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Xप्लेन: चीनी महंगी होने पर गन्ना नहीं, तो किससे बनेगा E20 पेट्रोल? समझें इंजन पर असर का पूरा गणित

E20 Fuel Controversy: केंद्र सरकार ने कहा है कि E20 या E10 पर वापस जाने का कोई प्लान नहीं है. इसकी वजह देशभर के 1 लाख से ज्यादा पेट्रोल पंपों पर अलग-अलग ब्लेंड्स की सप्लाई चेन बनाए रखना है.

इन दिनों चीनी यानी शक्कर ने जो रफ्तार पकड़ी है, उससे आम आदमी की जेब तो जल ही रही है, साथ ही सरकार की फिक्र भी बढ़ गई है. जुलाई 2026 से चीनी के दाम करीब 10 फीसदी बढ़ चुके हैं. त्योहारी सीजन आने वाला है. ऐसे में चीनी की मांग और बढ़ेगी. अब सरकार अक्टूबर से शुरू होने वाले नए सीजन में एथेनॉल बनाने के लिए गन्ने के इस्तेमाल पर रोक लगाने पर विचार कर रही है. यानी जो गन्ना पहले एथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होता था, उसे अब सीधे चीनी बनाने में लगाया जाएगा. तो क्या अब E20 पेट्रल मिलना बंद हो जाएगा, कैसे चीनी की मांग बढ़ रही है और बिना चीनी वाला E20 पेट्रोल कितना हानिकारक होगा...

पहले समझें कि चीनी के दाम 10% क्यों बढ़े?

चीनी की कीमतों में इस उछाल के पीछे दो बड़ी वजहें हैं:

  • कम बारिश का संकट: देश के सबसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्यों महाराष्ट्र और कर्नाटक में इस बार कम बारिश हुई है. इससे अगले साल गन्ने का उत्पादन घटने की आशंका है, जिसका सीधा असर चीनी की उपलब्धता पर पड़ेगा.
  • त्योहारी सीजन की बढ़ती मांग: भारत में अगस्त से नवंबर तक गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे बड़े त्योहार आते हैं. इन मौकों पर मिठाइयों और कन्फेक्शनरी की खपत बढ़ जाती है, जिससे चीनी की मांग तेज हो जाती है.

महाराष्ट्र के कोल्हापुर में थोक चीनी की कीमत 4,716 रुपये प्रति 100 किलोग्राम के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है. बॉम्बे शुगर मर्चेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक जैन ने बताया, 'त्योहारी सीजन से पहले मांग बढ़ गई है, लेकिन मिलें कीमतें और बढ़ने की उम्मीद में सप्लाई रोक रही हैं.'

चीनी की बढ़ती कीमतों ने महंगाई को भी हवा दी है. जून में खुदरा महंगाई 17 महीनों में पहली बार RBI के टारगेट से ऊपर चली गई थी.

तो अब सरकार क्या करना चाहती है?

केंद्र सरकार के पास चीनी की कीमतें काबू करने के लिए एक ऑप्शन है कि एथेनॉल बनाने में गन्ने का इस्तेमाल कम करना. 2026 (सितंबर तक चलने वाले सीजन में) चीनी मिलों ने कुल उत्पादन का करीब 10 फीसदी यानी लगभग 30 लाख मीट्रिक टन चीनी एथेनॉल बनाने के लिए डायवर्ट की थी.

अगर अगले सीजन में गन्ने के इस डायवर्जन पर रोक लगाई जाती है, तो घरेलू बाजार में इतनी ही अतिरिक्त चीनी मिल सकेगी. इससे कम बारिश के कारण उत्पादन में होने वाले संभावित घाटे की भरपाई हो जाएगी और भारत को चीनी आयात करने की नौबत नहीं आएगी.

सरकारी और उद्योग सूत्रों के मुताबिक, मिलों को गन्ने के रस और B-हेवी मोलासेस (जिसमें शुगर की मात्रा ज्यादा होती है) से एथेनॉल बनाना बंद करने को कहा जा सकता है. इसके बजाय उन्हें C-हेवी मोलासेस (जिसमें से ज्यादातर शुगर निकाल ली गई हो) से एथेनॉल बनाने की इजाजत दी जाएगी. इस मामले पर अंतिम फैसला अगले महीने के आखिर तक आ सकता है.

ध्यान रहे, सरकार की ओर से अब तक कोई ऑफिशियल स्टेटमेंट नहीं आया है.

तो क्या अब E20 पेट्रोल नहीं मिलेगा?

नहीं, E20 पेट्रोल बंद नहीं होगा. सरकार ने साफ कर दिया है कि E20 या E10 पेट्रोल पर वापस जाने की कोई योजना नहीं है. सरकार का पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने का प्रोग्राम चलता रहेगा. लेकिन गन्ने से एथेनॉल कम बनेगा तो एथेनॉल कहां से आएगा? इसका जवाब है- मक्का (कॉर्न) और चावल.

E20 में गन्ने का रस या चीनी सीधे तौर पर नहीं मिलाई जाती. यह एक गलत धारणा है. दरअसल, फ्यूल-ग्रेड इथेनॉल गन्ने के रस, B-हेवी/सी-हेवी मोलासेस (गुड़ बनाने के बाद बचने वाला गाढ़ा रस), टूटे हुए चावल और मक्का जैसे कच्चे माल से इंडस्ट्रियल प्रोसेस (फर्मेंटेशन और डिस्टिलेशन) के जरिए बनाया जाता है. यह एक रिफाइंड फ्यूल है, जो अपने मूल कच्चे माल जैसा बिल्कुल नहीं दिखता. पेट्रोल में मिलाने से पहले यह सख्त क्वालिटी स्टैंडर्ड्स को पास करता है.

बहरहाल, केंद्र सरकार E20 ब्लेंडिंग प्रोग्राम को जारी रखने के लिए मक्का और चावल के इस्तेमाल को बढ़ाएगी. इनकी स्टॉक पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है. यानी E20 पेट्रोल मिलता रहेगा, बस उसका कच्चा माल गन्ने से मक्के-चावल की तरफ शिफ्ट हो सकता है.

तो क्या मक्का या चावल से बना इथेनॉल ज्यादा हानिकारक?

नहीं. इंजन पर असर इस बात से नहीं होता कि इथेनॉल किस कच्चे माल से बना है, बल्कि इस बात से होता है कि इथेनॉल की क्वालिटी और शुद्धता कैसी है. चाहे गन्ना हो, मक्का हो या चावल, सभी सोर्स से बना फ्यूल-ग्रेड इथेनॉल   एक ही रासायनिक यौगिक (C₂H₅OH) होता है. पेट्रोल में मिलाने से पहले उसे एक जैसे मानकों पर खरा उतरना होता है.

केंद्र सरकार और उद्योग जगत की सभी रिपोर्ट्स इस बात की पुष्टि करती हैं कि E20 पेट्रोल से इंजन को कोई नुकसान नहीं होता. फिर चाहे इथेनॉल किसी भी सोर्स से बना हो.

पेट्रोलियम मंत्रालय ने ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI), इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) के साथ मिलकर कई टेस्ट किए. 40,000 किलोमीटर तक पैसेंजर व्हीकल्स और 20,000 किलोमीटर तक दोपहिया वाहनों पर किए गए ट्रायल्स में E20 का ड्राइवेबिलिटी या फ्यूल एफिशिएंसी पर कोई बड़ा नकारात्मक असर नहीं पाया गया.

इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) ने भी साफ कहा कि E20 पेट्रोल से इंजन फेल होने या गाड़ी खराब होने का अब तक कोई मामला सामने नहीं आया है.

क्या सरकार E20 वापस ले सकती है?

नहीं. एक्सपर्ट्स का कहना है कि सरकार का E20 या E10 पर वापस जाने का कोई प्लान नहीं है. इसकी वजह यह है कि देशभर के 1 लाख से ज्यादा पेट्रोल पंपों पर अलग-अलग ब्लेंड्स की सप्लाई चेन बनाए रखना बहुत मुश्किल और महंगा होगा.

सरकार का कहना है कि 2023 से पहले बनी गाड़ियां भी E20 पेट्रोल पर बिना किसी परेशानी के चल सकती हैं. दरअसल, E15+ पेट्रोल देशभर में साढ़े तीन साल से ज्यादा समय से इस्तेमाल हो रहा है. E19-E20 पेट्रोल ढाई साल से ज्यादा समय से चल रहा है. 20 करोड़ से ज्यादा दोपहिया और 3 करोड़ से ज्यादा पेट्रोल कारें इन ब्लेंड्स पर चल रही हैं.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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