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TRIPURA ELECTION: त्रिपुरा की राजनीति में नया अध्याय, क्या सीपीएम-कांग्रेस मिलकर रोक पाएंगी बीजेपी का विजय रथ, टिपरा मोथा ने खेला नया दांव

Tipra Motha IPFT: त्रिपुरा में सीपीएम-कांग्रेस गठबंधन के बीच टिपरा मोथा ने बीजेपी की सहयोगी IPFT को विलय का प्रस्ताव देकर नया दांव खेल दिया है. इससे बीजेपी की मुश्किलें बढ़ सकती है.

CPM Congress Alliance: राजनीति में कोई भी स्थायी तौर से सगा या दुश्मन नहीं होता. ये कहावत त्रिपुरा के बदले सियासी हालात पर बिल्कुल सही बैठता है. बीजेपी को जीत से रोकने के लिए मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) (CPM)  और कांग्रेस के बीच चुनाव पूर्व गठबंधन से त्रिपुरा के सियासी समीकरण ही बदल गए हैं. इस बीच टिपरा मोथा ने बीजेपी की सहयोगी IPFT के सामने विलय का प्रस्ताव रखकर त्रिपुरा के सियासी दंगल में नया मोड़ ला दिया है. 

जैसा कि कुछ दिनों के हलचल से लग रहा था,  सीपीएम और कांग्रेस त्रिपुरा में मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ेगी. सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी ने 11 जनवरी को ही कह दिया था कि बीजेपी के विजय रथ को रोकने के लिए सीपीएम, कांग्रेस के साथ गठजोड़ के लिए तैयार है. अगरतला में 13 जनवरी को कांग्रेस महासचिव अजय कुमार और सीपीएम के राज्य सचिव जितेंद्र चौधरी के बीच हुई बैठक के बाद गठबंधन का ऐलान कर दिया गया. 

त्रिपुरा की राजनीति में नए अध्याय की शुरुआत

सीपीएम और कांग्रेस गठबंधन से त्रिपुरा की राजनीति में नए अध्याय की शुरुआत हो गई है. नया अध्याय इसलिए भी कहना सही है क्योंकि यहां सीपीएम और कांग्रेस अब तक धुर विरोधी थे. त्रिपुरा में 1967 से विधानसभा चुनाव हो रहा है. बीते 6 दशक के राजनीतिक इतिहास में त्रिपुरा में सीपीएम और कांग्रेस उत्तर और दक्षिण ध्रुव की तरह थे. 2018 तक हमेशा ही त्रिपुरा की सत्ता के लिए इन दोनों दलों में ही भिडंत होते रही थी. लेफ्ट और कांग्रेस एक-दूसरे की धुर विरोधी के तौर पर त्रिपुरा में 53 साल राज कर चुके हैं. अब बीजेपी ने हालात ऐसे बना दिए हैं कि दोनों को एक साथ चुनाव लड़ना पड़ रहा है.   
 
सीपीएम-कांग्रेस को गठबंधन की क्या थी मजबूरी?

सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि धुर विरोधी होते हुए भी सीपीएम और कांग्रेस को गठबंधन करने की क्या मजबूरी थी. दोनों ही दलों के नेताओं ने बीते कुछ महीनों में कई बार ये बयान दिया था कि त्रिपुरा में किसी भी तरह से बीजेपी को दोबारा सत्ता में आने से रोकना होगा. जिस तरह से 2018 में त्रिपुरा की राजनीति में बीजेपी हावी हुई, उसको देखते हुए अलग-अलग चुनाव लड़कर सीपीएम और कांग्रेस दोनों के लिए बीजेपी को चुनौती देना आसान नहीं था. तमाम आकलन के बाद ही दोनों दलों ने साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया है, ताकि बीजेपी को किसी भी तरह से त्रिपुरा की सत्ता से बाहर करने में कामयाबी मिल सके. एक तरह से इसे मजबूरी का गठबंधन भी कहा जा सकता है. राजनीति में खुद के अस्तित्व पर खतरा आता है, तो धुर विरोधी भी कंधे से कंधा मिलाने को मजबूर हो जाते हैं और त्रिपुरा में ऐसा ही हुआ है.    

सीपीएम त्रिपुरा की सत्ता में चाहती है वापसी

2018 में हुए विधानसभा चुनाव में 25 साल से सत्ता पर काबिज सीपीएम को बीजेपी से मुंह की खानी पड़ी थी. सीपीएम को 60 में से सिर्फ 16 सीटों पर ही जीत मिली. बीजेपी के एतिहासिक प्रदर्शन से एक झटके में ही  त्रिपुरा पर ढाई दशक से चली आ रही सीपीएम की सत्ता छीन गई थी. त्रिपुरा के 6 दशक की चुनावी राजनीति में 35 साल सत्ता पर वाम दलों का कब्जा रहा है. त्रिपुरा में 1978 में पहली बार सीपीएम की सरकार बनी. 1978 से 1988 के बीच नृपेन चक्रबर्ती (Nripen Chakraborty) की अगुवाई में सीपीएम की सत्ता रही थी. उसके बाद 1993 से 1998 तक दशरथ देबबर्मा (Dasarath Debbarma) की अगुवाई में सीपीएम की सरकार रही. 1998 से माणिक सरकार का दौर शुरू हुआ. माणिक सरकार की अगुवाई में मार्च 1998 से लेकर मार्च  2018 तक त्रिपुरा में वाम दलों का शासन रहा. ये आंकड़े बताने के लिए काफी हैं कि त्रिपुरा सीपीएम के लिए कितना महत्वपूर्ण है. 2018 में त्रिपुरा में हार के बाद वाम दलों के लिए अब पूरे देश में सिर्फ केरल में ही सरकार बची है. वाम मोर्चा 2011 में ही पश्चिम बंगाल की सत्ता से बाहर हो गई थी. 

कांग्रेस के लिए है अस्तित्व की लड़ाई

एक वक्त था जब त्रिपुरा की राजनीति में कांग्रेस की तूती बोलती थी. त्रिपुरा में 1963 से मुख्यमंत्री पद की व्यवस्था है. कांग्रेस जुलाई 1963 से नवंबर 1971 (मुख्यमंत्री सचिन्द्र लाल सिंह), फिर मार्च 1972 से मार्च  1977 (मुख्यमंत्री सुखमय सेन गुप्ता) त्रिपुरा की सत्ता पर काबिज रही. इसके अलावा फरवरी 1988 से फरवरी 1992 (मुख्यमंत्री सुधीर रंजन मजूमदार) और फिर फरवरी 1992 से मार्च 1993 ( मुख्यमंत्री समीर रंजन बर्मन)  तक त्रिपुरा में कांग्रेस की सरकार रही है.  इस तरह से कांग्रेस 18 साल से ज्यादा यहां सत्ता में रही है. 1993 से 2018 तक कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल के तौर पर त्रिपुरा की सियासत में अपनी उपस्थिति बनाए हुई थी. लेकिन 2018 का चुनाव कांग्रेस के लिए बुरा सपना साबित हुआ. इस चुनाव में कांग्रेस शून्य पर पहुंच गई. 59 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद पार्टी को किसी भी सीट पर जीत नसीब नहीं हुई. उसका वोट बैंक भी सिमट कर 1.79% रह गया. एक तरह से कांग्रेस का सफाया हो गया. कांग्रेस को अच्छे से अहसास था कि आगामी चुनाव में वो अकेले त्रिपुरा की सत्ता तक नहीं पहुंच सकती है. कांग्रेस पिछले चुनाव के नतीजों से भी ख़ौफ़ज़दा थी. सीपीएम से गठबंधन कांग्रेस के अस्तित्व के लिए जरूरी हो गया था. 

बीजेपी-IPFT गठबंधन  का काट

त्रिपुरा में बीजेपी का राजनीतिक सफर आसान नहीं रहा है. विधानसभा में एक सीट जीतने के लिए उसे 35 साल का लंबा इंतजार करना पड़ा था. 2018 में वो शून्य से सत्ता के शिखर पर पहुंच गई. हालांकि बीजेपी की जीत में इंडीजेनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (IPFT) का बड़ा योगदान रहा था. बीजेपी IPFT के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ी थी. IPFT के साथ गठबंधन का ही असर था कि सीपीएम से महज़ 1.37% वोट ज्यादा मिलने के बावजूद बीजेपी 36 सीटें जीतने में कामयाब हुई और  IPFT को  8 सीटों पर जीत मिली. सीपीएम नेता और पूर्व मुख्यमंत्री माणिक सरकार बार-बार ये दोहराते रहे हैं कि पिछली बार IPFT के साथ गठबंधन और IPFT के पक्ष में गए 7.5% वोट शेयर की वजह से ही त्रिपुरा की सत्ता पर बीजेपी पहुंच पाई. सीपीएम बीजेपी के इसी मजबूत पक्ष का काट खोजने के लिए कांग्रेस से गठबंधन को तैयार हुई है.

टिपरा मोथा IPFT के साथ नए विकल्प की तलाश में

आगामी चुनाव में बीजेपी-IPFT का गठबंधन बरकरार रहेगा. इस बारे में दोनों ही दलों ने पहले ही से ऐलान कर रखा है. इसके बावजूद टिपरा मोथा के प्रमुख प्रद्योत देब बर्मा त्रिपुरा की राजनीति में नया विकल्प बनाने की जुगत में हैं. उनके हाल फिलहाल के बयानों से ऐसा ही संदेश मिल रहा है. सीपीएम और कांग्रेस तो चाहती है कि टिपरा मोथा उनके पाले में आ जाए, लेकिन ऐसा लगता है कि प्रद्योत देब बर्मा के मन में कुछ और ही चल रहा है. उनकी नजर बीजेपी के सहयोगी IPFT पर टिक गई है. कुछ दिन पहले ही उन्होंने कहा था कि IPFT के साथ टिपरा मोथा का विलय एक वास्तविकता बन सकती है. उनका कहना है कि दोनों ही पार्टियों की मांग समान है. टिपरा मोथा जहां ग्रेटर टिपरालैंड की मांग के जरिए सियासी जमीन मजबूत करने में जुटा है. वहीं IPFT टिपरालैंड के नाम से अलग राज्य की मांग करते हुए त्रिपुरा की राजनीति में एक बड़ी ताकत बनी है.  प्रद्योत देब बर्मा ने IPFT के कार्यकारी अध्यक्ष प्रेम कुमार रियांग को चिट्ठी भी लिखी है. इसमें उन्होंने 'टिप्रासा' (Tiprasas) के हित में दोनों पार्टियों के विलय का प्रस्ताव दिया है. प्रद्योत देब बर्मा ने कहा है कि दोनों ही दलों की मांगें कमोबेश समान है और दोनों मिल जाएं तो, त्रिपुरा के मूल निवासी आदिवासियों की आवाज और बुलंद होगी. अभी IPFT की ओर से इस पर कोई जवाब नहीं आया है.  प्रद्योत देब बर्मा की इस कवायद से स्पष्ट है कि वे त्रिपुरा में  मुख्य पार्टियों बीजेपी, सीपीएम और कांग्रेस से अलग कोई नया विकल्प बनाने की फिराक में हैं.

टिपरा मोथा के बिना नहीं होगा फायदा!

सवाल उठता है कि सीपीएम सिर्फ कांग्रेस से हाथ मिलाकर ही बीजेपी के विजय रथ को रोक पाने में कामयाब हो पाएगी. सीपीएम को अच्छे से अहसास है कि बीजेपी-IPFT गठबंधन को हराने के लिए कांग्रेस को साथ लाना ही काफी नहीं है. सीपीएम की नजर क्षेत्रीय दल टिपरा मोथा (Tipra Motha) पर भी है. यही वजह है कि सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने भी कह दिया है कि उनकी पार्टी कांग्रेस के साथ ही टिपरा मोथा के साथ समझौते के लिए भी तैयार है. पूर्व शाही परिवार के वंशज प्रद्योत देब बर्मा की अगुवाई वाली Tipra Motha त्रिपुरा में बड़ी क्षेत्रीय राजनीतिक ताकत के तौर पर उभरी है.  टिपरा मोथा Greater Tipraland के नाम से अलग राज्य की मांग कर रही है. टिपरा मोथा को अपने पाले में लाने के लिए सीपीएम राज्य सचिव जितेंद्र चौधरी ने इतना तक कह दिया है कि ग्रेटर टिपरालैंड की मांग संवैधानिक ढांचे के अनुरूप है. त्रिपुरा के आदिवासियों के बीच पिछले तीन साल के भीतर टिपरा मोथा की पकड़ बहुत मजबूत हो गई है.  IPFT के जनाधार को कम करने के नजरिए से सीपीएम-कांग्रेस दोनों चाहेगी कि टिपरा मोथा उनके पाले में आ जाए.

सीट बंटवारे का क्या होगा फॉर्मूला?

सीपीएम और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ने को तो राजी हो गए हैं, लेकिन सीटों के बंटवारे पर अभी कोई फैसला नहीं हुआ है. इतना तो तय है कि सीपीएम ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ेगी. अब देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस को पुरानी हैसियत के हिसाब से सीटें मिलती है, या फिर 2018 के प्रदर्शन को आधार बनाकर सीपीएम कांग्रेस के लिए चंद सीटें ही छोड़ती है. सीट बंटवारे के फॉर्मूले पर सवाल करने पर सीपीएम और कांग्रेस के नेता फिलहाल गोलमोल जवाब दे रहे हैं. दोनों ही दलों का कहना है कि सीट बंटवारा कोई मुद्दा नहीं है, बल्कि असली मुद्दा बीजेपी को जीत से रोकना है. कांग्रेस महासचिव अजय कुमार ने कहा है कि सीटों के तालमेल को अंतिम रूप देने के लिए कांग्रेस की एक टीम सीपीएम के राज्य सचिव के साथ बातचीत करेगी और उसके बाद ही कोई फैसला होगा. 

सीपीएम-कांग्रेस गठबंधन को बताया 'अपवित्र'

सीपीएम और कांग्रेस के गठबंधन ने सत्ताधारी बीजेपी की चिंता बढ़ा दी है. बीजेपी नेता और त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा के बयान से भी ऐसा ही लग रहा है. उन्होंने सीपीएम और कांग्रेस के गठबंधन को अपवित्र गठजोड़ करार दिया है. हालांकि माणिक साहा ने ये भी कहा है कि राज्य की जनता मौकापरस्त सीपीएम और कांग्रेस को चुनाव में मुंहतोड़ जवाब देगी. बीजेपी का कहना है कि सीपीएम और कांग्रेस दोनों के सामने अस्तित्व का खतरा था. यही वजह है कि धुर विरोधी होते हुए भी इन दोनों ने हाथ मिला लिया है. पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब ने तो इतना तक कह दिया कि 2018 से पहले वाम दल 25 साल तक लगातार त्रिपुरा पर इसलिए शासन कर सका क्योंकि सीपीएम और कांग्रेस में मौन समझौता था.

बदले समीकरण से बीजेपी की बढ़ी मुश्किलें

भले ही बीजेपी, सीपीएम और कांग्रेस गठबंधन को अपवित्र बता रही है, लेकिन त्रिपुरा में बदले सियासी समीकरण से बीजेपी की मुश्किलें बढ़ गई हैं. बीजेपी को भी ये अच्छे से अहसास है कि अब त्रिपुरा की सत्ता को बरकरार रखने में उसे और ज्यादा मेहनत करनी होगी. वहीं टिपरा मोथा के नए कदम से भी बीजेपी की राह मुश्किल हो सकती है. अगर बीजेपी की सहयोगी IPFT ने टिपरा मोथा के प्रस्ताव को मान लिया तो आने वाले दिनों में बीजेपी के लिए त्रिपुरा के सियासी समीकरण को साधना इतना आसान नहीं रह जाएगा. एक संभावना ये भी बन सकती है कि टिपरा मोथा बीजेपी-IPFT गठबंधन का हिस्सा बन जाए, लेकिन इसके लिए टिपरा मोथा के प्रमुख प्रद्योत देब बर्मा बीजेपी से अलग राज्य की मांग पर कुछ ठोस आश्वासन चाहेंगे और ये बीजेपी के लिए आसान नहीं होगा. 

त्रिपुरा विधानसभा का कार्यकाल 22 मार्च 2023 को खत्म हो रहा है. यहां कुल 60 विधानसभा सीट है. त्रिपुरा में मेघालय और नागालैंड के साथ फरवरी- मार्च में चुनाव होने की संभावना है. सीपीएम-कांग्रेस गठबंधन और टिपरा मोथा के नए दांव से त्रिपुरा का सियासी दंगल बेहद दिलचस्प होते जा रहा है. 

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