नई सरकार के गठन तक कौन चलाता है सरकार, किसके हाथ में होती है पावर?
सत्ता परिवर्तन के समय जब एक सरकार का कार्यकाल समाप्त होता है और नई सरकार का आगमन होना बाकी होता है, तो उस समय को ‘ट्रांजिशन पीरियड' कहते हैं. आइए जानें कि इस दौरान राज्य कौन संभालता है.

- नई सरकार के शपथ लेते ही सत्ता हस्तांतरण पूरा.
चुनाव के नतीजे आने के बाद जब पुरानी सरकार की विदाई तय हो जाती है और नई सरकार का आना अभी बाकी होता है, तो सत्ता के गलियारों में एक बड़ा सवाल तैरता है कि आखिर इस वक्त पावर किसके पास है? क्या हारने वाला मुख्यमंत्री आदेश दे सकता है या फिर सारा कंट्रोल राजभवन चला जाता है? लोकतंत्र में सत्ता का हस्तांतरण एक तय प्रक्रिया के तहत होता है, जिसमें राज्यपाल और कार्यवाहक मुख्यमंत्री की भूमिका सबसे अहम हो जाती है. आइए जानते हैं इस ट्रांजिशन पीरियड के कानूनी और प्रशासनिक नियम क्या हैं.
राज्यपाल की सर्वोच्च सत्ता
किसी भी राज्य में चुनाव नतीजों के आने और नई सरकार के गठन के बीच का समय राज्यपाल की सक्रियता का होता है. राज्यपाल राज्य के संवैधानिक प्रमुख होते हैं और इस अंतरिम काल में राज्य की अंतिम शक्ति उन्हीं के हाथों में केंद्रित होती है. जब तक नया मुख्यमंत्री अपने पद और गोपनीयता की शपथ नहीं ले लेता, तब तक राज्यपाल ही राज्य के प्रशासन की निगरानी करते हैं. यदि निवर्तमान मुख्यमंत्री इस्तीफा दे चुके हैं, तो राज्य की कार्यकारी शक्तियां तकनीकी रूप से राज्यपाल में निहित मानी जाती हैं.
कार्यवाहक मुख्यमंत्री की सीमित भूमिका
परंपरा और नियमों के मुताबिक, जब कोई मुख्यमंत्री इस्तीफा देता है, तो राज्यपाल अक्सर उन्हें तब तक 'कार्यवाहक मुख्यमंत्री' के तौर पर काम जारी रखने का आग्रह करते हैं जब तक कि नई सरकार न बन जाए. हालांकि, कार्यवाहक मुख्यमंत्री के पास वह ताकत नहीं होती जो एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार के पास होती है. उनकी भूमिका केवल दैनिक प्रशासनिक कार्यों को निपटाने तक सीमित रहती है ताकि राज्य का काम-काज ठप न हो जाए.
कार्यवाहक सरकार के बड़े फैसलों पर संवैधानिक रोक
कार्यवाहक सरकार के दौरान सबसे बड़ी पाबंदी नीतिगत फैसलों पर होती है. इस दौरान निवर्तमान मुख्यमंत्री या उनका मंत्रिपरिषद कोई भी ऐसा बड़ा फैसला नहीं ले सकता, जिसका असर राज्य की अर्थव्यवस्था या कानून पर लंबे समय तक पड़े. वे न तो कोई नई सरकारी योजना शुरू कर सकते हैं और न ही किसी बड़े टेंडर या नीतिगत घोषणा को मंजूरी दे सकते हैं. यह सुनिश्चित किया जाता है कि नई आने वाली सरकार पर पुरानी सरकार के फैसलों का अनावश्यक बोझ न पड़े.
यह भी पढ़ें: चुनाव हारने के बाद सीएम न दे इस्तीफा तो क्या होगा, क्या गवर्नर दिखा सकते हैं बाहर का रास्ता?
नौकरशाही और मुख्य सचिव की जिम्मेदारी
जब सरकार बदलाव के दौर से गुजर रही होती है, तब राज्य की नौकरशाही की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. दैनिक प्रशासनिक कार्यों का वास्तविक नियंत्रण मुख्य सचिव और संबंधित अधिकारियों के हाथ में होता है. यदि कार्यवाहक मुख्यमंत्री मौजूद न हों, तो राज्यपाल सीधे मुख्य सचिव के माध्यम से प्रशासनिक व्यवस्था को संभालते हैं. पुलिस, कानून-व्यवस्था और अन्य जरूरी सेवाएं इसी प्रशासनिक ढांचे के जरिए चलती रहती हैं जब तक कि नई कैबिनेट शपथ न ले ले.
सत्ता का हस्तांतरण और शपथ ग्रहण
सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया का अंतिम पड़ाव शपथ ग्रहण समारोह होता है. बहुमत प्राप्त दल का नेता राज्यपाल के समक्ष सरकार बनाने का दावा पेश करता है. राज्यपाल द्वारा नियुक्त किए जाने के बाद, वे नए मुख्यमंत्री को पद की शपथ दिलाते हैं. जैसे ही नए मुख्यमंत्री शपथ लेते हैं, सत्ता पूरी तरह से उनके हाथों में चली जाती है और पुरानी कार्यवाहक सरकार और राज्यपाल का अंतरिम हस्तक्षेप स्वतः ही समाप्त हो जाता है.
संवैधानिक संकट में राज्यपाल का अधिकार
यदि चुनाव के बाद ऐसी स्थिति बने कि कोई भी दल सरकार बनाने की स्थिति में न हो या निवर्तमान मुख्यमंत्री काम जारी रखने से मना कर दे, तो राज्यपाल की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है. ऐसी स्थिति में वे सीधे प्रशासनिक मशीनरी को निर्देश दे सकते हैं. यह राज्यपाल का संवैधानिक दायित्व है कि वे राज्य में शासन की निरंतरता बनाए रखें और प्रशासनिक शून्यता न आने दें. भारत का संविधान यह सुनिश्चित करता है कि राज्य कभी भी बिना किसी मुखिया या बिना किसी व्यवस्था के न रहे.
यह भी पढ़ें: पश्चिम बंगाल, असम या तमिलनाडु... किस राज्य में विधायकों को मिलती है सबसे ज्यादा सैलरी?
























