग में नहीं जा रहे हैं, जबकि एमएलसी सुनील सिंह भी अब शांत पड़ चुके हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर नीतीश कुमार के निशाने पर लालू यादव के करीबी ही क्यों हैं?

1. काम कम, विवादित मुद्दों पर बयानबाजी अधिक
लालू के जिन रणनीतिकारों को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने रडार पर लिया है, उनमें से अधिकांश अपने बयानबाजी की वजह से सुर्खियों में रहे हैं. यानी जिन मंत्रियों पर अब तक कार्रवाई हुई है, उनके विवादित बयानों ने मुख्यमंत्री को असहज किया है.

जानकारों का कहना है कि नीतीश की कार्यशैली को लालू के रणनीतिकार समझ नहीं पाए और मुख्यमंत्री ने सियासी तौर पर इसका फायदा उठा लिया. 

सुधाकर सिंह- कृषि मंत्री रहते लगातार विभाग के अफसरों को चोर बता रहे थे. खुले मंच से सरकार और नीतीश कुमार पर निशाना साध रहे थे. इसके बाद उनसे इस्तीफा देने के लिए कहा गया. सुधाकर सिंह आरजेडी के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह के बेटे हैं. 

चंद्रशेखर- लालू यादव के करीबी प्रोफेसर चंद्रशेखर वर्तमान में बिहार के शिक्षामंत्री हैं. आरजेडी ने चंद्रशेखर के लिए वित्त विभाग जेडीयू देकर शिक्षा विभाग अपने हिस्से में लिया था. चंद्रशेखर रामचरित्र मानस पर लगातार विवादित बयान दे रहे थे, जिसके बाद उनके विभाग में कड़क आईएएस अफसर केके पाठक को तैनात कर दिया गया.

आलोक मेहता- आरजेडी में कुशवाहा फेस और तेजस्वी यादव के किचन कैबिनेट के सदस्य आलोक मेहता ने भी हाल में एक विवादित बयान दिया था. भागलपुर की एक रैली में उन्होंने ईडब्ल्यूएस आरक्षण का लाभ ले रहे सवर्ण समुदाय को अंग्रेजों का गुलाम बताया था. 

2. गठबंधन के बड़े नेताओं को निपटाने का रिकॉर्ड पुराना
2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही नीतीश कुमार सहयोगी दल के कई नेताओं को किनारे कर चुके हैं. 2008 में बीजेपी कोटे से स्वास्थ्य मंत्री रहे चंद्रमोहन राय कैबिनेट फेरबदल में अचानक हटा दिए गए थे. हालांकि, 2010 में उन्हें फिर से कैबिनेट में लिया गया, लेकिन कद में कटौती कर दी गई. 

2010 में तो बीजेपी कोटे के कई मंत्रियों पर एक साथ गाज गिर गई और नए कैबिनेट में उन्हें जगह नहीं मिली. इनमें अवधेश प्रसाद सिंह और रामचंद्र सहनी जैसे बड़े नाम शामिल थे. नीतीश से पटरी नहीं बैठने की वजह से 2010 में राधामोहन सिंह केंद्र की राजनीति में सक्रिय हो गए.

गठबंधन के नेता ही नहीं, जेडीयू के भी कई बड़े नेता नीतीश की सियासी चतुराई का शिकार हो चुके हैं. इनमें पार्टी के संस्थापक शरद यादव, जॉर्ज फर्नांडिज, दिग्विजय सिंह और छेदी पासवान जैसे बड़े नाम शामिल हैं. नीतीश की वजह से कई नेताओं का सियासी करियर खत्म हो गया.

मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही नीतीश अपने इर्द-गिर्द उन्हीं नेताओं को रखते हैं, जो सियासी तौर पर बोलने में ज्यादा विश्वास नहीं रखता हो.  इनमें विजय चौधरी, संजय झा और बिजेंद्र यादव के नाम प्रमुख हैं. 

3. पॉलिटिकल मैसेजिंग के माहिर खिलाड़ी
बिहार के सियासी गलियारों में नीतीश कुमार पॉलिटिकिल मैसेज के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं. आरजेडी खासकर लालू यादव के करीबियों पर हो रही कार्रवाई को भी राजनीतिक जानकार पॉलिटिक्ल मैसेज से ही जोड़कर देख रहे हैं. दरअसल, बिहार में महागठबंधन की सरकार बनने के बाद बीजेपी लालू द्वारा सरकार चलाए जाने का आरोप लगा रही थी. 

लालू यादव पार्टी के भी कई नेता तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाने की मांग लगातार कर रहे थे. उपेंद्र कुशवाहा भी नीतीश पर लालू के आगे सरेंडर करने का आरोप लगा चुके हैं. ऐसे में इन कार्रवाई के पीछे इसे एक बड़ी वजह माना जा रहा है.

जानकारों का कहना है कि अगर गड़बड़ी पर कार्रवाई होती तो हाल ही में बीजेपी ने जेडीयू कोटे के मंत्री संजय झा पर गंभीर आरोप लगाया है. बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष संजय जायसवाल ने झा के विभाग पर बांध घोटाला का आरोप लगाया है. 

इस मामले में जांच तो दूर सरकार की ओर से कोई बयान तक नहीं आया है. झा नीतीश के काफी करीबी मंत्री माने जाते हैं. 

बड़ा सवाल- लालू यादव चुप्प क्यों?

हाल ही में अपने ऊपर कार्रवाई के बाद मंत्री चंद्रशेखर लालू यादव से मिलने पहुंचे थे. वहां से राहत मिलने की बजाय लालू ने उन्हें नीतीश के पास भेज दिया. वहीं विधानपार्षद सुनील सिंह को जब नीतीश ने फटकार लगाई तो उनके पक्ष में खड़े होने के बजाय आरजेडी हाईकमान चुप रहा.

उलटे विधायक दल की मीटिंग में सभी नेताओं को पुरानी बातें याद दिला दी गई, जिसमें कहा गया था कि नीतिगत मामले में सिर्फ लालू और तेजस्वी बयान देंगे. सियासी गलियारों में यह सवाल गर्म है कि लालू यादव अपने नेताओं का साथ क्यों नहीं दे रहे हैं?

ट्रांसफर-पोस्टिंग पर क्यों और कैसे लगा वीटो?
30 जून को राजस्व विभाग ने अंचलाधिकारी स्तर के 480 अधिकारियों के तबादले की एक सूची जारी की. बिहार में अंचलाधिकारी प्रखंड स्तर पर जमीन मापन और भूमि विवाद से संबंधित काम देखते हैं. ट्रांसफर के तुरंत बाद नीतीश कुमार को इसकी शियाकत मिली, जिसके बाद उन्होंने जांच का आदेश दिया.

बिहार सरकार के पूर्व राजस्व मंत्री रामसूरत राय कहते हैं- सीओ स्तर पर ट्रांसफर पोस्टिंग में विधायकों का दबाव रहता है. ऐसे में कई बार चूक हो जाती है. खुद मुख्यमंत्री विधायकों की सिफारिश सुनने के लिए कहते हैं और बाद में ट्रांसफर सूची को रद्द कर देते हैं. 

दरअसल, रामसूरत राय के वक्त भी इस तरह के तबादले पर रोक लग चुकी है. साल 2022 में 110 अंचलाधिकारी के तबादले पर मुख्यमंत्री ने वीटो लगा दिया था. उस वक्त रामसूरत राय ही राजस्व मंत्री थे. 

जो आए फायरिंग रेंज में, उनकी सियासी ताकत

1. सुधाकर सिंह- आरजेडी के संस्थापक सदस्य जगदानंद सिंह के बेटे सुधाकर कैमूर के रामगढ़ से विधायक हैं. सुधाकर की राजनीति में एंट्री बीजेपी के जरिए हुई. हालांकि, जगदानंद की जिद्द की वजह से वे 2010 में चुनाव हार गए.

2019 में बीजेपी से अनबन के बाद सुधाकर आरजेडी में आ गए, जिसके बाद उन्हें 2020 में आरजेडी ने रामगढ़ सीट से टिकट दिया. सुधाकर बीएसपी के अंबिका सिंह को चुनाव हराकर पहली बार विधानसभा पहुंचे.

सुधाकर को जगदानंद सिंह का सियासी वारिस माना जा रहा है. जगदानंद सिंह की दक्षिण बिहार में मजबूत पकड़ है. उन्हें राजपूत चेहरे के रूप में भी आरजेडी प्रोजेक्ट करती रही है. 2020 के चुनाव में आरजेडी ने दक्षिण बिहार में बड़ी जीत हासिल की थी. 

2. चंद्रशेखर- शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर मधेपुरा सीट से विधायक हैं. मधेपुरा को यादवलैंड कहा जाता है और चंद्रशेखर की यहां मजबूत पकड़ मानी जाती है. चंद्रशेखर पहली बार 2010 में विधायक चुनकर सदन पहुंचे थे. 2020 के चुनाव में चंद्रशेखर ने जेडीयू के निखिल मंडल को 16 हजार वोटों से हराया था. 

चंद्रशेखर की पहचान प्रोफेसर के साथ-साथ किसान नेता की भी है. 2015 में भी लालू यादव के करीबी होने की वजह से चंद्रशेखर मंत्री बनाए गए थे. 

3. आलोक मेहता- आलोक मेहता को राजनीतिक विरासत में मिली है. उनके पिता तुलसीदास मेहता बिहार के बड़े समाजवादी नेता रहे हैं. मेहता परिवार का समस्तीपुर बेल्ट में मजबूत दबदबा रहा है. आलोक मेहता समस्तीपुर से सांसद भी रह चुके हैं.

मेहता आरजेडी के भीतर कुशवाहा के बड़े नेता हैं. 2020 के चुनाव में उन्होंने राजद संगठन के भीतर बड़ी भूमिका निभाई थी. वे पार्टी के प्रधान महासचिव पद पर भी हैं.

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