अमेरिका-ईरान टकराव के पीछे क्या है असली वजह? खामनेई के देश का भी ट्रंप करेंगे वेनेजुएला वाला हाल!
US-Iran Tension: ट्रंप सरकार ने ईरान से तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त टैक्स लगाने की नीति शुरू की है. इसके साथ ही उन जहाजों पर भी नजर रखी जा रही है, जिनके जरिए ईरान गुपचुप तरीके से तेल बेचता है.

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनते ही पश्चिम एशिया में हालात फिर तनावपूर्ण हो गए हैं. ईरान पर नए प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं, सैन्य धमकियां तेज हो गई है और व्यापारिक मोर्चे पर भी सख्ती बढ़ाई जा रही है. इन सबके बीच बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिका ईरान से टकराव चाहता है या फिर इसके पीछे तेल, चीन और वैश्विक ताकत की राजनीति छिपी है.
पहले भी सख्त रहे हैं ट्रंप
अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने ईरान के खिलाफ बेहद कड़ा रुख अपनाया था. अमेरिका ने न्यूक्लियर समझौते से बाहर निकलकर ईरान पर भारी आर्थिक पाबंदियां लगाईं. इसका सीधा असर ईरान की अर्थव्यवस्था पर पड़ा और तेल की बिक्री बुरी तरह गिर गई. अब सत्ता में लौटने के बाद ट्रंप उसी नीति को और तेज करने में जुटे हैं.
युद्ध की आहट और अंदरूनी अस्थिरता
साल 2025 के मध्य में इजरायल और ईरान के बीच कुछ दिनों तक लड़ाई चली, जिसमें अमेरिका ने इजरायल का साथ दिया. इस टकराव में ईरान की सैन्य ताकत को नुकसान पहुंचा, हालांकि उसने भी जवाबी कार्रवाई की. इसके बाद 2026 की शुरुआत में ईरान के अंदर हालात बिगड़ने लगे. महंगाई और बेरोजगारी से परेशान लोग सड़कों पर उतर आए, जिससे सरकार पर दबाव बढ़ गया.
प्रदर्शनों को लेकर अमेरिका का रुख
ट्रंप ने सार्वजनिक तौर पर ईरान में हो रहे विरोध प्रदर्शनों का समर्थन किया, लेकिन जानकार मानते हैं कि यह समर्थन नहीं, बल्कि रणनीति है. कमजोर होती स्थिति का फायदा उठाकर अमेरिका ईरान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर और अलग-थलग करना चाहता है.
वेनेजुएला वाली नीति
अमेरिका ने पहले वेनेजुएला में इसी तरह की नीति अपनाई थी. वहां लंबे समय तक प्रतिबंध लगाए गए, सत्ता को कमजोर किया गया और फिर अमेरिकी तेल कंपनियों के लिए रास्ता साफ हुआ. इस पूरी प्रक्रिया में तेल सबसे बड़ा कारण रहा. अब विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान के मामले में भी अमेरिका कुछ ऐसा ही करना चाहता है.
ईरान का तेल और चीन का कनेक्शन
ईरान तेल उत्पादन के मामले में दुनिया के बड़े देशों में शामिल है. हालांकि प्रतिबंधों के कारण उसका तेल निर्यात सीमित हो गया है और जो भी तेल बिक रहा है, उसका बड़ा हिस्सा चीन खरीद रहा है. ट्रंप प्रशासन चीन को अपना मुख्य प्रतिद्वंद्वी मानता है, इसलिए ईरान पर दबाव बढ़ाकर वह चीन की ऊर्जा आपूर्ति को भी झटका देना चाहता है.
नई रणनीति: आर्थिक घेराबंदी
ट्रंप सरकार ने ईरान से तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त टैक्स लगाने की नीति शुरू की है. इसके साथ ही उन जहाजों पर भी नजर रखी जा रही है, जिनके जरिए ईरान गुपचुप तरीके से तेल बेचता है. अमेरिकी नौसेना की मौजूदगी खाड़ी क्षेत्र में बढ़ा दी गई है, ताकि ईरान की गतिविधियों पर काबू रखा जा सके.
सीधे युद्ध से क्यों बच रहा है अमेरिका
हालांकि बयानबाजी तेज है, लेकिन अमेरिका फिलहाल खुली जंग से बचना चाहता है. अगर बड़ा युद्ध हुआ और हॉर्मुज जलडमरूमध्य बंद हुआ, तो तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं. इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा, जिसमें खुद अमेरिका भी शामिल है.
असली मकसद क्या है
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान पर दबाव डालने का मुख्य कारण आतंकवाद नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक हित हैं. अमेरिका चाहता है कि ईरान या तो नई शर्तों पर समझौता करे या फिर इतना कमजोर हो जाए कि उसकी नीति बदली जा सके. इस पूरे खेल में तेल, चीन और वैश्विक ताकत की होड़ सबसे अहम है.
आगे बढ़ सकता है खतरा
अगर हालात और बिगड़े, तो पूरा मिडिल ईस्ट इसकी चपेट में आ सकता है. ईरान समर्थित गुट सक्रिय हो सकते हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है. भारत जैसे देशों को भी महंगे तेल और बढ़ती महंगाई का सामना करना पड़ सकता है. फिलहाल दुनिया ट्रंप के अगले कदम और ईरान की प्रतिक्रिया का इंतजार कर रही है.
टॉप हेडलाइंस
Source: IOCL






















