छात्रसंघ चुनाव से शंकराचार्य तक... जानें उमाशंकर उपाध्याय कैसे बने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद?
Shankaracharya Avimukteshwaranand: छात्र राजनीति से संन्यास और फिर शंकराचार्य बनने तक का अविमुक्तेश्वरानंद का सफर साधारण नहीं रहा. आइए जानें कि उमाशंकर उपाध्याय से वे अविमुक्तेश्वरानंद कैसे बने.

प्रयागराज के माघ मेले में संगम स्नान को लेकर प्रशासन से टकराव के बाद एक बार फिर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती चर्चा में हैं. साधु-संतों की परंपरा, सत्ता से सवाल और खुली बेबाकी- इन तीनों के मेल ने उन्हें बार-बार सुर्खियों में रखा है, लेकिन यह सफर अचानक नहीं बना. छात्रसंघ चुनाव लड़ने वाले उमाशंकर उपाध्याय कैसे ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य बने, इसकी कहानी उतनी ही दिलचस्प है.
प्रयागराज विवाद से फिर क्यों चर्चा में आए?
मौनी अमावस्या के दिन संगम स्नान को लेकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और स्थानीय प्रशासन आमने-सामने आ गए. मामला बढ़ा तो साधु-संतों, प्रशासन और राजनीति के बीच तनाव दिखा. उनके समर्थक इसे परंपरा की रक्षा बताते हैं, जबकि प्रशासन नियमों की बात करता है. यह टकराव उनकी उस पहचान को फिर सामने लाता है, जिसमें वे सनातन परंपराओं पर खुलकर बोलते हैं और समझौते से दूरी रखते हैं.
उमाशंकर उपाध्याय से संन्यासी बनने की शुरुआत
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का जन्म 15 अगस्त 1969 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के ब्राह्मणपुर गांव में हुआ. बचपन का नाम उमाशंकर उपाध्याय था. प्रारंभिक शिक्षा प्रतापगढ़ में हुई, फिर आगे की पढ़ाई के लिए वे गुजरात पहुंचे. वहीं उनका संपर्क स्वामी करपात्री जी महाराज के शिष्य ब्रह्मचारी राम चैतन्य से हुआ, जिनकी प्रेरणा से उन्होंने संस्कृत अध्ययन की राह पकड़ी.
संस्कृत शिक्षा और वैचारिक निर्माण
उमाशंकर उपाध्याय ने संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की शिक्षा प्राप्त की. इसी दौर में वे शास्त्रों, परंपराओं और सामाजिक मुद्दों पर गहराई से विचार करने लगे. संस्कृत शिक्षा ने उनके वैचारिक व्यक्तित्व को आकार दिया, जो आगे चलकर उनके सार्वजनिक बयानों में साफ दिखा.
छात्रसंघ चुनाव और राजनीतिक सक्रियता
बनारस में पढ़ाई के दौरान उमाशंकर उपाध्याय छात्र राजनीति में सक्रिय रहे. वर्ष 1994 में उन्होंने छात्रसंघ का चुनाव भी लड़ा था. बाद के वर्षों में, संन्यासी बनने के बाद भी उनकी राजनीतिक समझ और हस्तक्षेप चर्चा का विषय बने. 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में वाराणसी से उम्मीदवार उतारने की कोशिश इसी सक्रियता का उदाहरण रही, हालांकि व्यापक समर्थन नहीं मिला.
संन्यास दीक्षा और नाम परिवर्तन
15 अप्रैल 2003 को उमाशंकर उपाध्याय को दंड संन्यास की दीक्षा दी गई. इसके साथ ही उन्हें अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती नाम मिला. संन्यास के बाद उन्होंने खुद को हिंदू धर्म की रक्षा, गंगा संरक्षण और सनातन परंपराओं के प्रचार में समर्पित कर दिया. 2008 में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने की मांग को लेकर उनका अनशन खासा चर्चित रहा.
ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य कैसे बने?
सितंबर 2022 में उनके गुरु जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य नियुक्त किया गया. इस नियुक्ति के साथ ही कुछ विवाद और कानूनी चर्चाएं भी सामने आईं, लेकिन उनके अनुयायियों ने इसे परंपरा के अनुरूप निर्णय बताया. शंकराचार्य बनने के बाद भी वे सामाजिक और धार्मिक मुद्दों पर मुखर बने रहे.
बेबाक बयान और लगातार सुर्खियां
राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा को लेकर सवाल उठाने हों या प्रशासनिक फैसलों पर आपत्ति, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की स्पष्ट राय उन्हें अलग पहचान देती है. समर्थक उन्हें परंपराओं की आवाज मानते हैं, जबकि आलोचक उनके तरीकों पर सवाल उठाते हैं. यही टकराव उन्हें बार-बार चर्चा के केंद्र में ले आता है.
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Source: IOCL


























