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गोवा लिबरेशन डे: 400 साल से कब्जा किये पुर्तगालियों को कुछ इस तरह महज दो दिन में सेना ने भगाया

19 दिसम्बर 1961 को पुर्तगाल की सेना ने भारतीय सेना के सामने घुटने टेक दिए थे, 19 दिसम्बर की रात साढ़े दस बजे पुर्तगाली कमांडर ने इंस्ट्रमेंट ऑफ सरेंडर पर हस्ताक्षर किए थे.

नई दिल्ली: आज गोवा का 58वां लिबरेशन डे है. आज ही के दिन यानि 19 दिसम्बर 1961 को पुर्तगाल की सेना ने भारतीय सेना के सामने घुटने टेक दिए थे, और पुर्तगाली कमांडर, जनरल मैन्युल एंटेनिओ वासाएलो सिल्वा ने भारत के ब्रिगेडियर के एस ढिल्लो के सामने 'इंस्ट्रमेंट ऑफ सरेंडर' पर हस्ताक्षर किए थे. ब्रिगेडियर ढिल्लो उस वक्त सेना की 63वीं ब्रिगेड के कमांडर थे और उन्होंने ही दो दिन की लड़ाई में पुर्तगाली सेना के छक्के छुड़ा दिए थे.

1971 के युद्ध में पाकिस्तानी कमांडर, जनरल नियाजी के भारतीय‌ सेना के सामने सरेंडर करते हुए कि तस्वीर हर जगह दिखाई पड़ती है. सेना के फील्ड हेडक्वाटर्स से लेकर सेना मुख्यालय और रक्षा मंत्री के ऑफिस तक में ये तस्वीर या इसकी पोर्ट्रेट दिखाई पड़ ही जाती है, लेकिन हाल ही में चीन सीमा से सटे सिक्किम की राजधानी गैंगटोक में सेना के हेडक्वार्टर में एक इससे ही मिलती-जुलती पोर्ट्रट देखने को मिली. पूछने पर पता चला कि ये पुर्तगाली कमांडर हैं जिन्होनें 1961 में गोवा लिबरेशन (आजादी) के दौरान भारतीय सेना के सामने सरेंडर किया था.

सेना की 63वीं ब्रिगेड इनदिनों 17वीं माउंटेन डिवीजन का हिस्सा है जिसका मुख्यालय गैंगटोक में है, और चीन सीमा से सटे डोकलम सहित उत्तर-पूर्व सिक्किम की रखवाली करती है. 1961 में पुर्तगाल शायद पहला और आखिरी 'नाटो' देश था जिसे किसी युद्ध में हार का सामना करना पड़ा था. हालांकि, गोवा पुर्तगाल की एक उपनिवेश 'कालोनी' थी इसलिए नाटो के नियम कानून यहां लागू नहीं होते थे और इसीलिए अमेरिका सहित किसी भी नाटो देश ने इस युद्ध में पुर्तगाल की मदद नहीं की थी.

दरअसल, गोवा करीब 400 साल से पुर्तगाल की एक कालोनी थी. जैसा भारत ब्रिटेन का था और पुडुंचेरी फ्रांसीसी कालोनी थी, लेकिन भारत के आजादी के बाद भी पुर्तगालियों ने गोवा को आजादी नहीं दी थी. इसके लिए बाकी देश की तरह ही गोवा में भी स्वतंत्रता की एक लंबी लड़ाई लड़ी गई. ये लड़ाई शांतिपूर्ण भी थी और हिंसक भी थी जैसा कि अमिताभ बच्चन की 80 के दशक की फिल्म 'पुकार' में दिखाया गया था.

गोवा की आजादी के लिए 'ऑपरेशन विजय'

आजादी के बाद भारत सरकार ने राजनियक तरीकों से पुर्तगाल पर गोवा को आजाद करने के लिए जोर डाला, लेकिन पुर्तगाल ने भारत की मांग को एक लंबे समय तक अनसुना कर दिया. ऐसे में 1 दिसम्बर 1961 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने भारतीय सेना को गोवा से आजाद कराने का निर्देश जारी किया. इसकी जिम्मेदारी सेना की 17वीं माउंटेन डिवीजन को दी गई. पुर्तगाल की सेना के लिए भारत की एक ब्रिगेड (63वीं) ही काफी थी और 'ऑपरेशन विजय' लांच किया गया.

गोवा लिबरेशन डे: 400 साल से कब्जा किये पुर्तगालियों को  कुछ इस तरह महज दो दिन में सेना ने भगाया

दो दिन में ही पुर्तगाल की सेना की कर दी छुट्टी

दो दिन की लड़ाई (18-19 दिसम्बर) में ही पुर्तगाली सैनिकों के पांव उखड़ गए और 19 दिसम्बर की रात साढ़े दस बजे पुर्तगाली कमांडर ने इंस्ट्रमेंट ऑफ सरेंडर पर हस्ताक्षर कर दिए. गोवा के साथ साथ दादर और नगर हवेली भी आजाद हो गया. इस इंस्ट्रमेंट ऑफ सरेंडर की ओरिजिनल कॉपी भी 17वीं माउंटेन डिव के हेडक्वार्टर में दीवार पर सजा हुई है. साथ ही सैन्य पंरपरा के तहत पुर्तगाली सेना का उल्टा झंडा भी साथ में लगा हुआ है. गोवा की लिबरेशन में भारतीय नौसेना की भी अहम भूमिका रही थी, और पुर्तगालियों के कब्जे से अंजाद्वीप को आजाद कराया था. इस लड़ाई में नौसेना के सात वीर नौसैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए थे. उनका मेमोरियल आज भी गोवा में आईएनएस गोमंतक पर है.

सेना क्यूं नहीं मनाती गोवा लिबरेशन डे?

जिस तरह पाकिस्तान पर '1971 के युद्ध में विजय हासिल की थी और हर साल 16 दिसम्बर को विजय‌ दिवस मनाया जाता है. ऐसा गोवा लिबरेशन डे आखिरकार सेना क्यों नहीं मनाती है. इस‌ सवाल पर सेना के एक वरिष्ट अधिकारी का कहना है कि '1961 के युद्ध में पुर्तगालियों को गोवा से भगाने के बाद देश के राजनेताओं को ये गुमान हो गया था कि वे किसी भी देश को चुनौती दे सकते हैं, लेकिन ये घमंड एक साल के भीतर ही चीन से '1962 की जंग में चकनाचूर हो गया. शायद यही वजह है कि लंबे समय तक भारत और भारतीय सेना ने गोवा की आजादी का जश्न नहीं मनाया.

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