मकर संक्रांति वाली पॉलिटिक्स: पिता की राह पर तेज प्रताप यादव! दही-चूड़ा भोज के क्या हैं मायने?
Tej Pratap Yadav: तेज प्रताप के दही-चूड़ा भोज को एक आम कार्यक्रम के तौर पर पेश किया जा रहा है, लेकिन इसके कई मायने निकाले जा रहे हैं. देखने वाली बात होगी कि तेज प्रताप के भोज में कौन-कौन पहुंचता है.

जनशक्ति जनता दल के प्रमुख और आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव मकर संक्रांति के मौके पर दही-चूड़ा का भोज करने वाले हैं. वे परिवार से भले अलग चल रहे हैं, लेकिन उन्होंने साफ कर दिया है कि इस भोज में वह अपनी पार्टी के और परिवार के लोगों को भी बुलाएंगे. बिहार की राजनीति के सभी दिग्गजों को निमंत्रण दिया जाएगा. सबसे बड़ा सवाल है कि इस भोज के क्या मायने हैं?
बीते मंगलवार (06 जनवरी, 2026) को तेज प्रताप यादव ने उपेंद्र कुशवाहा के बेटे और बिहार सरकार के मंत्री दीपक प्रकाश को निमंत्रण दिया. हालांकि आरजेडी और जेडीयू के कई नेताओं को अभी तक कार्ड नहीं मिला है, लेकिन नेताओं ने कहा है कि कार्ड मिलेगा तो विचार किया जाएगा.
तेज प्रताप का यह दही-चूड़ा वाला भोज बिहार की सियासत में काफी खास माना जा रहा है. वह इसलिए कि आरजेडी से निष्कासित होने के बाद यह उनकी पहली पार्टी है और उन्होंने इस भोज में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, दोनों उप मुख्यमंत्री (सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा) के साथ-साथ अपने भाई तेजस्वी यादव को भी निमंत्रण भेज रहे हैं. इसके अलावा चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा, जीतन राम मांझी को भी कार्ड देने की तैयारी शुरू कर दी गई है.
क्या संकेत दे रहा यह कार्यक्रम?
इस आयोजन को एक आम कार्यक्रम के तौर पर पेश किया जा रहा है, लेकिन इसके कई मायने निकाले जा रहे हैं. एक तरफ तेज प्रताप यादव और तेजस्वी यादव के बीच बढ़ती दूरी की चर्चा है तो दूसरी ओर तेज प्रताप की बीजेपी और अन्य एनडीए के नेताओं के साथ निकटता की चर्चाएं भी तेज हो गई हैं. ऐसे में इस 'दही-चूड़ा' के भोज को सिर्फ एक सांस्कृतिक मिलन समारोह के रूप में नहीं देखा जा रहा है, बल्कि इसे बिहार में उभरते राजनीतिक समीकरणों का आगामी संकेतक भी माना जा रहा है.
तेज प्रताप यादव ने 2025 में अपनी नई पार्टी बनाई और उसके बाद मकर संक्रांति पर वे पहली बार दही-चूड़ा का भोज करने जा रहे हैं. इससे यह साफ दिख रहा है कि वह अपने पिता लालू प्रसाद यादव के राह पर चल रहे हैं. दही-चूड़ा भोज की शुरुआत लालू प्रसाद यादव ने ही की थी. इसके बाद रामविलास पासवान ने की, फिर जेडीयू और बीजेपी के नेता भी करते रहे हैं. इस भोज के बाद का बिहार में राजनीतिक उठापटक भी हुई है. क्योंकि बिहार में मकर संक्रांति के बाद का दिन शुभ माना जाता है और कहा जाता है कि खरमास खत्म होते ही शुभ काम होने लगते हैं.
दही-चूड़ा भोज के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो 2017 में महागठबंधन की सरकार थी, लालू ने नीतीश को दही का टीका लगाया था. मजाकिया लहजे में उन्होंने कहा था कि अब बीजेपी के टोने का असर नहीं होगा. हालांकि कुछ ही दिनों बाद नीतीश कुमार बीजेपी के साथ चले गए थे. 2018 में तो लालू प्रसाद ने चारा घोटाले मामले में रांची में जज से जमानत देने के लिए कहा था, "हुजूर जमानत नहीं दीजिएगा तो दही-चूड़ा का भोज कैसे करेंगे". देखने वाली बात होगी कि तेज प्रताप के भोज में कौन-कौन पहुंचता है.
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Source: IOCL























