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Euthanasia: किस देश में सबसे पहले लागू हुई थी इच्छामृत्यु, किस वजह से उस शख्स ने चुनी थी मौत?

Euthanasia: सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय से अचेत अवस्था में पड़े हरीश राणा के मामले में पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी है. इस फैसले के बाद उस परिवार को राहत मिलने की उम्मीद है.

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  • सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से कोमा में युवक को पैसिव इच्छामृत्यु दी.
  • परिवार को सर्वोच्च हित में निर्णय लेने का अधिकार होगा.
  • नीदरलैंड्स में 2002 में इच्छा मृत्यु को मिली पहली कानूनी मान्यता.
  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देशों में सख्त नियमों के साथ अनुमति है.

भारत में इच्छा मृत्यु को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है. दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय से अचेत अवस्था में पड़े एक युवक के मामले में पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी है. इस फैसले के बाद उस परिवार को राहत मिलने की उम्मीद है जो सालों से अपने बेटे को इस हालत में देख रहा है. बल्कि इच्छामृत्यु को लेकर देश में चल रही बहस भी फिर से केंद्र में आ गई है.

यह मामला उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा का है जो पिछले करीब 13 साल से बिस्तर पर अचेत अवस्था में पड़े हैं. उनके माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की थी कि बेटे की हालत में इतने सालों से कोई सुधार नहीं हुआ है और डॉक्टर भी ठीक होने की उम्मीद नहीं जता रहे हैं. इसलिए उन्हें पैसिव इच्छा मृत्यु की अनुमति दी जाए. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन शामिल थे. उन्होंने इस मामले में फैसला सुनाते हुए पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी है.

अदालत ने कहा कि जब मरीज खुद निर्णय लेने की स्थिति में न हो तब उसके करीब परिजनों को उसके सर्वोच्च हित को ध्यान में रखते हुए फैसला लेने का अधिकार होता है.  ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि किस देश में इच्छा मृत्यु सबसे पहले लागू हुई थी और किस वजह से उस शख्स ने मौत चुनी थी.

ये भी पढ़ें-किस देश में सबसे आसान है इच्छामृत्यु का तरीका, भारत में अपनाया जाएगा कौन-सा मैथड?

13 साल पहले हुई दुर्घटना ने बदल दी जिंदगी 

32 वर्षीय हरीश राणा मूल रूप से गाजियाबाद के रहने वाले हैं. साल 2013 में जब हरीश राणा पढ़ाई के लिए चंडीगढ़ में रह रहे थे, तब एक दुर्घटना में वह अपने हॉस्टल की चौथी मंजिल से नीचे गिर गए थे. साथ में उनके सिर में गंभीर चोट लगी और उनके दिमाग को भारी नुकसान पहुंचा. दुर्घटना के बाद से ही वह अचेत अवस्था में थे और लगातार बिस्तर पर पड़े हुए हैं. लंबे समय तक इस स्थिति में रहने के कारण उनके शरीर पर घाव भी हो गए. डॉक्टरों की रिपोर्ट के अनुसार इतने साल में उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ. वहीं इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस से हरीश की मेडिकल रिपोर्ट भी मंगाई थी. अस्पताल की रिपोर्ट में कहा गया कि उनके ठीक होने की संभावना नहीं है, इसी आधार पर अदालत ने पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दी. 

किस देश में सबसे पहले लागू हुई इच्छामृत्यु?

दुनिया में इच्छा मृत्यु को सबसे पहले कानूनी मान्यता देने वाला देश नीदरलैंड था. यहां 1 अप्रैल 2002 को इसे कानून का दर्जा दिया गया था. इस कानून के तहत बहुत सख्त शर्तों के साथ मरीज को अपनी इच्छा से जीवन समाप्त करने की अनुमति दी जाती है. इसके बाद बेल्जियम, लक्जमबर्ग और कोलंबिया जैसे देशों में भी अलग-अलग नियमों के आधार के साथ इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता मिली. वहीं स्विट्जरलैंड में असिस्टेड सुसाइड की व्यवस्था है, जिसमें डॉक्टर की मदद से व्यक्ति अपने जीवन को समाप्त करने का फैसला ले सकता है.

इसके अलावा अमेरिका के कुछ राज्यों और कनाडा में भी सख्त नियमों के साथ इच्छा मृत्यु दी जाती है. हालांकि कई देशों में यह अब भी गैरकानूनी है या फिर सीमित रूप से मान्य है. नीदरलैंड में इच्छा मृत्यु को कानूनी मान्यता देने से पहले इसके पीछे कई वर्षों की सामाजिक और कानूनी बहस रही है. इसकी शुरुआत 1973 के चर्चित पोस्टमा केस से मानी जाती है. जब एक डॉक्टर ने अपनी गंभीर रूप से बीमार और असहनीय पीड़ा झेल रही मां की बार-बार इच्छा पर उनकी मृत्यु में मदद की. इस मामले में अदालत ने डॉक्टर को दोषी तो माना लेकिन सजा बहुत हल्की रखी और यह भी माना कि किसी मरीज को उसकी इच्छा के विरुद्ध लगातार पीड़ा में जीवित रखना जरूरी नहीं है. इस घटना के बाद नीदरलैंड में इच्छा मृत्यु पर बहस तेज हुई और 2002 में इसे कानूनन मान्यता दे दी गई.

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कविता एबीपी नेटवर्क नोएडा के साथ बतौर कंटेंट राइटर काम कर रही है. वर्तमान में कविता का मुख्य फोकस शिक्षा, करियर और नौकरी से जुड़ी खबरों पर रहता है.

करीब 3.5 साल से पत्रकारिता की दुनिया से जुड़ी कव‍िता एबीपी नेटवर्क से पहले राजस्थान पत्रिका में काम कर चुकी है. यहां  उन्होंने नेशनल एडिशन और अलग-अलग सप्लीमेंट्स के लिए काम किया. राजस्थान पत्रिका में करियर की उड़ान और सी न्यूज जैसे कॉलम वह कवर करती थी. इसी दौरान उन्हें हेलो डॉक्टर शो के साथ काम करने का अवसर मिला, जिसने उन्हें न्यूज़ प्रोडक्शन की बारीकियों को समझने का अनुभव दिया. वहीं पत्रकारिता के अलावा कविता की खास रुचि खेल, विशेष रूप से क्रिकेट में है. राजस्थान पत्रिका में रहते हुए कविता ने मदर्स डे स्पेशल स्पोर्ट्स एडिशन में भी काम किया है.

पढ़ाई की बात करें तो कविता ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, भोपाल से न्यू मीडिया टेक्नोलॉजी में मास्टर्स और अपेक्स यूनिवर्सिटी जयपुर से बैचलर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की.

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