Birthday Special: दो बार प्रधानमंत्री की रेस में पिछड़ जाने वाले जगजीवन राम की पूरी कहानी

नई दिल्ली: जब-जब भारत की आजादी की लड़ाई का जिक्र होगा, देश के दबे कुचले समाज के उत्थान की चर्चा होगी, या दलितों के हक-हकूक की लड़ाई की बात निकलेगी, एक नाम जिससे सुनहरी शब्दों में याद किया जाएगा वो हैं बाबू जगजीवन राम, जिन्हें पूरा भारत 'बाबूजी' पुकारता है.
बिहार से ताल्लुक रखने वाले बाबू जगजीवन राम ने न सिर्फ एक राजनेता के तौर पर देश का गौरव बढ़ाया है बल्कि जिस दलित समुदाय से वह आते हैं उसके उत्थान में अभूतपूर्व योगदान दिया. जब देश आजादी के करीब था. 1946 में जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी तो उन्हें सबसे कम उम्र के मंत्री होने का गौरव हासिल हुआ.
अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने करीब 50 साल तक देश की सबसे बड़ी पंचायत यानी संसद में अपनी सेवा दीं. और इस तरह उनके नाम सबसे ज्यादा वक्त संसद में सेवा देने का रिकॉर्ड दर्ज है. वे नेहरू, शास्त्री, इंदिरा, मोरारजी देसाई की सरकारों में मंत्री रहे. उन्होंने जिस किसी भी मंत्रालय का कार्यभार संभाला उसे पूरी शिद्दत से निभाया.
फोटो: जगजीवन राम फाउंडेशन केन्द्रीय कैबिनेट में श्रम मंत्री, खाद्य एवं कृषि मंत्री और रक्षा मंत्री रहने के दौरान उनके योगदान को अभी भी याद किया जाता है. कृषि मंत्रालय के शीर्ष पर आसीन रहने के दौरान पहली हरित क्रांति के युग में उनके अभूतपूर्व योगादान को हमेशा याद रखा जाएगा. पाकिस्तान के साथ 1971 की जंग में वह रक्षा मंत्री थे इस दौरान उनके सामरिक सूझबूझ और नए बांग्लादेश के निर्माण में उनके किरदार को भी नहीं भुलाया जा सकता है.
बाबूजी हमेशा कांग्रेस पार्टी के भरोसेमंद सिपहसालार रहे, लेकिन इमेरजेंसी ने उन्हें भी मायूस किया. उसके बाद उनके बगावती तेवर भी देखने को मिले. उन्होंने 1977 में खुद को कांग्रेस से अलग कर लिया और कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी नाम की एक पार्टी का गठन किया. इमरजेंसी के बाद होने वाले चुनावों में वे इस पार्टी को विपक्ष में एक विकल्प तौर पर देखते थे. मगर जय प्रकाश के आग्रह पर उन्होंने जनता पार्टी के साथ खुद को जोड़ना सही समझा.
फोटो: जगजीवन राम फाउंडेशन जनता पार्टी के सत्ता पर आसीन होने के दौरान उन्होंने प्राधनमंत्री बनने की कोशिश कि, लेकिन सत्ता की इस दौड़ में वो मोरारजी देसाई से हार गए. नतीजा मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने और बाबू जगजीवन राम को उप प्राधानमंत्री से संतोष करना पड़ा. 1977 में मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद जगजीवन राम की सत्ता की लड़ाई चौधरी चरण सिंह से शुरू हो गई. और इस बार भी जगजीवन राम प्रधानमंत्री के पद पर आसीन नहीं हुए. चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने.
फोटो: जगजीवन राम फाउंडेशन संसदीय दल की तरफ से उन्हें बहुमत के बावजूद भी तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डीू की तरफ से प्रधानमंत्री की शपथ नहीं दिलाई गई. दूसरी बार भी प्रधानमंत्री की होड़ में पीछे रह जाने के कारण बाबूजी बेहद निराश हुए. जगजीवन राम ने इसके लिए अपनी नीची जाति के साथ होने वाले भेद-भाव को दोष दिया.
1980 के चुनावों में कांग्रेस के दोबारा सत्ता में आने के बाद अपनी जिंदगी के आखिरी दौर में बाबूजी ने एक बार फिर से कांग्रेस पार्टी से नजदकियां बढ़ाने की कोशिश की मगर उनकी ये कोशिश नाकाफी थी. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें कांग्रेस को छोड़ के चले जाने पर कभी माफ नहीं किया.
हालांकि, आज के दौर में कांग्रेस पार्टी उनके योगदान को पॉलिश कर अपना सिक्का चमकाती नजर आती है. बीते साल हुए राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए के दलित चेहरे के आगे कांग्रेस पार्टी ने बाबूजी की बेटी मीरा कुमार के नाम को समाने रखा.
सियासी दाव-पेंच के इतर बाबूजी को सामाजिक स्तर पर उनके योगादान के लिए हमेशा याद किया जाएगा. वे पूरी जिंदगी समाज में सभी की बराबरी और सामाजिक सौहार्द के पक्षधर रहे.
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