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EXPLAINED: सड़कों पर 'यमराज' बनकर घूम रहे डंपर! कैसे ट्रकों से ज्यादा जानलेवा, इंसान की जान इतनी सस्ती क्यों?

ABP Explainer: IFTRT की 2025 रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हर तीसरा ट्रक या डंपर अधिकतम लोड से 10-20% ज्यादा बोझ ढोता है. इससे समय पर ब्रेक नहीं लगते और हादसे हो जाते हैं.

3 नवंबर 2025... जयपुर के हरमाड़ा की लोहा मंडी. दोपहर करीब 1 बजे एक डंपर रोड नंबर- 14 से हाईवे की ओर निकला. अचानक उसने 400 मीटर में 17 गाड़ियो को रौंद डाला और 26 लोगों को कुचल दिया. इसमें 14 की मौत हो गई और 12 घायल हैं. 7 की स्थिति गंभीर है.

यह पहली बार नहीं है जब किसी डंपर ने मौत का खेल खेला हो. लेकिन कभी आपने सोचा कि ट्रक, बस और कार के मुकाबले डंपर से हादसे ज्यादा क्यों होते हैं. ऐसे हादसे इतने ज्यादा होने लगे हैं कि इस ओर अब आपका ध्यान भी नहीं जाता. मानो जैसे जान की कोई कीमत ही नहीं बची है.

तो आइए ABP एक्सप्लेनर में समझते हैं कि डंपर मौत की वजह क्यों बन रहे हैं, ट्रक-बस के मुकाबले डंपर से हादसे ज्यादा क्यों होते हैं और एक इंसान की जान की कीमत क्या है...

सवाल 1- जयपुर में डंपर हादसे का पूरा मामला क्या है और अब तक क्या-क्या हुआ?
जवाब- जयपुर में डंपर हादसे में 14 लोगों की मौत हुई है. 12 लोग घायल हैं जिनमें से 7 की हालत गंभीर है. इन्हें सवाई मान सिंह (SMS) हॉस्पिटल के ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया है. जब डंपर ने लोगों को कुचला तो शवों के टुकड़े इधर-उधर बिखर गए. किसी का पैर कट गया तो किसी का हाथ. 2 शवों की पहचान नहीं हो पाई है. हादसे के बाद लोगों ने डंपर ड्राइवर कल्याण मीणा को पकड़कर पुलिस को सौंप दिया. वह भी हॉस्पिटल में भर्ती है. कल्याण पर गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया गया है.

पुलिस का कहना है कि हादसे से करीब डेढ़ किलोमीटर पहले एक पेट्रोल पंप के बाहर डंपर ड्राइवर की एक कार वाले से कहासुनी हुई थी. इसके बाद ड्राइवर ने डंपर को रॉन्ग साइड ले लिया. डंपर के पीछे लिखा था- 'दम है तो पास कर, वरना बर्दाश्त कर.' इस डंपर (RJ 14 GP 8724) का ओवरलोड में तीन बार चालान हो चुका है. 17 हजार रुपए का ओवरलोड का एक चालान बकाया है.

 

CCTV फुटेज में गाड़ियों को रौंदता हुआ डंपर
CCTV फुटेज में गाड़ियों को रौंदता हुआ डंपर

राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने सख्त आदेश जारी किए हैं...

  • अब राजस्थान में शराब पीकर वाहन चलाने वालों का लाइसेंस रद्द होगा.
  • हाईवे के आसपास के अतिक्रमण हटाने, प्रदेश में अवैध कटों को बंद करने और ओवरलोडिंग के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं.
  • परिवहन, पुलिस और सार्वजनिक निर्माण विभाग संयुक्त रूप से प्रदेशभर में 4 नवंबर से 15 दिन तक सड़क सुरक्षा अभियान चलाएंगे.

सवाल 2- क्या इससे पहले देश में डंपर से बड़े हादसे हुए हैं?
जवाब- हां. डंपर से आए दिन हादसे होते रहते हैं...

  • 3 नवंबर 2025: तेलंगाना में डंपर ने बस को टक्कर मारी, जिसमें 24 लोगों की मौत हुई और कई घायल हो गए.
  • 1 नवंबर 2025: उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में तेज रफ्तार डंपर ने बाइक सवार 3 युवकों को कुचल दिया बाइक के परखच्चे उड़ गए और तीनों युवकों की मौत हो गई.
  • 26 जुलाई 2025: महाराष्ट्र में मुंबई-पुणे एक्सप्रेस वे पर एक डंपर ने कंट्रोल खोकर 20 कारों को टक्कर मार दी. 5 लोगों की मौत हुई और 15 से ज्यादा घायल हुए.
  • 20 अप्रैल 2025: बिहार में पटना-गया हाईवे पर तेज रफ्तार डंपर ने कार को टक्कर मार दी, जिसमें 5 लोगों की मौत हुई और 2 घायल हुए.
  • 15 मार्च 2025: मध्य प्रदेश के इंदौर में ओवरलोडेड डंपर ने पैदल यात्रियों और बाइक सवारों को कुचल दिया, जिसमें 3 लोगों की मौत हुई और 11 घायल हुए.

इतना ही नहीं, 2025 में सड़क हादसों में भारी वाहनों की भूमिका 25% बढ़ी है.

सवाल 3- बस, ट्रक और कार के मुकाबले डंपर से ज्यादा सड़क हादसे क्यों होते हैं?
जवाब- डंपर से ज्यादा हादसे होने की 4 बड़ी वजहें हैं...

1. ओवरलोडिंग: डंपर का वजन ही बन जाता है कातिल

  • डंपर मूल रूप से मलबा या निर्माण सामग्री ढोने के लिए बने होते हैं, लेकिन भारत में ओवरलोडिंग उनकी सबसे घातक कमजोरी है. एक सामान्य डंपर 20-25 टन तक लोड ले सकता है. लेकिन इंडियन फाउंडेशन ऑफ ट्रांसपोर्ट रिसर्च एंड ट्रेनिंग (IFTRT) की 2025 रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हर तीसरा ट्रक या डंपर अधिकतम लोड से 10-20% ज्यादा बोझ ढोता है. इससे ब्रेकिंग डिस्टेंस दोगुना हो जाता है. 80 किलोमीटर प्रति घंटा की स्पीड पर सामान्य 50 मीटर की बजाय 100 मीटर लग जाते हैं.
  • एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ओवरलोडिंग से डंपर का सेंटर ऑफ ग्रेविटी ऊपर शिफ्ट हो जाता है, जो टर्निंग या ढलान पर पलटने का खतरा 20% बढ़ा देता है. IISC बेंगलुरु के प्रोफेसर आशीष वर्मा ने 2020 की एक स्टडी में कहा था, 'ओवरलोडिंग न सिर्फ ब्रेक फेल कराती है, बल्कि टायर ब्लास्ट का कारण भी बनती है, जो 30% डंपर हादसों की जड़ है.' मिनिस्ट्री ऑफ रोड ट्रांसोपोर्ट एंड हाईवेज ऑफ इंडिया (MoRTH) की रिपोर्ट 2023 के मुताबिक, ओवरलोडिंग से 12 हजार मौतें हुईं थीं.

2. ओवरस्पीडिंग: जब रफ्तार बन जाती है दुश्मन

  • डंपर चालक अक्सर डिलीवरी टारगेट पूरा करने के दबाव में 90-120 किलोमीटर प्रति घंटा की स्पीड से दौड़ाते हैं, जबकि हाईवे लिमिट 80 किलोमीटर प्रति घंटा है. MoRTH 2023 रिपोर्ट के अनुसार, ओवरस्पीडिंग सड़क हादसों का 68% कारण है और भारी वाहनों में यह आंकड़ा 75% तक पहुंच जाता है. 2023 में राजस्थान में स्पीडिंग से 9,618 मौतें हुईं, जो देश में सबसे ज्यादा था.
  • स्टेटिस्टा के 2020 में हुए सर्वे में ट्रक ड्राइवरों ने खुद ओवरस्पीडिंग को हादसों की प्रमुख वजह बताया था. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) की 2018 ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट के मुताबिक, स्पीड 10% बढ़ने से मौत का खतरा 40% बढ़ जाता है. डंपर का भारी वजन स्पीड के साथ मोमेंटम (p = m*v) बढ़ाता है, जिससे छोटी गाड़ियों का क्रैश एनर्जी 4 गुना ज्यादा ट्रांसफर हो जाती है.'

3. नशे में ड्राइविंग: थकान और नींद की वजह से नशा जरूरी

  • डंपर चालकों में नशे की लत एक महामारी है. लंबे सफर, तनाव और कम वेतन से वे शराब या गुटखा का सहारा लेते हैं. जयपुर हादसे में भी ड्राइवर कल्याण नशे में था. MoRTH 2023 रिपोर्ट के मुताबिक, नशे से 5-10% हादसे होते हैं, लेकिन भारी वाहनों में यह 15% तक है.
  • scroll.in की 20 नवंबर 2019 स्टडी (जो 2023 डेटा पर अपडेटेड हुई) में पाया गया कि भारत में अल्कोहल लिमिट 0.05 mg/l है, लेकिन एनफोर्समेंट इतना कमजोर है कि 13% ड्राइवर बिना लाइसेंस या नशे में चलाते हैं.

4. ट्रेनिंग और फिटिंग: ड्राइवर और डंपर के साथ लापरवाही

  • डंपर चालक अक्सर 8-12 घंटे लगातार डंपर चलाते हैं, वो भी बिना ब्रेक लगाए. क्वार्ट्ज रिपोर्ट 2022 के मुताबिक, 63% ड्राइवर फटिग यानी थकावट से चूर होते हैं. MoRTH की रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में 13% हादसे बिना लाइसेंस या बिना ट्रेनिंग लिए ड्राइवरों से हुए थे. जयपुर हादसे में ड्राइवर का गुस्सा फटिग को ट्रिगर किया होगा. इसके अलावा ड्राइवरों को ट्रेनिंग भी पूरी नहीं मिलती है. ट्रेनिंग नाकाफी होने से 60% हाईवे हादसे होते हैं.
  • डंपरों का रखरखाव भारत में बड़ा मुद्दा है. ओवरलोडिंग, खराब सड़कों से ब्रेक, टायर और सस्पेंशन जल्दी खराब हो जाते हैं. फेडरल मोटर कैरियर सेफ्टी एडमिनिस्ट्रेशन (FMCSA) की 2023 की स्टडी के मुताबिक, मैकेनिकल फेलियर 20-30% भारी वाहन हादसों की वजह हैं. भारत में हर 3 में से 1 डंपर बिना रेगुलर चेकअप के चलते हैं, जो हादसों को न्यौता देते हैं.

सवाल 4- तो क्या भारत समेत दुनियाभर में इंसान की जान इतनी सस्ती है कि डंपर से कुचला जाए?
जवाब- जयपुर में 14 लोग कुचले गए. हर परिवार को PMNRF से सिर्फ 2 लाख रुपए और राज्य सरकार ने 10 लाख रुपए देने का ऐलान किया. यानी एक इंसान की जान करीब 12 लाख रुपए की है. अब सोचिए अगर एक नई कार खरीदें तो एवरेज 15 लाख रुपए की आती है और एक अच्छा फोन 1 लाख रुपए का मिलता है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या एक जान, एक कार से भी सस्ती है. इस वजह से अक्सर ड्राइवर सोचते हैं कि कुचल दिया तो कुचल दिया. जुर्माना सिर्फ 10 लाख लगेगा और कानूनी पेंच फंसाकर छूट जाएंगे.

इसके उलट अगर किसी विमान हादसे में मौत हो जाती है, तो सरकार से करोड़ों का मुआवजा मिल जाता है. अहमदाबाद प्लेन क्रैश में पीड़ित परिवारों को 1.5-1.5 करोड़ रुपए दिए गए. यानी सड़क पर चलने वाले लोगों की जान सस्ती है और हवा में उड़ने वालों की महंगी. अगर रोड पर चलने से मौत हो जाए तो करीब 10-12 लाख और अगर हवाई जहाज में मौत हो तो 1.5 करोड़.

भारत के मुकाबले अमेरिका में एक जान की कीमत 1 करोड़ रुपए है और ब्रिटेन में 2.5 करोड़ रुपए मिलते हैं. ब्रिटेन में एक इंसान की मौत पर गांव बस सकता है, लेकिन भारत में सिर्फ एक छोटी दुकान ही खुल पाएगी. इसके अलावा सामाजिक प्रभाव भी गहरा है. 2016 में दिल्ली में एक बच्ची को ट्रक ने कुचल दिया था, जिसका CCTV फुटेज भी वायरल हुआ. हादसे के दौरान करीब 50 लोग गुजरे, लेकिन कोई नहीं रुका. यानी हमने खुद जान को सस्ता बना दिया है.

सवाल 5- किसी इंसान की जान को लेकर भारतीय बेहिस क्यों हो गए हैं?
जवाब- डॉ. अश्विनी बग्गा के मुताबिक, भारतीयों के बेहिस (ऐसा व्यक्ति जिसमें भावना न हो) होने की सबसे बड़ी वजह है पुलिस का डर, जिसने इंसानियत को कैद कर लिया. सड़क पर कोई गिरा हो, तो सबसे पहला ख्याल आता है कि अगर मैंने छुआ, तो पुलिस मुझे ही पकड़ लेगी. ये डर बिना वजह नहीं है. 2022 में पंजाब में एक शख्स ने घायल को अस्पताल पहुंचाया. पुलिस ने उसे ही मुख्य गवाह बना दिया. 2 साल कोर्ट के चक्कर लगाए और करीब 50 हजार रुपए खर्च करना पड़े.

ऐसी ही वजहों से लोग सड़क पर घायल शख्स की मदद नहीं करते. लेकिन अब हालात पहले से बेहतर हो चुके हैं. भारतीय न्याय संहिता (BNS) में नया कानून 'गुड समरिटन प्रोटेक्शन एक्ट' जोड़ दिया गया है, जिससे अगर आपने किसी घायल की मदद की तो पुलिस आपको परेशान नहीं कर सकती. आप मदद करोगे तो आपको कोई सजा नहीं मिलेगी और आप नाम भी छुपाए रखना चाहते हैं, तो भी दिक्कत नहीं. 2024 में गुजरात में एक लड़के ने घायल की मदद की. पुलिस ने उसका धन्यवाद दिया लेकिन वो डर रहा था कि कहीं केस न बन जाए.

अश्विनी बग्गा कहते हैं, 'ऐसा पहले होता था कि अगर आपने किसी घायल की मदद की और पुलिस को अपराधी न मिला तो आपको ही विक्टिम बना दिया. अब ऐसा रोकने के लिए कानून है. हालांकि, कोई भी चीज एकदम से ठीक नहीं होती और न ही बदलती है. इस कानून को स्टेबल होने के लिए कुछ समय लगेगा और आम लोगों को भी इस पर भरोसा करना सीखना होगा. अगर हम किसी की मदद करेंगे, तो कोई हमारी मदद करेगा. हमने खुद अपनी जान को सस्ता नहीं बनाया, तो यह अनमोल हो सकती है.'

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर (एबीपी लाइव- हिंदी) अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इससे पहले दो अलग-अलग संस्थानों में भी उन्होंने अपनी सेवाएं दी. जहां वे 5 साल से ज्यादा वक्त तक एजुकेशन डेस्क और ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में बतौर सीनियर सब एडिटर काम किया. वे बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को भी लीड कर चुके हैं. ज़ाहिद देश-विदेश, राजनीति, भेदभाव, एंटरटेनमेंट, बिजनेस, एजुकेशन और चुनाव जैसे सभी मुद्दों को हल करने में रूचि रखते हैं.

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