चीन और अमेरिका के बीच कैसे शुरू हुई ट्रेड वॉर, अब तक क्या-क्या हुआ?
China US Trade War: हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात हुई है. इसी बीच आइए जानते हैं कि दोनों देशों के बीच व्यापार संबंध कैसे हैं. जानें इस बारे में पूरी जानकारी.

- टैरिफ बढ़ने से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और व्यापार में बदलाव आया।
China US Trade War: चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच संबंधों में सहयोग के साथ-साथ तीव्र आर्थिक प्रतिद्वंदिता भी देखी गई है. व्हाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप द्वारा गर्म जोशी से स्वागत करते हुए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तस्वीरें उन तनावों के उलट हैं जिन्होंने उनके आर्थिक संबंधों को आकार दिया है. इस प्रतिद्वंद्विता के केंद्र में व्यापार युद्ध है. यह टैरिफ के साथ शुरू हुआ लेकिन धीरे-धीरे प्रौद्योगिकी, व्यापार और वैश्विक आर्थिक प्रभाव पर व्यापक विवाद में बदल गया.
व्यापार युद्ध क्यों शुरू हुआ?
व्यापार संघर्ष मुख्य रूप से दोनों देशों के बीच बड़े व्यापार असंतुलन, बौद्धिक संपदा और प्रौद्योगिकी पर विवाद और चीन की औद्योगिक नीतियों पर असहमति से प्रेरित था. 2018 तक चीन के साथ अमेरिका का व्यापार घाटा 375 बिलियन डॉलर से ज्यादा हो गया था. ट्रंप प्रशासन ने तर्क दिया कि असंतुलन अमेरिकी उद्योगों और नौकरियों को नुकसान पहुंचा रहा है जबकि चीन को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में एक बड़ा फायदा मिल रहा है.
अमेरिका ने चीन पर जबरन प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और बौद्धिक संपदा की चोरी सहित दूसरी गतिविधियों का भी आरोप लगाया. एक दूसरी बड़ी शिकायत में चीनी राज्य के स्वामित्व वाले उद्यमों को सरकारी सब्सिडी शामिल थी. इसके बारे में वॉशिंगटन ने तर्क दिया कि इससे चीनी कंपनियों को वैश्विक बाजारों में गलत तरीके से प्रतिस्पर्धा करने की अनुमति मिली.

2018 में पहला टैरिफ
व्यापार युद्ध औपचारिक रूप से 2018 में बढ़ गया जब अमेरिका ने चीनी उत्पादों पर टैरिफ लगाना शुरू कर दिया. उसी साल जनवरी में वॉशिंगटन ने इंपोर्टेड सौर पैनलों और वॉशिंग मशीनों पर टैरिफ पेश किया.
जुलाई 2018 में अमेरिका ने लगभग 34 बिलियन डॉलर मूल्य के चीनी सामानों पर 25% टैरिफ लगाया. चीन ने सोयाबीन और अमेरिकी ऑटोमोबाइल जैसे कृषि सामान सहित समान मूल्य के अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ के साथ लगभग तुरंत प्रतिक्रिया दी. 2019 के आखिर तक दोनों देशों ने एक-दूसरे के सैकड़ों अरब डॉलर मूल्य के उत्पादों पर टैरिफ लगा दिया था.
चरण एक व्यापार सौदा
लंबे समय तक आर्थिक दबाव के बाद चीन और अमेरिका जनवरी 2020 में एक अस्थायी समझौते पर पहुंचे. इसे चरण एक व्यापार समझौते के रूप में जाना जाता है. समझौते के तहत चीन ने अगले 2 सालों में 200 अरब डॉलर का अतिरिक्त अमेरिकी सामान खरीदने और बौद्धिक संपदा सुरक्षा को मजबूत करने का वादा किया. बदले में अमेरिका ने कुछ नियोजित टैरिफ वापस ले लिए.
बिडेन प्रशासन और तकनीकी युद्ध
2021 में जब जो बिडेन राष्ट्रपति बने तो ट्रंप प्रशासन के दौरान लगाए गए टैरिफ नहीं हटाए गए. इसके बजाय आर्थिक टकराव का विस्तार प्रौद्योगिकी क्षेत्र में हुआ. बिडेन प्रशासन ने एडवांस्ड सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकी और सुपरकंप्यूटिंग क्षमताओं तक चीन की पहुंच पर प्रतिबंध लगा दिया. यह विवाद मौजूदा टैरिफ संघर्ष के साथ-साथ तेजी से एक प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा बन गया.

ट्रंप के नेतृत्व में तनाव फिर से बढ़ गया
2025 में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति पद पर लौटने के बाद टकराव काफी तेज हो गया. रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने चीनी सामानों पर औसत टैरिफ 145% तक बढ़ा दिया. वित्त मंत्रालय के मुताबिक चीन ने अमेरिकी वस्तुओं पर टैरिफ बढ़ाकर 125% कर दिया. यह उपाय दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच टैरिफ विवाद में तेजी से बढ़ोतरी को दर्शाते हैं.
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तीसरे देश के जरिए से व्यापार परिवर्तन
ऊंचे टैरिफ ने कंपनियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार करने के तरीके को भी प्रभावित किया है. रिपोर्ट के मुताबिक चीन से प्रत्यक्ष अमेरिकी इंपोर्ट लगभग 38 बिलियन डॉलर तक गिर गया. यह 16 सालों में उनका सबसे निचला स्तर है.
कुछ कंपनियों ने अपने आपूर्ति श्रृंखला और व्यापार के कुछ हिस्सों को मैक्सिको और वियतनाम जैसे देशों के जरिए से स्थानांतरित कर दिया है .
इस वजह से 2018 के बाद से ट्रेड वॉर में काफी बदलाव आया है. जो लड़ाई मुख्य रूप से टैरिफ और व्यापार असंतुलन को लेकर शुरू हुई थी वह अब टेक्नोलॉजी, सप्लाई चेन, इंडस्ट्रियल पॉलिसी और ग्लोबल इकोनॉमिक प्रभाव से जुड़ी एक व्यापक प्रतिस्पर्धा में बदल चुकी है.
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