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प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट पर बिना नोटिस नई याचिकाएं खारिज, पहले से लंबित याचिकाओं पर अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई

चीफ जस्टिस ने यह भी कहा था कि मामले पर लगातार नई याचिकाएं दाखिल हो रही हैं. सबको सुन पाना मुश्किल होगा.

प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई अप्रैल के पहले सप्ताह में होगी. कोर्ट ने केंद्र सरकार से मामले पर जवाब दाखिल करने को कहा है. मामले को लेकर लगातार दाखिल हो रही नई याचिकाओं को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जिन नई याचिकाओं पर अब तक नोटिस नहीं जारी हुआ है, उन्हें खारिज किया जा रहा है. इस तरह के याचिकाकर्ता चाहें तो पहले से लंबित याचिका में हस्तक्षेप आवेदन दाखिल कर अपनी बात रख सकते हैं. अगर वह कोई अलग कानूनी आधार रख सकेंगे, तभी उन पर विचार किया जाएगा.
 
चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने सुबह ही कह दिया था कि आज मामले पर सुनवाई नहीं होगी. उन्होंने कहा था कि यह 3 जज की बेंच का मामला है, जबकि वह आज 2 जजों की बेंच में बैठे हैं. चीफ जस्टिस ने यह भी कहा था कि मामले पर लगातार नई याचिकाएं दाखिल हो रही हैं. सबको सुन पाना मुश्किल होगा. कोर्ट ने कहा है कि लंबित याचिकाओं पर पहले ही नोटिस जारी हो चुका है. सरकार के जवाब की प्रतीक्षा की जा रही है. नई याचिकाओं पर नियंत्रण नहीं किया गया तो सुनवाई में मुश्किल होगी.
 
12 दिसंबर का आदेश
12 दिसंबर, 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में धार्मिक स्थलों को लेकर नए मुकदमे दर्ज करने पर रोक लगा दी थी. कोर्ट ने कहा था कि जो मुकदमे लंबित हैं, उनमें सुनवाई जारी रह सकती है, लेकिन निचली अदालतें कोई भी प्रभावी या अंतिम आदेश न दें. निचली अदालतें फिलहाल सर्वे का भी आदेश न दें.
 
सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश 1991 के प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट के पक्ष और विपक्ष में दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया था. चीफ जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस पी वी संजय कुमार और जस्टिस के वी विश्वनाथन की बेंच ने केंद्र सरकार से 4 सप्ताह में लंबित याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने को कहा था. कोर्ट ने कहा था कि याचिकाकर्ता भी उसके बाद 4 सप्ताह में जवाब दाखिल करें.
 
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात को नोट किया था कि 4 साल से लंबित मामले पर अभी तक केंद्र सरकार ने जवाब दाखिल नहीं किया है. कोर्ट ने कहा था कि केंद्र और याचिकाकर्ताओं के जवाब को देखने के बाद वह आगे सुनवाई करेगा. 
 
क्या है मामला?
1991 का प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट कहता है कि देश के हर धार्मिक स्थल की जो स्थिति 15 अगस्त 1947 को थी, उसे बदला नहीं जा सकता. इस कानून को चुनौती देते हुए कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई हैं. इन याचिकाओं में कहा गया है कि यह कानून हिंदू, जैन, सिख और बौद्ध समुदाय को अपना अधिकार मांगने से वंचित करता है. किसी भी मसले को कोर्ट तक लेकर आना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है.
 
एक्ट के समर्थन में भी कई याचिकाएं
प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट का समर्थन करते हुए सुन्नी मुस्लिम उलेमाओं के संगठन जमीयत उलेमा ए हिंद ने भी 2020 में ही याचिका दाखिल कर दी थी. जमीयत का कहना है कि अयोध्या विवाद के अलावा बाकी मामलों में प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट का पालन हो, यह सुप्रीम कोर्ट ने ही कहा था. इसलिए, अब इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई नहीं होनी चाहिए. जमीयत के अलावा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, कांग्रेस, असदुद्दीन ओवैसी, आरजेडी सांसद मनोज झा, एनसीपी नेता जितेंद्र आव्हाड, सीपीएम नेता प्रकाश करात समेत कई लोगों ने याचिकाएं दाखिल कर मांग की है कि प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट खारिज कर दे. उन्होंने कहा है कि यह कानून भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे के मुताबिक है.
करीब 2 दशक से सुप्रीम कोर्ट के गलियारों का एक जाना-पहचाना चेहरा. पत्रकारिता में बिताया समय उससे भी अधिक. कानूनी ख़बरों की जटिलता को सरलता में बदलने का कौशल. खाली समय में सिनेमा, संगीत और इतिहास में रुचि.
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