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दीपक प्रकाश को MLC नहीं बनाए जाने की क्या है वजह? उपेंद्र कुशवाहा के 3 बड़े झटकों के समझें मायने

Bihar MLC Election: दीपक प्रकाश को MLC नही बनाए जाने पीछे क्या बड़ी वजह है इसको लेकर राजनीति गरमा गई है. बात दें इससे पहले उपेंद्र कुशवाहा को कई झटके लग चुके हैं.

बिहार विधान परिषद के 9 सीटों का चुनाव होना है. इसके लिए एनडीए की ओर से बीजेपी, जेडीयू और लोजपा रामविलास की ओर से कुल आठ उम्मीदवारों के नाम की घोषणा कर दी गई है. इनमें चार बीजेपी, तीन जेडीयू और एक लोजपा से शामिल है. हालांकि जेडीयू ने चार उम्मीदवार उतारे हैं. इसमें एक नीतीश कुमार के बाद खाली हुई सीट पर उपचुनाव का है.  

आठ उम्मीदवारों के घोषणा के बाद यह तय हो चुका है कि एनडीए ने अपने सभी उम्मीदवारों के नाम की घोषणा कर दी है. क्योंकि 243 सीटों वाले विधानसभा में बहुमत के हिसाब से एक सीट पर महागठबंधन का उम्मीदवार का जीतना तय है. अब ऐसे में राष्ट्रीय लोक मोर्चा  पार्टी के सुप्रीमो उपेंद्र कुशवाहा के लिए यह एक बड़े झटके से कम नहीं है, क्योंकि बिहार सरकार के मंत्रिमंडल में उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बनवाया. 

पंचायती राज मंत्री हैं दीपक प्रकाश

दीपक प्रकाश अभी पंचायती राज मंत्री हैं, लेकिन दीपक प्रकाश किसी सदन के सदस्य नहीं है. नियमों के अनुसार 6 महीने के अंदर उन्हें किसी सदन का सदस्य होना अनिवार्य है. ऐसे में अगर दीपक प्रकाश को एमएलसी नहीं बनाया गया तो उनका मंत्री पद भी जा सकता है.

ऐसी चर्चा थी कि एक सीट उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को मिल सकती है, जिस पर दीपक प्रकाश एमएलसी बन सकते हैं. लेकिन उम्मीदवारों की घोषणा के बाद यह तय हो चुका है कि एनडीए में सभी 8 सीटों का बंटवारा हो चुका है.

अब सवाल उठ रहा है कि क्या बीजेपी,जेडीयू उपेंद्र कुशवाहा को नाराज करके चलना चाहती है. क्योंकि अगर दीपक प्रकाश को एमएलसी नहीं बनाया गया तो उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ेगा. देखा जाए तो 2024 के लोकसभा चुनाव से लेकर अब तक उपेंद्र कुशवाहा को तीन बड़े-बड़े झटके मिले हैं. 

लोकसभा चुनाव में लगा पहला झटका

सबसे पहले एनडीए गठबंधन से उपेंद्र कुशवाहा अपनी पार्टी की टिकट पर 2024 का लोकसभा चुनाव लड़े, लेकिन इस सीट पर भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार पवन सिंह निर्दलीय चुनाव मैदान में आ गए और उपेंद्र कुशवाहा तीसरे नंबर पर चले गए. पवन सिंह के कारण उनकी करारी हार हुई और महागठबंधन का उम्मीदवार चुनाव जीत गया. 

अगर पवन सिंह नहीं होते तो उनकी जीत सुनिश्चित थी. उस वक्त ऐसी चर्चा रही कि बीजेपी ने अप्रत्यक्ष रूप से उपेंद्र कुशवाहा को हराने के लिए पवन सिंह को निर्दलीय चुनाव मैदान में उतारा है. हालांकि उपेंद्र  कुशवाहा की सीट काराकाट से पवन सिंह का चुनाव लड़ने का असर  एनडीए पर हुआ और उस सीट के अलावा कई सीटों पर एनडीए  को हार का सामना करना पड़ा. 

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जिसके बाद बीजेपी ने उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेज दिया. 2026 के राज्यसभा चुनाव में भी उन्हें उम्मीदवार बनाकर राज्यसभा भेजा गया. इसकी बड़ी वजह यह रही की बिहार में कुशवाहा जाति की संख्या दूसरे नंबर पर है और उपेंद्र कुशवाहा कुशवाहा समाज के एक बड़े के नेता के रूप में पहचान रखते हैं.

उपेंद्र कुशवाहा को लगा दूसरा झटका

उपेंद्र कुशवाहा को दूसरा झटका तब लगा जब बीजेपी के मुख्यमंत्री बने और उसमें सम्राट चौधरी जो कुशवाहा जाति से आते हैं. उनको मुख्यमंत्री बनाया गया. सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने तो कहीं ना कहीं उपेंद्र कुशवाहा कमजोर होते देख रहे हैं. कुशवाहा समाज के लोग अब उपेंद्र कुशवाहा को छोड़कर सम्राट चौधरी को अपना बड़ा नेता मानने लगे हैं. 

कुशवाहा को लगा तीसरा बड़ा झटका

अब तीसरा बड़ा झटका एमएलसी चुनाव में लगा है जहां मंत्री रहते हुए उपेंद्र कुशवाहा के बेटे को एमएलसी का टिकट नहीं दिया गया है. इस पूरे मामले पर राजनीतिक जानकार और वरिष्ठ पत्रकार संतोष कुमार ने कहा कि निश्चित तौर पर उपेंद्र कुशवाहा एनडीए में शामिल हैं.

परंतु उन्हें कमजोर करने की कोशिश की जा रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा हार गए और बीजेपी ने यह माना कि कुशवाहा समाज की नाराजगी से लोकसभा चुनाव में हार मिली है. जिसके बाद उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेजा गया और 2025 के चुनाव में 202 सीटों से चुनाव जीती.

लेकिन अब सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाया गया है और कुशवाहा समाज के लोग अपनी जाति के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को नेता बड़ा नेता मानने लगे हैं. ऐसे में बीजेपी यह समझ रही है कि अब उपेंद्र कुशवाहा की जरूरत नहीं है और कुशवाहा वोट बैंक साधने  के लिए सम्राट चौधरी अकेले काफी हैं, इसलिए पवन सिंह को मौका दे दिया गया.

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