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मोदी के चेहरे के सहारे यूपी में 14 साल का बनवास खत्म करने के लिए कमर कस रही BJP

नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव में प्रचंड सीटों के साथ केंद्र में बीजेपी को सत्ता में स्थापित करने वाले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में पार्टी सामाजिक न्याय और सोशल इंजीनियरिंग के जरिये जाति आधारित गणित, विकास और सामाजिक समरसता के चुनावी मंत्र के साथ सत्ता में 14 साल के बनवास को खत्म करने के लिए कमर कस रही है. हालांकि मुख्यमंत्री का कोई चेहरा नहीं होना, दूसरे दलों से आए नेताओं की भीड़ और नोटबंदी पार्टी के लिए चुनौती बनी हुई है.

मोदी के चेहरे के सहारे यूपी में 14 साल का बनवास खत्म करने के लिए कमर कस रही BJP

चुनाव किसी जाति, सम्प्रदाय या परिवारवाद के आधार पर नहीं

बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव श्रीकांत शर्मा ने कहा कि इस बार का चुनाव किसी जाति, सम्प्रदाय या परिवारवाद के आधार पर नहीं बल्कि केवल ‘विकासवाद’ के नाम पर होगा. पिछले 15 साल में एसपी और बीएसपी दोनों ने राज्य की जनता को धोखा दिया है इसलिए उत्तरप्रदेश को सबसे अधिक सुशासन और विकास की जरूरत है.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बीजेपी का नव उदारवाद से पुनर्वितरणकारी न्याय की ओर प्रस्थान अकेले नोटबंदी के सहारे नहीं आया है. मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने बीजेपी के सियासी समाजशास्त्र को दोबारा गढ़ा है और उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए बड़े पैमाने पर सोशल इंजीनियरिंग के माध्यम से जाति आधारित गणित को नई शक्ल दी है.

मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने अपनाया नया चोला

हिन्दी पट्टी में मंडल राजनीति से प्रेरित तीसरे मोर्चे की राजनीति के जवाब में आज बीजेपी ने मोदी के नेतृत्व में नया चोला अपनाया है. इसका उदाहरण बीजेपी शासित राज्यों में आधे मुख्यमंत्री और इन राज्यों में अधिकतर प्रदेश अध्यक्ष ओबीसी समुदाय से हैं.

उत्तरप्रदेश में बीजेपी हर मंच पर जिन नेताओं को आगे कर रही है, उनमें केंद्रीय मंत्री एवं झांसी से सांसद उमा भारती, बीएसपी से बीजेपी में आए नेता स्वामी प्रसाद मौर्य, अपना दल की नेता एवं केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल और प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य शामिल हैं.

अब तक मुख्यमंत्री पद का कोई चेहरा नहीं

इसके बावजूद उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने अब तक मुख्यमंत्री पद का कोई चेहरा पेश नहीं किया है. पार्टी को बिहार चुनाव में मुख्यमंत्री पद का कोई चेहरा नहीं पेश किये जाने का खामियाजा उठाना पड़ा था.

बीएसपी, कांग्रेस, एसपी जैसे दलों के विधायकों और नेताओं का बीजेपी में शामिल होना और उनका चुनाव में उतरने की तैयारी करना पार्टी के अंदर एक चुनौती का विषय है जिसकी छाप टिकट बंटवारे पर दिखने की संभावना है. बीएसपी, एसपी, कांग्रेस से पाला बदलकर बीजेपी में शामिल हुए विधायकों और नेताओं में बीएसपी से आए राजेश त्रिपाठी, बाला अवस्थी, महावीर राणा, रोशल लाल वर्मा, रोमी साहनी, ओम कुमार, धर्मसिंह सैनी, रमेश कुशवाहा, रजनी देवी, बृजेश कुमार वर्मा, ममतेश शाक्य, गेंदालाल चौधरी, राधाकृष्ण शर्मा और छोटे लाल वर्मा प्रमुख हैं.

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मोदी अब भी राज्य में बीजेपी की कामयाबी की कुंजी

कांग्रेस से आए विधायकों में संजय प्रसाद जायसवाल, एसपी से आए विधायकों में शेर बहादुर सिंह, श्याम प्रकाश और डा. अजय कुमार पाशी प्रमुख हैं. दूसरे दलों से बीजेपी में आए कई नेताओं को पार्टी ने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी भी है जिनमें कौशल किशोर, स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान, राजेश वर्मा, ब्रजेश पाठक और रीता बहुगुणा जोशी शामिल हैं. बावजूद इसके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अब भी राज्य में बीजेपी की कामयाबी की कुंजी हैं.

केंद्रीय मंत्री एवं बीजेपी के वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि ‘‘बबुआ अखिलेश यादव और बुआ मायावती’’ दोनों ने उत्तरप्रदेश को बर्बाद कर दिया. दोनों की सरकारों के दौरान कानून व्यवस्था नाम की चीज नजर नहीं आई. समाजवादी पार्टी की सरकार राज्य में जमीन और खनन माफिया पर लगाम लगाने में नाकाम रही है.’’

उन्होंने कहा कि ‘बुआ और बबुआ’, ‘चाचा और भतीजा’ का खेल बहुत हो गया. जनता इनसे उब चुकी है और राज्य की सत्ता में परिवर्तन चाहती है. उत्तर प्रदेश की जनता ने इस बार बीजेपी को जनादेश देने का मन बना लिया है. मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले का भी राज्य में चुनाव पर असर पड़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है.

जुगाड़ से सत्ता में वापसी की कवायद

अखिलेश सरकार पर निशाना साधते हुए श्रीकांत शर्मा ने कहा, ‘‘एक तरफ अखिलेश यादव विकास का ढोल पीटते हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस और अजीत सिंह के राष्ट्रीय लोक दल से गठबंधन का जुगाड़ कर रहे हैं.’’ उन्होंने कहा, ‘‘अखिलेश यादव और एसपी को जमीनी हकीकत का पता चल गया है और पराजय साफ दिख रही है. इसलिए मुख्यमंत्री जुगाड़ से सत्ता में वापसी की कवायद में लगे हैं. ’’

बीजेपी के पाले से अलग होता गया ओबीसी समुदाय

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 1991-92 में राम मंदिर आंदोलन से उपजी लहर के बाद ओबीसी समुदाय के समर्थन के आधार पर बीजेपी उत्तर प्रदेश में सत्ता में आई थी और इसके बाद बीजेपी नेता कल्याण सिंह ने पार्टी के लिए ओबीसी वोटबैंक को मजबूत बनाने का काम किया था. साल 2002 से 2014 के बीच ओबीसी समुदाय धीरे-धीरे बीजेपी के पाले से अलग होते गए और राज्य में पार्टी ढलान पर आ गई.

पार्टी ने सामाजिक आर्थिक जनगणना के आंकड़ों का अध्ययन करने के बाद इसके आधार पर जनधन योजना, मुद्रा बैंक, प्रधानमंत्री जीवन सुरक्षा योजना, उज्जवला योजना, दलित उद्यमियों के लिए प्रावधान, बेटी पढ़ाओ. बेटी बचाओ कार्यक्रम आदि शुरू किए हैं ताकि इनका फायदा पिछड़ा वर्ग समेत गरीब तबकों को मिले और फिर वह खुद इसका चुनावी फायदा हासिल कर सके. प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में बीजेपी उम्मीद लगाये हुए है कि सामाजिक समरसता के नये चुनावी मंत्र से वह राज्य में 14 साल के ‘बनवास’ का सिलसिला इस बार तोड़ेगी.

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