Padma Shri 2026: भोजपुरी लोक संगीत के ‘गुरुजी’ भरत सिंह भारती को पद्मश्री सम्मान, जानें उनकी असाधारण उपलब्धियां
Padam Awards 2026: भोजपुरी लोक संगीत के संरक्षक भरत सिंह भारती को पद्मश्री सम्मान मिला. 78 वर्षों से लोक परंपराओं को सहेजते हुए उन्होंने हजारों युवाओं को संगीत से जोड़ा.

केंद्र सरकार ने गणतंत्र दिवस के मौके पर साल 2026 के लिए 131 पद्म पुरस्कारों की घोषणा की है. इस सूची में बिहार की तीन हस्तियों को जगह मिली है. इनमें से एक भोजपुरी लोक संगीत के सच्चे सिपाही भरत सिंह भारती को पद्मश्री सम्मान दिया गया है. यह सम्मान उनके दशकों लंबे सांस्कृतिक और सामाजिक योगदान का परिणाम है.
साधारण परिवार से असाधारण यात्रा
भरत सिंह भारती का जन्म करीब 1935 में भोजपुर जिले के नोनउर गांव में एक साधारण परिवार में हुआ. बचपन से ही संगीत के प्रति उनका झुकाव था. महज 10 साल की उम्र में उन्होंने गांव की कीर्तन मंडलियों में गाना शुरू कर दिया.
15 साल की उम्र में उन्हें बिहार के प्रसिद्ध पखावज और मृदंग गुरु शत्रुंजय प्रसाद सिंह (ललन जी) से विधिवत प्रशिक्षण मिला. इसके बाद उन्होंने भोजपुरी लोक गायन के साथ-साथ तबला, हारमोनियम, बाँसुरी, सितार, ढोलक और झाल जैसे वाद्य यंत्रों में भी महारत हासिल की.
भोजपुरी लोक परंपराओं के सच्चे रक्षक
भरत का सबसे बड़ा योगदान भोजपुरी लोक संस्कृति को बचाए रखना है. उन्होंने पवरिया, लोरी, जतसार, चौहट, कीर्तनीय, डोमकच और विदेशिया जैसे विलुप्तप्राय लोक गीतों और विधाओं को न केवल सहेजा, बल्कि नई पीढ़ी तक पहुंचाया. पवरिया, जो नवजात शिशु के जन्म पर गाया जाता है, और डोमकच, जो विवाह के समय महिलाओं द्वारा गाया जाता है, जैसी परंपराओं को उन्होंने दोबारा जीवंत किया.
1970 और 80 के दशक में जब संसाधन बेहद सीमित थे, तब भरत लालटेन की रोशनी में मंच पर गाते थे. वे साइकिल या बैलगाड़ी से गांव-गांव घूमकर लोक संगीत का प्रचार करते थे. कई बार एक ही माइक्रोफोन से पूरा कार्यक्रम होता था. उनकी यही लगन और मेहनत ग्रामीण बिहार में लोक कला को नया जीवन देने वाली साबित हुई.
हजारों युवाओं के लिए बने ‘गुरुजी’
बिहार में भरत सिंह भारती को सम्मान से “गुरुजी” कहा जाता है. उन्होंने अपने नोनउर घराने के जरिए 10 हजार से ज्यादा युवक-युवतियों को मुफ्त लोक संगीत की शिक्षा दी. खास तौर पर उन ग्रामीण लड़कियों को उन्होंने आगे बढ़ाया, जिन्हें सामाजिक कारणों से मंच नहीं मिल पाता था.
1995 में पटना के कंकड़बाग में तारा इंस्टीट्यूट ऑफ लर्निंग और 2005 में नोनउर में भारती संगीत कला मंदिर की स्थापना कर उन्होंने लोक संगीत को संस्थागत रूप दिया. आज ये संस्थान बिहार में सांस्कृतिक शिक्षा के बड़े केंद्र बन चुके हैं.
भरत सिंह भारती का जीवन इस बात का उदाहरण है कि सच्ची लगन से लोक परंपराओं को न केवल बचाया जा सकता है, बल्कि समाज को भी मजबूत किया जा सकता है.
Source: IOCL


























