शिया बनने से पहले सुन्नी देश था ईरान, जानें किन बड़े इस्लामिक धर्मगुरुओं से रहा फारस का कनेक्शन?
ईरान का इस्लाम से नाता पैगंबर के साथी सलमान अल-फारसी से शुरू हुआ. इमाम हुसैन और फारसी राजकुमारी के विवाह ने इस रिश्ते को पारिवारिक बनाया. आइए जानें किन बड़े इस्लामिक धर्मगुरुओं का फारस से कनेक्शन रहा.

आज के दौर में ईरान और इजरायल के बीच जारी भीषण मिसाइल युद्ध ने पूरी दुनिया को दहला रखा है. इस तनाव के बीच जब हम ईरान को देखते हैं, तो वह एक कट्टर शिया देश के रूप में नजर आता है, लेकिन इतिहास की गहराइयों में झांकने पर पता चलता है कि यह हमेशा से ऐसा नहीं था. एक दौर था जब ईरान पारसी धर्म का गढ़ था और उसके बाद सदियों तक यह एक सुन्नी बहुल राष्ट्र रहा. आज के आधुनिक ईरान की धार्मिक और राजनीतिक जड़ें उन बड़े बदलावों में छिपी हैं, जिन्होंने फारस की पहचान को पूरी तरह बदल कर रख दिया है.
पारसी धर्म का उदय और प्राचीन फारस का गौरव
इस्लाम के आगमन से पहले ईरान की पहचान पारसी (जोरोस्ट्रियन) धर्म से थी. पैगंबर जोरोस्टर ने यहां इस धर्म की नींव रखी थी, जो अच्छाई और बुराई के बीच संघर्ष की बात करता था. 550 ईसा पूर्व से लेकर 651 ईस्वी तक, ईरान में महान राजाओं का शासन रहा, जिनका साम्राज्य हिंदुस्तान से लेकर यूनान की सीमाओं तक फैला था. यह वह समय था जब ईरान की संस्कृति, वास्तुकला और दर्शन पूरी दुनिया के लिए मिसाल हुआ करते थे. सासानियन राजवंश के पतन के साथ ही इस प्राचीन युग का अंत हुआ.
सातवीं सदी में अरब आक्रमण और इस्लाम का प्रवेश
ईरान में इस्लाम का प्रवेश सातवीं सदी में हुआ, जब अरब के मुस्लिम शासकों ने फारस पर हमले शुरू किए. सासानियन सेना की हार के बाद, ईरान धीरे-धीरे इस्लामिक रंग में रंगने लगा. अगले कुछ दशकों में, बड़ी संख्या में पारसियों ने इस्लाम कबूल कर लिया. हालांकि, यह जानना दिलचस्प है कि शुरुआत में ईरान एक शिया देश नहीं, बल्कि सुन्नी बहुल राष्ट्र बना था. लगभग 900 सालों तक ईरान के अधिकांश हिस्सों में सुन्नी इस्लाम का ही बोलबाला रहा और यहां के मदरसों से बड़े सुन्नी विद्वान निकले.
सफाविद राजवंश और शिया धर्म का आधिकारिक उदय
ईरान के इतिहास में सबसे बड़ा मोड़ साल 1501 में आया, जब शाह इस्माइल प्रथम ने सफाविद राजवंश की स्थापना की. शाह इस्माइल ने सत्ता संभालते ही एक ऐतिहासिक और साहसी फैसला लिया. उसने शिया इस्लाम (ट्वेलवर शिइज्म) को ईरान का आधिकारिक राजकीय धर्म घोषित कर दिया. उस समय ईरान की बहुसंख्यक आबादी सुन्नी थी, लेकिन शाह ने राजनीतिक और कूटनीतिक कारणों से पूरे देश को शिया मत में बदलने का अभियान चलाया. इसका मुख्य उद्देश्य पड़ोसी ताकतवर सुन्नी ओटोमन साम्राज्य (तुर्किये) से अपनी एक अलग और विशिष्ट पहचान बनाना था.
धार्मिक धर्मांतरण और अरब देशों से धर्मगुरुओं का आगमन
देश को सुन्नी से शिया में बदलने की प्रक्रिया काफी योजनाबद्ध थी. सफाविद शासकों ने लेबनान, इराक और बहरीन जैसे अरब इलाकों से बड़े शिया धर्मशास्त्रियों और विद्वानों को ईरान बुलाया. बड़े पैमाने पर मदरसे और मजलिसें शुरू की गईं, ताकि आम जनता को शिया अकीदे और शिक्षाओं से जोड़ा जा सके. धीरे-धीरे नीतिगत बदलावों और प्रचार-प्रसार के जरिए ईरान की सुन्नी आबादी शिया मत को अपनाने लगी. इसी दौर में ईरान के महान शहरों जैसे इस्फहान और मशहद का धार्मिक महत्व बढ़ गया.
इस्लामिक धर्मगुरु, जिनका फारस से था कनेक्शन
ईरान और इस्लाम के बीच सबसे पहला और सबसे मजबूत संबंध 'सलमान अल-फारसी' (Salman the Persian) के रूप में सामने आता है. वह पहले ईरानी थे जिन्होंने पैगंबर मोहम्मद के हाथों इस्लाम कुबूल किया. मदीना की सुरक्षा के लिए 'खंदक' (खाई) खोदने का विचार उन्हीं का था. कहते हैं कि पैगंबर मोहम्मद ने उनके प्रति इतना सम्मान जताया था कि उन्हें अपने परिवार (अहल-ए-बैत) का हिस्सा घोषित किया था. आज भी ईरान में उन्हें एक महान आध्यात्मिक सेतु के रूप में पूजा जाता है, जिन्होंने फारसी अस्मिता को इस्लाम के साथ जोड़ा.
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राजकुमारी शहरबानु और अहल-ए-बैत का संगम
शिया मान्यताओं के अनुसार, ईरान का रिश्ता सीधे पैगंबर के खानदान से तब जुड़ा जब इमाम हुसैन (पैगंबर के नवासे) का विवाह फारस की राजकुमारी शहरबानु से हुआ. वह फारस के अंतिम सासानियन सम्राट यज्दगर्द तृतीय की बेटी थीं. इस मिलन से चौथे शिया इमाम, अली अल-सज्जाद का जन्म हुआ. इसी ऐतिहासिक संबंध के कारण ईरानी लोग शिया इमामों को न केवल धार्मिक गुरु बल्कि अपने 'राजवंश' का हिस्सा भी मानते हैं. यही वजह है कि ईरान में इमाम रजा जैसे गुरुओं की मजार पर दुनिया भर से करोड़ों लोग पहुंचते हैं.
सुन्नी जगत के महान दार्शनिक और तर्कशास्त्री
भले ही आज ईरान एक शिया राष्ट्र है, लेकिन सदियों तक यह सुन्नी विद्वता का गढ़ रहा. इमाम अल-गजाली, जिन्हें 'हुज्जत-उल-इस्लाम' कहा जाता है, फारस के ही रहने वाले थे. उन्होंने दर्शनशास्त्र और तर्कशास्त्र के जरिए इस्लाम की जो व्याख्या की, उसने पूरी दुनिया के सोचने का तरीका बदल दिया. उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'एहया उलूम-उद-दीन' आज भी दुनिया भर के मदरसों में पढ़ाई जाती है. फारस की इस धरती ने ही इस्लाम को वह बौद्धिक गहराई दी जिसने इसे विज्ञान और दर्शन के साथ खड़ा किया.
रूमी, हाफिज और रूहानी सफर
फारस का जिक्र मौलाना जलालुद्दीन रूमी और हाफिज शिराजी के बिना अधूरा है. रूमी का जन्म फारसी भाषी क्षेत्र में हुआ था और उनकी 'मसनवी' को 'फारसी भाषा का कुरान' तक कहा जाता है. उन्होंने प्रेम और संगीत के जरिए खुदा तक पहुंचने का रास्ता बताया. इसके अलावा, निमतुल्लाही जैसे सूफी सिलसिलों ने ईरान के सामाजिक और धार्मिक जीवन में बड़ी भूमिका निभाई. इन संतों ने दिखाया कि कैसे फारसी संस्कृति ने इस्लाम को एक नरम, कलात्मक और रूहानी रूप दिया है.
शाह इस्माइल प्रथम और सफाविद राजवंश की क्रांति
ईरान के आधुनिक धार्मिक स्वरूप का श्रेय शाह इस्माइल प्रथम को जाता है. 1501 में उन्होंने सफाविद राजवंश की स्थापना की और 'ट्वेलवर शिइज्म' को राजकीय धर्म बनाया. उन्होंने अरब क्षेत्रों से बड़े शिया विद्वानों और मुजतहिदों को ईरान बुलाया ताकि देश की धार्मिक जड़ों को मजबूत किया जा सके. शाह इस्माइल खुद एक कवि भी थे और उन्होंने शिया मत को फारसी राष्ट्रवाद के साथ जोड़ दिया. इसी दौर के बाद से ईरान सुन्नी बहुल से शिया बहुल देश में तब्दील होना शुरू हुआ.
अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी
20वीं सदी में ईरान और इस्लाम के रिश्ते को नया मोड़ देने वाले नेता अयातुल्ला खुमैनी थे. 1979 की इस्लामिक क्रांति के जरिए उन्होंने 'विलायत-ए-फकीह' का सिद्धांत पेश किया, जिसका मतलब है 'धर्मगुरु का शासन'. उन्होंने साबित किया कि एक धार्मिक नेता न केवल इबादतगाह तक सीमित रह सकता है, बल्कि एक आधुनिक राष्ट्र का नेतृत्व भी कर सकता है. उनके नेतृत्व ने शिया पहचान को पूरी दुनिया में एक राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित कर दिया, जिसका प्रभाव आज भी मध्य-पूर्व की राजनीति पर साफ देखा जा सकता है.
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Source: IOCL




























