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समुद्र मंथन, हलाहल विष और 'नीलकंठ' का रहस्य; जानिए सावन में क्यों किया जाता है शिव जी का जलाभिषेक

शिव पुराण के अनुसार, सावन में समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को शिवजी ने कंठ में धारण किया था इसकी तपन शांत करने के लिए ही सावन में महादेव के जलाभिषेक की परंपरा है.

Sawan: सनातन धर्म में श्रावण (सावन) के महीने का विशेष महत्व है. पौराणिक मान्यताओं और शिव पुराण की काल-गणना के अनुसार, देवताओं और असुरों के बीच हुआ ऐतिहासिक समुद्र मंथन इसी पवित्र महीने में अपने चरम पर था. आइए जानते हैं इस पावन महीने, समुद्र मंथन की घटना और भगवान शिव के 'नीलकंठ' स्वरूप के बीच का गहरा संबंध.

क्यों सावन में हुआ था हलाहल विष का अवतरण?

शिव पुराण की कथाओं के अनुसार, जब देवताओं और दैत्यों ने अमृत की कामना से क्षीर सागर का मंथन शुरू किया, तो मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकी को नेती (रस्सी) बनाया गया. इस मंथन के दौरान सबसे पहले अत्यंत भयंकर 'हलाहल' (कालकूट) विष प्रकट हुआ. इस विष की तीव्र ज्वाला और गर्मी से पूरी सृष्टि में हाहाकार मच गया.

यह पूरी घटना सावन मास के दौरान ही घटित हुई थी. जब ब्रह्मांड को बचाने का कोई और उपाय नहीं सूझा, तब भगवान शिव ने लोक-कल्याण के लिए उस भयंकर विष का पान कर लिया. माता पार्वती ने विष के प्रभाव को रोकने के लिए शिव जी के कंठ (गले) को स्पर्श कर उसे वहीं रोक दिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे 'नीलकंठ' कहलाए.

यही कारण है कि विष की तीव्र ऊष्मा (गर्मी) से महादेव के शरीर को शीतलता प्रदान करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन पर निरंतर जल अर्पित किया. इसी ऐतिहासिक घटना के बाद से सावन के महीने में महादेव के जलाभिषेक की अटूट परंपरा की शुरुआत हुई.

समुद्र मंथन का व्यावहारिक और आध्यात्मिक संदेश

धार्मिक विद्वानों और शिव पुराण के आध्यात्मिक दृष्टिकोण के अनुसार, समुद्र मंथन की यह कथा केवल एक पौराणिक घटना मात्र नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन और मन के भीतर चलने वाले द्वंद्व को भी दर्शाती है:

मन का मंथन और विकारों का विष: जब कोई व्यक्ति भक्ति या सत्कर्म के मार्ग पर आगे बढ़ता है, तो उसके भीतर अच्छे और बुरे विचारों (देवता और असुर) का घर्षण होता है. इस वैचारिक मंथन से सबसे पहले इंसान के भीतर का क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या रूपी 'विष' बाहर आता है.

शिव तत्व में ही विष पचाने की क्षमता: सांसारिक मनुष्य के लिए दूसरों की कड़वाहट या जीवन के तनाव रूपी विष को पचाना कठिन होता है. यह क्षमता केवल 'शिव तत्व' (सच्ची भक्ति और असीम धैर्य) में है. इसलिए जीवन के मानसिक तनाव को महादेव को समर्पित कर देना चाहिए.

पंच इंद्रियों पर संयम का प्रतीक: पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान विष के बाद कामधेनु सहित पांच दिव्य गाएं निकली थीं. आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ये पांच गाएं हमारी पांच ज्ञानेंद्रियों (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) का प्रतीक हैं. संसार में रहते हुए यदि मनुष्य अपनी इन पांच इंद्रियों को संयम में रखना सीख जाए, तो उसका जीवन कल्याणकारी बन जाता है.

सावन में शिव भक्ति का वास्तविक सार

धार्मिक और व्यावहारिक दोनों ही दृष्टिकोण से सावन का यह पावन महीना हमें विपरीत परिस्थितियों में भी शांत रहने का संदेश देता है. जिस तरह महादेव ने संसार की रक्षा के लिए विष को अपने कंठ में धारण किया, उसी तरह हमें भी समाज और परिवार में फैली कड़वाहट को भुलाकर प्रेम और सद्भावना का अमृत बांटना चाहिए. यही सावन में शिव आराधना का असली आध्यात्मिक रहस्य है.

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Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

हर्षिका मिश्रा । धर्म और ज्योतिष पत्रकार

हर्षिका मिश्रा ABP Live में धर्म और ज्योतिष से जुड़े विषयों पर लिखती हैं. उन्हें ज्योतिष के क्षेत्र में तीन वर्षों का अनुभव है. पिछले एक वर्ष से वे धर्म और ज्योतिष की डिजिटल कवरेज पर काम कर रही हैं. उनके लेखन के प्रमुख विषय ग्रह गोचर, राशिफल, व्रत-त्योहार और धार्मिक परंपराएं हैं.

उन्होंने नई दिल्ली स्थित AIMC से टेलीविजन और रेडियो प्रोडक्शन में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. उनकी पढ़ाई में स्क्रिप्ट लेखन और वीडियो प्रोडक्शन शामिल रहे हैं. वे लेख और वीडियो स्क्रिप्ट के जरिए धर्म व ज्योतिष से जुड़े सवालों को सरल भाषा में समझाती हैं.

वैदिक ज्योतिष, अंक ज्योतिष, वास्तु और शकुन शास्त्र उनके अध्ययन एवं लेखन के विषय हैं. वे नई पीढ़ी के पाठकों के लिए करियर, पढ़ाई और रिश्तों से जुड़े प्रश्नों पर भी लिखती हैं. उनका ध्यान ज्योतिषीय शब्दों का अर्थ और किसी व्याख्या का आधार स्पष्ट करने पर रहता है.

उनका मानना है कि ज्योतिष से जुड़ी जानकारी डर पैदा करने के बजाय सोचने और अपनी परिस्थितियों को समझने में मदद करनी चाहिए. वे ज्योतिषीय आकलनों को संभावित संकेतों के रूप में देखती हैं और व्यक्तिगत प्रयास व जिम्मेदारी को महत्व देती हैं.

श्रीमद्भगवद्गीता का कर्म सिद्धांत उनकी सोच को प्रभावित करता है. पत्रकारिता और ज्योतिष के अलावा उन्हें संगीत, साहित्य और यात्राओं में रुचि है.

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