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Makar Sankranti 2025: सूर्योपासना का पर्व 'मकर संक्रांति' युवाओं को देता है इस बात की सीख

Makar Sankranti 2025: मकर संक्रांति विशेष रूप से सूर्य उपासना का पर्व है. लेकिन इसी के साथ यह उत्सव प्रकृति और पर्यावरण से भी जुड़ा है और युवाओं को खास संदेश देता है.

Makar Sankranti 2025: हर साल स्वामी विवेकानंद की जयंती 12 जनवरी को हम ‘युवा दिवस’ के रूप में मनाते हैं. ये युवा ही है जो हर तरह के परिवर्तन के वाहक होते हैं. कहा भी जाता है कि ‘जिस ओर जवानी चलती है, उस ओर जमाना चलता है’. युवा शब्द के अक्षरों को यदि उल्टा किया जाए तो शब्द बनता है ‘वायु’. वायु को शायद ही कोई रोक पाए. हां वायु को दिशा दी जा सकती है. युवा होने का मतलब ही है ऊर्जा और उत्साह से भरा होना. कुछ भी करने की चाहत होना. युवा साधन या संसाधन की चिंता नहीं करता. हैंडल छोड़कर साइकिल या बाइक युवा ही चलाते हैं, इसका मतलब है कि युवा ही खतरों के खिलाड़ी होते हैं.

युवा दिवस के दो दिन बाद आता है ‘मकर संक्रांति’ का उत्सव. यह उत्सव प्रकृति और पर्यावरण से जुड़ा हुआ है. मकर संक्रांति के उत्सव का एक विशेष संदेश युवाओं के लिए भी है. वही सन्देश इस आलेख में देने का प्रयास किया गया है.

प्रकृति और पर्यावरण संबंधी चिताएं आज जगजाहिर है. इस विषय में जानकारी के साथ साथ समझदारी का संवर्धन करने के लिए हम भारतीयों को ही नहीं प्रत्युत विश्व के सभी विद्वानों, विचारकों और नायकों को पुनः मन से और प्रामणिकता के साथ सनातनी हिन्दू दर्शन, दृष्टि, जीवन शैली, व्यवहार शैली, परमपरायें, रीति रिवाज, उत्सव त्यौहार और मानव जीवन के साथ इनके संबंध को लेकर गहन अध्ययन के साथ साथ चिंतन और विश्लेषण भी करने की आवश्यकता है।

मकर संक्रांति सूर्य नारायण की उपासना का पर्व है. संस्कृत लोकसाहित्य के एक उत्कृष्ट एवं अनुपम ग्रंथ ‘भोजप्रबन्ध’(जिसे ‘बल्लाल सेन’ की रचना माना जाता है) में सूर्यनारायण के संबंध में एक सुंदर श्लोक या गद्य है:

‘रथस्यैकं चक्र भुजगयमिताः सप्त तुरगा
निरालम्बो मार्गश्चरणविकलः सारथिरपि।
रविर्यात्येवान्तं प्रतिदिनमपारस्य नमसः
क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे ॥

जिसका भावार्थ है कि “सूर्य के रथ में केवल एक ही पहिया (चक्का) है, सात घोड़े हैं (विषम संख्या) और वे घोड़े साधारण रस्सियों (लगाम) से नहीं प्रत्युत सर्पों से बंधे हुए हैं, रथ का सारथि अपंग (चरणहीन) है और कोई निश्चित मार्ग नहीं है अर्थात् मार्ग का कोई आधार नहीं है, अनंत अंतरिक्ष में चलना पड़ता है. इन सभी विषमताओं के बावजूद सूर्य नारायण प्रतिदिन विस्तृत नभ के अन्त-भाग तक सहजता से अपनी गति करते हैं. इसका अर्थ है की श्रेष्ठजनों की क्रिया सिद्धि पौरुष से होती है, न कि साधनों या संसाधनों से.

हम जानते हैं कि सूर्य के बिना पृथ्वी पर जीवन असम्भव है. भोजप्रबंध के इस श्लोक के अनुसार सूर्य और उसकी गति व्यवस्था का जो वर्णन है उस हिसाब से तो उनके पास साधन के नाम पर कुछ भी नहीं है. क्या कोई व्यक्ति ऐसे रथ अथवा गाड़ी पर यात्रा कर सकता है जिसमें केवल एक पहिया हो, जिसके ड्राईवर या सारथी के पैर न हो, जिसके घोड़ों (टायरों) की संख्या भी बैलेंसिंग न हो, ऊपर से उन घोड़ों को नियंत्रित करने वाली रस्सियों (स्टीयरिंग) की जगह बड़े बड़े सर्प हो और मार्ग के नाम पर कोई पक्का रोड नहीं है बल्कि अन्नत आकाश हो? इस प्रश्न का उत्तर बड़ा सा ‘न’ ही होगा. लेकिन, ये भी सत्य है कि सूर्य प्रतिदिन निश्चित समय से उदय होता है और निश्चित समय से अस्त. अपने इसी रथ और चरणविहीन सारथी के साथ सूर्य वर्ष भर उत्तरायण और दक्षिणायन का यह सूंदर खेल खेलते रहते हैं. इसी साधन विहीन व्यवस्था में सूर्य का यह मकर संक्राति उत्सव भी आता है.

वास्तव मे इस श्लोक का सन्देश मनुष्य के जीवन और विशेषकर युवाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और वह संदेश हैं कि सफलता के लिए साधनों के आभाव को लेकर रोने धोने की आवश्यकता नहीं है, क्रिया सिद्धि अर्थात् सफलता के लिए ‘पौरुष अथवा पुरुषार्थ का प्रदर्शन करना पड़ता है. पौरुष के समक्ष सभी साधन गौण होते हैं.

मकर संक्रांति का संक्षिप्त परिचय और प्रकृति संबंधी महत्व

पृथ्वी पर ऊर्जा के एकमात्र स्त्रोत सूर्य के स्वागत के लिए मनाया जाने वाला उत्सव मकर संक्रांति (लोहड़ी) कोई सामान्य उत्सव नहीं हैं, बल्कि यह एक वैदिक उत्सव है. पृथ्वी का उत्तरी गोलार्ध इस दिन सुर्योंन्मुखी हो जाता है. पौष मास में जब सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है तब मकर संक्राति का यह पर्व मनाया जाता है. मनुष्य जीवन का आधार माने जाने वाले तीन महत्वपूर्ण अंगों प्रकृति, ऋतु परिवर्तन और कृषि से इस उत्सव का बहुत गहन संबंध है. ईसा के जन्म से बहुत पहले सृजित ब्राह्मण एवं उपनिषद ग्रंथों में उत्तरायण के छह मासों का वर्णन आता है. प्रति वर्ष 14 जनवरी को आने वाली मकर संक्रांति से 14 जुलाई को आने वाली कर्क संक्रांति के मध्य आने वाले 6 मास के समयांतर काल को उत्तरायण कहते हैं और 14 जुलाई से 14 जनवरी के बीच के समयांतर को दक्षिणायन कहते हैं. भारत के विविध राज्यों में इस उत्सव को अलग अलग नामों से जाना जाता है और मनाया जाता है. जबकि भारत के बाहर बांग्लादेश में इसे पौष संक्रांति, म्यांमार में थिंयान, नेपाल में माघे संक्रान्ति या ‘माघी संक्रान्ति’ ‘खिचड़ी संक्रान्ति’, लाओस में पि मा लाओ, कम्बोडिया में मोहा संगक्रान और श्रीलंका में इसे पोंगल, उझवर तिरुनल के नाम से मनाया जाता है.

हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि अर्थात नकरात्मकता का प्रतीक जबकि उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात सकरात्मकता का प्रतीक माना गया है. मकर संक्रांति के दिन सूर्य अपनी स्थिति परिवर्तित करता है जिससे पृथ्वी पर बदलाव आएगा. इस परिवर्तन का अर्थ प्रकृति में सकारात्मक परिवर्तन से है. ऐसे सकारात्मक परिवर्तनों को उत्सव के रूप में मनाना ही भारत की सनातन संस्कृति रही है. जिसके माध्यम से हमारा प्रकृति के साथ संबंध बना रहता है. भारत के विविध राज्यों में इस दिन विविध प्रकार का खानपान भी होता है. उत्तर भारत में मकर संक्रांति के पिछली संध्या पर आग जलाकर तिल, गुड़, रेवड़ी आदि की आहुति दी जाती है और मिष्ठान स्वरूप वितरण भी किया जाता है. विशेष रूप से उड़द की खिचड़ी खाने की परंपरा है.

मकर संक्रांति की खिचड़ी और सामाजिक समरसता

इस दिन खिचड़ी खाने की परम्परा है. खिचड़ी को सामाजिक समरसता का प्रतीक माना जाता है. समरसता कैसे? क्योंकि चावल सफ़ेद होते हैं, उड़द की दाल काली होती है, अन्य दालें या सब्जियां भी डाली जाती है, उनका रंग और स्वाद या विशेषता अलग अलग होती है. साथ में देशी घी भी डाला जाता है. कुल मिलाकर जब खिचड़ी बनती है तो सब अपनी विशेषता को बनाकर रखते हुए ‘समरस’ होकर एक स्वाद देते हैं. उसी एकरस अर्थात् समरस स्वाद का नाम होता है ‘खिचड़ी’. कई जगह तिल गुड़ भी बांटा जाता है. यहां देशी घी स्नेह का प्रतीक होता है. देशी घी वाली खिचड़ी का मतलब है शुद्ध सात्विक स्नेह के साथ समरस बनकर रहना. आज समाज में अस्पृश्यता कुरीति है, उसके निदान के लिए समरसता जैसे भावना की अत्यंत आवश्यता है. हमारे देश में प्राचीन काल से समरसता रही है. जहां ‘समरसता का ‘रस’ जहां होता है उसे ही ‘रसोई’ कहा जाता है. समाज को समरस बनाने के लिए मकर संक्रांति उत्सव के उपलक्ष्य में बनने वाले खिचड़ी और तिल के लडडू या रेवड़ी का विशेष संदेश है.

खाने की जो परम्परा इस उत्सव से जुडी है उसमें प्रकृति का महत्व भी स्पष्ट दिखता है. मकर संक्रांति में तिल का एक विशेष महत्व है. इसमें भरपूर मात्रा में कैल्सियम, आयरन, ऑक्सेलिक एसिड, एमिनो एसिड, प्रोटीन, विटामिन बी, सी, ई भी होता है. इस प्रकार तिल कई रोगों के उपचार में काम आता है साथ में विशेष ऋतु में स्वास्थ्य संबंधी लाभ भी हैं. इसमें गुड़ मिल जाने से इसका औषधीय गुण प्राकृतिक स्वास्थ्य मूल्य बढ़ जाता है. आइये समाज को युवाओं के पुरुषार्थ के बल पर ‘समरस’ बनाने का प्रयास करें. 

नारायणायेती समर्पयामि.......

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[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]

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