Explained: आखिर क्यों आग का गोला बन रही हैं स्लीपर बसें? नियमों की अनदेखी या कोई और वजह
BOCI के पदाधिकारियों का यह भी कहना है कि कई ऑपरेटर अपनी बसों का रजिस्ट्रेशन नागालैंड या अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में करा लेते हैं, जहां जांच के नियम ढीले हैं.

ग्रेटर नोएडा में यमुना एक्सप्रेसवे पर बुधवार देर रात जेवर के पास एक एसी स्लीपर बस में अचानक आग लगने से नौ यात्रियों की झुलसकर दर्दनाक मौत हो गई. 35 यात्रियों को लेकर नोएडा से महोबा (बुंदेलखंड) जा रही इस बस के एसी में हुई स्पार्किंग और ब्लास्ट ने देखते ही देखते पूरी गाड़ी को अपनी चपेट में ले लिया. लेकिन यह कोई अकेली घटना नहीं है. देश के हाईवे पर लगातार जलती एसी स्लीपर बसें अब एक गंभीर और जानलेवा पैटर्न की ओर इशारा कर रही हैं.
हादसों का सिलसिला और संसद में गूंजते आंकड़े
दिसंबर 2025 में मथुरा के पास घने कोहरे के कारण 10 गाड़ियों की टक्कर के बाद लगी आग में 13 लोगों की जान चली गई थी. वहीं, अक्टूबर 2025 में आंध्र प्रदेश के कुरनूल में बाइक से टक्कर के बाद बस में आग लगने से 20 लोग मारे गए. इसके महज दस दिन पहले जैसलमेर से जोधपुर जा रही एक एसी स्लीपर बस में आग फैलने से 26 लोगों की मौत हो गई थी.
यह मुद्दा जब संसद में उठा, तो केंद्र सरकार ने 18 दिसंबर को एक लिखित जवाब में स्वीकार किया कि पिछले तीन वर्षों में चलती बसों में आग लगने की 45 घटनाओं में कम से कम 64 लोगों की जान जा चुकी है. इन बढ़ती त्रासदियों को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी राज्यों के मुख्य सचिवों को नोटिस जारी कर सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करने वाली बसों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं.
कैसे शुरू हुआ स्लीपर बसों का दौर?
भारत में स्लीपर बसों की अवधारणा नई नहीं है. 1966 में मैसूर स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन जैसे सरकारी उपक्रमों ने इसका प्रयोग शुरू किया था. हालांकि, 2000 के दशक की शुरुआत में जब राष्ट्रीय राजमार्गों को फोर-लेन किया गया, तब रातभर चलने वाली इंटरसिटी यात्राओं के लिए स्लीपर बसों की मांग तेजी से बढ़ी.
ट्रेन के कंफर्म टिकट न मिलने और एक्सप्रेसवे के विस्तार ने इस क्षेत्र को और बढ़ावा दिया. बस एग्रीगेटर Redbus के अनुसार, केवल अप्रैल से सितंबर 2025 के बीच 14 करोड़ से अधिक लोगों ने इंटरसिटी बसों में सफर किया, जिसमें 85% हिस्सेदारी स्लीपर और हाइब्रिड बसों की थी. आज भारत में करीब 20 लाख बसें हैं, जिनमें से 90% प्राइवेट ऑपरेटरों द्वारा चलाई जाती हैं.
आग लगने का मुख्य कारण: 'लोकल रेट्रोफिटिंग' और इलेक्ट्रिकल ओवरलोड
सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, हादसों को दो श्रेणियों में बांटा जाता है. 'टक्कर से लगने वाली आग' और 'बिना टक्कर के लगने वाली आग'. बिना किसी दुर्घटना के बसों में अचानक आग लगने की घटनाएं सबसे अधिक खतरनाक हैं और इन्हें पूरी तरह रोका जा सकता है.
दिल्ली के पूर्व डिप्टी ट्रांसपोर्ट कमिश्नर अनिल छिकारा के अनुसार, आग की बड़ी वजह बिना-प्रीमियम एसी स्लीपर बसों में की जाने वाली 'लोकल रेट्रोफिटिंग' है.
सस्ती वायरिंग और ओवरलोडिंग: एक ओर जहां OEM (ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर) द्वारा निर्मित बस की कीमत करीब ₹2 करोड़ होती है, वहीं लोकल बॉडी बिल्डर्स ₹1 करोड़ से कम में साधारण बस को कस्टमाइज्ड स्लीपर बना देते हैं. इसमें 14-15 घंटे तक एसी, लाइटिंग और मोबाइल चार्जिंग पॉइंट चलने से तारों पर भारी इलेक्ट्रिकल लोड पड़ता है.
सस्ते पार्ट्स का इस्तेमाल: लोकल मेकर्स मल्टीप्लेक्स वायरिंग के बजाय घटिया क्वालिटी के तारों का इस्तेमाल करते हैं. तार गर्म होकर पिघलते हैं, चिंगारी उठती है और मिनटों में आग पूरे नेटवर्क में फैल जाती है.
सैलून में ज्वलनशील सामग्री: कस्टमाइज्ड बसों में सस्ते फोम और ज्वलनशील फैब्रिक का इस्तेमाल होता है, जो आग को तेजी से भड़काते हैं.
तंग लेआउट: आपात स्थिति में 'मौत का जाल'
तकनीकी गड़बड़ी के अलावा, स्लीपर बसों का अंदरूनी लेआउट इन हादसों को जानलेवा बना देता है.
इमरजेंसी एग्जिट का बंद होना: नियमों (AIS-119 स्लीपर कोड) के अनुसार पर्याप्त इमरजेंसी गेट होने चाहिए, लेकिन ऑपरेटर अधिक सीटें/बर्थ लगाने के चक्कर में पिछले और आपातकालीन दरवाजों को बंद कर देते हैं.
संकरी गलियां और कम जगह: दो मंजिला बर्थ के कारण खड़े होने या भागने की जगह नहीं होती. धुएं और आग के बीच यात्रियों को रेंगकर बाहर निकलना पड़ता है, जो लगभग असंभव साबित होता है.
सुरक्षा उपकरणों का अभाव: कस्टमाइज्ड बसों में न तो शीशा तोड़ने के लिए हथौड़े होते हैं और न ही ऑटोमैटिक फायर सप्रेसर सिस्टम
रेगुलेटरी कमियां और ढीली निगरानी
सड़क परिवहन क्षेत्र में नियम (AIS-052, AIS-119, AIS-134) मौजूद हैं, लेकिन सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ रोड ट्रांसपोर्ट (CIRT) के अधिकारियों के अनुसार, इनका अनुपालन केवल कागजों तक सीमित है.
आरटीओ (RTO) स्तर पर प्रशिक्षित तकनीकी इंजीनियरों की भारी कमी है, जिसके कारण गाड़ियों का सही फिजिकल वेरिफिकेशन नहीं हो पाता. BOCI के पदाधिकारियों का यह भी कहना है कि कई ऑपरेटर अपनी बसों का रजिस्ट्रेशन नागालैंड या अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में करा लेते हैं, जहां जांच के नियम ढीले हैं, और फिर वे गाड़ियां दूर-दराज के राज्यों में बिना किसी सख्त चेकिंग के दौड़ती रहती हैं.
चीन से सबक और आगे का रास्ता
2012 में इसी तरह के जानलेवा हादसों के बाद चीन ने स्लीपर बसों की बिक्री और संचालन पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था. भारत में भी केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय अब कस्टमाइज्ड स्लीपर बसों पर प्रतिबंध लगाने और केवल OEM-निर्मित बसों को अनुमति देने पर विचार कर रहा है.
रोड सेफ्टी एक्सपर्ट्स और IRTE का मानना है कि एक्सप्रेसवे पर 100 किमी/घंटा की रफ्तार से दौड़ती बसों के लिए सख्त ट्रैफ़िक इंजीनियरिंग, इमरजेंसी इवैक्यूएशन प्रोटोकॉल और अनिवार्य फिजिकल जांच बेहद जरूरी है. जब तक बिना-मानक रेट्रोफिटिंग और अवैध संशोधनों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक आम यात्रियों की रात का यह सफर जोखिम भरा बना रहेगा.




















