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हाजी इब्राहीम: वह अपने काम में माहिर और ईमानदार आदमी था

शराब पानी की तरह और अफ़ीम नमक मिर्च की तरह बिकते. न किसी थाने वाले को ऐतराज और न किसी मौलवी को शिकायत. इस स्थिति में हम चार कुंवारे कहां तक साधना करते. आख़िर रंग पकड़ने लगे. मैं और डॉक्टर वारिस रात आठ बजे निकलते और एक बजे घर लौटते.

हाजी इब्राहीम की धार्मिकता का डंका पूरे शहर में बजता था. लेकिन एक दिन जब उसके घर से उठने वाली शराब की उस गंध की पहेली सुलझी तो हमारे होश ही उड़ गए.

हाजी इब्राहीम

अली अकबर नातिक

haji

यह एक छोटा सा शहर था. मुझे यहां एक कंपनी की ओर से मिल्क कलेक्शन सुपरवाइज़र की नौकरी मिल गई. मेरा काम यह था कि मैं सतलुज नदी और सीमावर्ती इलाक़ों का सर्वे करके बताऊं कि यहां दूध कितना पैदा होता है और कम लागत पर अधिक और अच्छे किस्म का दूध कैसे हासिल किया जा सकता है. यह वह समय था जब दोनों ओर के लोग रेंजर्स से मिलकर अदला-बदली (बार्टर सिस्टम) के रूप में व्यापार करते थे. यह शहर सीमा के सबसे क़रीब था इसलिए यह इसमें सबसे आगे था.

माल-मवेशी, शराब, पान और हथियार की तस्करी यहां की संस्कृति में पैठ गई. पान की पीक से रंगीन गलियां और शराब पी कर बहकने वालों की भीड़ आम बात थी. सीमा पार से शराब की आमद ने यहां की मंडी को ऐसा बढ़ावा दिया कि यहां से दूसरे शहरों को भी सप्लाई होने लगी. मांग बढ़ी तो लोगों ने उसे पूरा करने के लिए घरों में भट्टियां लगा लीं.

मेरे साथ तीन सहयोगी और एक इंचार्ज अधिकारी भी था. यह अधिकारी, शादीशुदा, सुशील और परहेज़गार आदमी था. कंपनी ने उसे एक जीप दे रखी थी. उसने अपना मकान वहां से 30 किलोमीटर दूर एक दूसरे शहर में ले लिया, जहां वह बीवी-बच्चों के साथ रहने चला गया. हमें मोटर बाइक मिली थी इसलिए हमें यहीं रहना था. कंपनी ने यहां बर्फ़-ख़ाने में दूध ठंडा करने का एक चिलिंग प्लांट लगा दिया कि आस-पास के गांव से आने वाले दूध को दो डिग्री सेंटीग्रेड तक लाया जाए ताकि केंद्रीय प्लांट तक पहुंचने से पहले ख़राब न हो. यह कारख़ाना हाजी इब्राहीम का था.

शहर में इसके अलावा उनके दो पेट्रोल पंप और एक यूरिया खाद की एजेंसी भी थी, यानी धनी-मानी आदमी था. पांच बार हज कर चुका था. लोग उसे हाजी इब्राहीम के नाम से बुलाते और आदर करते. हाजी साहब स्वभाव के अच्छे और मिलनसार आदमी थे. मैं जब भी उन्हें देखता, प्रभावित हुए बिना नहीं रहता, लेकिन आए दिन किराए को लेकर उसकी कंपनी के साथ खिच-खिच होती.

यह शहर रंगा-रंगी और आकर्षण में अपनी मिसाल था. यहां 10-12 मदरसे (स्कूल) थे जहां पांच हज़ार के क़रीब लड़के पढ़ते और लगभग सारा शहर नमाज़ पढ़ता था. आए दिन शिया सुन्नी की बहस होती रहती, एक ओर मजलिस होती तो दूसरी ओर साहाबा (पैग़ंबर मुहम्मद के साथियों) की याद में समारोह आयोजित होते और दोनों ओर नारे लगाती हुई जनता की भीड़ मजहबी ईमान को बल देती. दूसरी ओर यह हालत थी कि शहर जीवंत था.

मुजरे, थिएटर, ढोल-ताश, क़व्वाल रात-रात भर महफ़िलें जमाए रखते. कहीं क़िस्सागोई, कहीं मुजरा. एक कोने में थिएटर है तो दूसरे में नाच. कोई घर तबले और बाजे से ख़ाली नहीं था. ख़ुदा को मालूम है कि इनमें तबले की थाप का हुनर जनमजात था. हमने बीसियों बार शर्त लगाकर आज़माया, इस शहर का छोटे-से लेकर बड़े तक, हर पेशे और जाति का शख्स तबला बजाने का हुनर जानता था. यही हाल उनके बाजा बजाने का था. हर रोज़ किसी पीर का उर्स होता. यह उर्स मुर्ग़, बटेर, बैल और कुत्ते लड़ाने वालों के लिए मानो ईद का दिन होता था. गली-गली रंडियां सौदा तय करतीं और नौजवान शराब की दावत की मिन्नतें करते. उन्हीं में हेरोइन और चरस बेचने वाले मिल जाते.

शराब पानी की तरह और अफ़ीम नमक मिर्च की तरह बिकते. न किसी थाने वाले को ऐतराज और न किसी मौलवी को शिकायत. इस स्थिति में हम चार कुंवारे कहां तक साधना करते. आख़िर रंग पकड़ने लगे. मैं और डॉक्टर वारिस रात आठ बजे निकलते और एक बजे घर लौटते. रोज़ मुजरा और थिएटर देखते. जिस मुहल्ले में हमारा रहना था वह पुराने क़िले के साथ लगा था और पुराने क़िले को हीरा मंडी समझा जाता था. क़िला और उसकी आबादी एक ऊंचे टीले पर थी और यहीं असली शहर था. विभाजन के बाद उसके आस-पास नई बस्तियां बसीं. फिर इस इलाक़े को पुराना क़िला कहा जाने लगा और नई आबादी को शहर का नाम दे दिया गया.

कुछ ही दिनों में हमारी यहां जान पहचान हो गई. इसका बड़ा कारण था कि जिस आदमी से मकान किराए पर लिया वही हमारी दलाली करता. मुझे आज भी स्वीकार है कि वह अपने काम में माहिर और ईमानदार आदमी था. शराब को नापाक और इस्लाम में हराम समझ कर बिलकुल नहीं पीता था और नमाज़ के बारे में कहता था कि जब दलाली छोड़ दूंगा तो पहले हज यात्रा पर जाऊंगा, उसके बाद नमाज़ पढ़ना शुरू करूंगा. वह दलाली के साथ हकीमी भी करता था. इन दो कारोबार का साथ उसे इतना भाया कि उसका डंका पूरे शहर में बजने लगा. पुराने शहर की तंग गलियां. छोटे मकान और मकानों के अंदर ही छोटी-छोटी दुकानें थीं जिनमें चाय और मिठाई के होटल ज्यादा थे. यहां दिन भर ताश खेली जाती और सौदे होते.

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(अली अकबर नातिक की कहानी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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