Ultra Processed Foods: बार-बार क्यों करता है पिज्जा-बर्गर जैसे अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड खाने का मन? सामने आई डराने वाली स्टडी
अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड को लेकर हाल ही में एक रिसर्च हुई है. इसमें बताया गया कि अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड को लोग शौक में नहीं, बल्कि इमोशनल डिस्ट्रेस और लत की वजह से ज्यादा खाते हैं.

पिज्जा-बर्गर, चिप्स-नमकीन, बिस्किट-कुकीज, फ्रेंच फ्राइज जैसे अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड देखते ही क्या आपके भी मुंह में पानी आ जाता है तो इसकी वजह इन्हें खाने से आने वाला आनंद नहीं है. दरअसल, लोग बेवजह की लत और अपना इमोशनल डिस्ट्रेस दूर करने के लिए अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड बार-बार खाते हैं. यह खुलासा फूड साइंस एंड न्यूट्रिशन जर्नल में हाल ही में प्रकाशित एक स्टडी में हुआ. यह स्टडी अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड यानी यूपीएफ खाने, फूड एडिक्शन, खुशी के लिए चीजें खाने और मूड को लेकर की गई.
कैसे तैयार किए जाते हैं अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड?
बदलती लाइफस्टाइल के हिसाब से फूड प्रोसेसिंग काफी ज्यादा होने लगी है, जिसे बढ़ाने में नई-नई तकनीक का काफी ज्यादा योगदान है. हालांकि, फूड प्रोसेसिंग की मात्रा और इसके मकसद का सीधा असर आम लोगों की सेहत पर पड़ता है. यही वजह है कि नोवा क्लासिफकेशन सिस्टम ने खाद्य पदार्थों को चार कैटिगरी में बांटा है. इनमें से एक कैटिगरी यूपीएफ यानी अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड है, जिसमें काफी एडिटिव्स होते हैं और जो इंटेंसिव इंडस्ट्रियल प्रोसेसिंग से होकर गुजरते हैं. यही वजह है कि इनका नैचुरल स्ट्रक्चर भी खराब हो जाता है.
सेहत के लिए कैसे होते हैं अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड?
गौरतलब है कि यूपीएफ को तैयार करने के लिए आमतौर पर एंटी-ह्यूमेक्टेंट्स, फ्लेवर इनहैंसर और इमल्सीफायर्स इस्तेमाल किए जते हैं, जिससे इन्हें बनाने का खर्च कम होता है और शेल्फ लाइफ बढ़ जाती है. अहम बात यह है कि यूपीएफ से होने वाली कमाई, एग्रेसिव विज्ञापनों, बदलती लाइफस्टाइल ने इनके सेवन में काफी ज्यादा इजाफा किया है. हालांकि, कम पोषक तत्व और ज्यादा फैट होने के कारण यूपीएफ लोगों की सेहत के लिए खतरनाक साबित हो रहे हैं.
यूपीएफ पर ऐसे की गई स्टडी
ऑनलाइन हुई इस स्टडी में रिसर्चर्स ने यूपीएफ के सेवन, फूड एडिक्शन, मूड और हेडोनिक हंगर पर फोकस किया गया. बता दें कि हेडोनिक हंगर का मतलब शरीर की जरूरत के हिसाब से खाने की जगह सिर्फ स्वाद-आनंद और इमोशनल सैटिस्फैक्शन के लिए चीजें खाना होता है. यह सर्वे तुर्किए के अंकारा में 18 से 65 साल उम्र के लोगों पर सितंबर 2024 से जनवरी 2025 तक किया गया. अहम बात यह है कि इस सर्वे में अधूरे जवाब देने वालों, साइकैट्रिक डिसऑर्डर और ईटिंग डिसऑर्डर वाले लोगों को जगह नहीं दी गई.
स्टडी में इस्तेमाल की गईं ये तकनीक
सर्वे में शामिल लोगों की फूड हैबिट का आकलन हाईली प्रोसेस्ड फूड कंजम्पशन स्क्रीनिंग क्वेश्चनायर के इस्तेमाल से किया गया. वहीं, हेडोनिक हंगर का मूल्यांकन पावर ऑफ फूड स्केल (PFS) के माध्यम से किया गया. इसके अलावा येल फूड एडिक्शन स्केल (YFAS) की मदद से फूड एडिक्शन की जांच की गई. साथ ही, सर्वे में शामिल लोगों का इमोशनल स्टेटस जानने के लिए डिप्रेशन एंग्जायटी स्ट्रेस स्केल-21 (DASS-21) का उपयोग किया गया.
स्टडी में सामने आई यह बात
इस स्टडी में 3,997 वयस्कों को शामिल किया गया, जिनकी औसत उम्र 31.7 वर्ष थी. इनमें 63 फीसदी महिलाएं और 52.9 फीसदी बेरोजगार थे. इन सभी लोगों का औसत बॉडी मास इंडेक्स (BMI) 24.5 किग्रा/मी² था. स्टडी में शामिल 55 पर्सेंट लोगों का वजन नॉर्मल था, जबकि 11.7 पर्सेंट लोग मोटे थे. इसके अलावा 27.5 पर्सेंट लोग ओवरवेट और 5.6 पर्सेंट लोग अंडरवेट थे. sQ-HPF, PFS, और YFAS मानकों पर इन सभी का औसत स्कोर क्रमशः 5.1, 2.8, और 2.9 था.
DASS-21 पर तनाव, अवसाद और चिंता का औसत स्कोर क्रमशः 5.9, 5.6, और 5.0 था. 55% से अधिक लोगों का यूपीएफ सेवन कम था, जबकि करीब 45 फीसदी लोग काफी ज्यादा अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड का सेवन करते थे. सर्वे में सामने आया अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड खाने वालों की औसत उम्र 28.8 साल मिली, जबकि यूपीएफ कम खाने वालों की औसत उम्र 34.1 साल पाई गई. अहम बात यह थी कि अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड अकेले रहने वाले और अविवाहित लोग ज्यादा खाते हैं. यह बात भी सामने आई कि लोग इनका सेवन अपने शरीर की जरूरत के हिसाब से नहीं, बल्कि अपने मूड के हिसाब से करते हैं.
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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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Source: IOCL





















