Xप्लेन: गोवा में BJP सरकार को क्यों धर्मांतरण-रोधी विधेयक वापस लेना पड़ा? जानिए
यह फैसला तब लिया गया जब प्रस्तावित कानून का चौतरफा विरोध शुरू हुआ. विपक्षी दलों, एक्टिविस्ट समूहों, कैथोलिक चर्च और खुद सत्ताधारी बीजेपी के कुछ विधायकों ने इस बिल पर गंभीर आपत्तियां जताई थीं

गोवा सरकार ने सोमवार (31 अगस्त) को विधानसभा के मॉनसून सत्र की शुरुआत से ठीक पहले अपना प्रस्तावित 'गोवा गैर-कानूनी धर्म-परिवर्तन निषेध विधेयक, 2026' वापस ले लिया. राज्य कैबिनेट से मंजूरी मिलने के महज एक सप्ताह बाद इस विवादित बिल को सदन के दैनिक कामकाज की सूची में शामिल किया गया था. हालांकि, मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत द्वारा भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के विधायकों के साथ की गई एक अहम बैठक के बाद सरकार ने इसे एजेंडे से हटाने का फैसला किया.
बैठक के तुरंत बाद विधायी मामलों के विभाग ने विधानसभा के कामकाज की एक संशोधित सूची जारी की, जिससे इस बिल को पूरी तरह बाहर कर दिया गया था.
विरोध की वजह और राजनीतिक समीकरण
यह फैसला तब लिया गया जब प्रस्तावित कानून का चौतरफा विरोध शुरू हो गया. विपक्षी दलों, नागरिक समाज, एक्टिविस्ट समूहों, कैथोलिक चर्च और खुद सत्ताधारी बीजेपी के कुछ विधायकों ने इस बिल पर गंभीर आपत्तियां जताई थीं.
गोवा में कैथोलिक ईसाई समुदाय की आबादी लगभग 25 प्रतिशत है और राज्य की राजनीति में उनका महत्वपूर्ण प्रभाव है. पार्टी के भीतर तटीय और अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले कई विधायकों ने तर्क दिया कि गोवा में जबरन धर्मांतरण का कोई बड़ा मुद्दा या सरकारी आंकड़ा मौजूद नहीं है. ऐसे में इस तरह का कानून लाने से सामाजिक सद्भाव प्रभावित हो सकता है.
इसके अलावा, आलोचकों ने कहा कि इस बिल को मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के धर्मांतरण-रोधी कानूनों की तर्ज पर तैयार किया गया था, जो गोवा की बहुसांस्कृतिक और शांतिप्रिय संस्कृति से मेल नहीं खाता.
प्रस्तावित गोवा बिल के मुख्य प्रावधान क्या
गोवा का यह प्रस्तावित कानून 'महाराष्ट्र धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम, 2026' और 'उत्तर प्रदेश गैर-कानूनी धर्म-परिवर्तन निषेध अधिनियम' पर आधारित था. इसके मुख्य बिंदु इस प्रकार थे
1. गैर-कानूनी धर्मांतरण की परिभाषा
बिल में स्पष्ट किया गया था कि यदि धर्म-परिवर्तन जबरदस्ती, दबाव, अनुचित प्रभाव, प्रलोभन, धोखाधड़ी या केवल शादी के उद्देश्य से किया जाता है, तो उसे गैर-कानूनी और संज्ञेय अपराध माना जाएगा.
2. पूर्व सूचना और प्रशासनिक प्रक्रिया
कानून के तहत धर्म बदलने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को कम से कम 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट (DM) के समक्ष एक हलफनामा जमा करना अनिवार्य था, जिसमें यह प्रमाणित करना होता कि यह निर्णय बिना किसी दबाव के लिया जा रहा है. इसके अलावा, धर्म-परिवर्तन की रस्म कराने वाले धर्मगुरु या व्यक्ति को भी 30 दिन पहले प्रशासन को सूचित करना होता.
3. शिकायतकर्ता का दायरा (उत्तर प्रदेश मॉडल)
गोवा के प्रस्तावित बिल और महाराष्ट्र के कानून में सबसे बड़ा अंतर यह था कि शिकायत कौन दर्ज करा सकता है. महाराष्ट्र में केवल पीड़ित व्यक्ति, उसके माता-पिता, भाई-बहन या नजदीकी रिश्तेदार ही शिकायत दर्ज करा सकते हैं. इसके विपरीत, गोवा के बिल में किसी भी तीसरे व्यक्ति को एफआईआर (FIR) दर्ज कराने का अधिकार दिया गया था, जो उत्तर प्रदेश के कड़े कानून के समान था.
4. कड़ी सजा और जुर्माने के नियम
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सामान्य मामले: गैर-कानूनी तरीके से धर्म-परिवर्तन कराने पर अधिकतम 10 साल तक की जेल का प्रावधान था.
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विशेष/संवेदनशील मामले: यदि धर्मांतरण कराने वाला व्यक्ति नाबालिग, महिला, मानसिक रूप से अस्वस्थ या अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) समुदाय का सदस्य हो, तो सजा को बढ़ाकर अधिकतम 14 साल की जेल करने का प्रस्ताव था.
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संस्थाओं पर कार्रवाई: यदि कोई संगठन या संस्था ऐसे किसी धर्मांतरण में लिप्त पाई जाती, तो उसकी सरकारी वित्तीय सहायता, अनुदान और मान्यता रद्द करने का प्रावधान भी शामिल किया गया था.
विधानसभा सत्र के पहले ही दिन इस बिल को वापस लेना गोवा सरकार के लिए एक बड़ा रणनीतिक कदम माना जा रहा है. मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने स्पष्ट किया कि सरकार समाज के सभी वर्गों के सुझावों और चिंताओं को ध्यान में रखकर ही आगे का फैसला लेगी.
विशेषज्ञों का मानना है कि गोवा जैसे राज्य में, जहां पर्यटन और बहुसांस्कृतिक भाईचारा अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, किसी भी संवेदनशील मुद्दे पर कड़ा कानून लागू करने से पहले व्यापक जन-सहमति अनिवार्य है. फिलहाल इस बिल को वापस लेकर सरकार ने राजनीतिक असंतोष और सामाजिक तनाव को टालने का प्रयास किया है.




















