कौन-से चुनाव आयुक्त बने गवर्नर-सांसद या मंत्री, किन पार्टियों ने बनाए?
Election Commission of India: भारत में चुनाव आयुक्तों का इतिहास काफी अलग रहा है. इसी बीच आइए जानते हैं कि कौन से चुनाव आयुक्तों को गवर्नर, सांसद या फिर मंत्री बनाया गया.

- एम.एस. गिल सेवानिवृत्ति के बाद कांग्रेस के केंद्रीय मंत्री बने।
- टी.एन. शेषन ने राष्ट्रपति और लोकसभा चुनाव लड़ा।
- वी.एस. रमादेवी और आर.के. त्रिवेदी राज्यपाल नियुक्त हुए।
Election Commission of India: भारत में कई पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने पद छोड़ने के बाद राजनीति में कदम रखा या फिर संवैधानिक पद को संभाला. इतिहास में कुछ ऐसे चुनाव आयुक्त रहे हैं जिन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद राजनीतिक दलों की सदस्यता ली, चुनाव लड़ा या फिर राज्यपाल, सांसद और केंद्रीय मंत्री जैसे पदों को संभाला.
ये उदाहरण चुनाव आयोग की आजादी और संवैधानिक पदों व राजनीतिक सरकारों के बीच संबंधों पर होने वाली चर्चाओं के लिए जरूरी हैं. हालांकि किसी पूर्व अधिकारी का बाद का करियर अपने आप में इस बात को साबित नहीं करता कि उस व्यक्ति के कार्यकाल के दौरान आयोग ने निष्पक्ष रूप से काम किया था या फिर नहीं. आइए जानते हैं कि कौन से थे वह मुख्य चुनाव आयुक्त और उनके बारे में पूरी जानकारी.
एम.एस. गिल
डॉक्टर एम. एस. गिल ने 1996 से 2001 तक भारत के 11वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में काम किया. रिटायरमेंट के बाद वें कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए और सक्रिय राजनीति में आ गए. कांग्रेस ने उन्हें पंजाब से राज्यसभा भेजा जहां उन्होंने 2004 और 2010 में शुरू हुए दो कार्यकाल पूरे किए. 2008 में मनमोहन सिंह सरकार के दौरान वे युवा मामलों और खेल के केंद्रीय मंत्री बने.
बाद में उन्होंने सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय का कार्यभार भी संभाला. रिपोर्ट्स के मुताबिक गिल एकमात्र ऐसे पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त हैं जो रिटायरमेंट के तुरंत बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हुए और बाद में केंद्रीय कैबिनेट मंत्री बने.

टी एन शेषन
भारत के दसवें मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन 1990 से 1996 तक यह पद संभाला. वे कड़े चुनावी सुधार लागू मजबूत करने के लिए जाने गए. रिटायरमेंट के बाद उन्होंने शिवसेना-भाजपा गठबंधन के समर्थन से 1997 का राष्ट्रपति चुनाव लड़ा लेकिन के आर नारायण से हार गए. बाद में वे कांग्रेस पार्टी के साथ जुड़ गए.
1999 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें गुजरात के गांधीनगर में भाजपा नेता एल के आडवाणी के खिलाफ मैदान में उतारा. शेषन वह चुनाव भी हार गए. इस वजह से उनके राजनीतिक सफर में राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए एक गठबंधन का समर्थन और बाद में कांग्रेस समर्थित उम्मीदवारी शामिल थी.
वी एस रमादेवी
वी एस रमादेवी भारत की नौंवी मुख्य चुनाव आयुक्त थी जिन्होंने नवंबर से दिसंबर 1990 तक सेवा की. रिपोर्ट के मुताबिक वह इस पद पर रहने वाली एकमात्र महिला है. चुनाव आयोग छोड़ने के बाद उन्होंने गवर्नर बनने से पहले राज्यसभा की महासचिव के रूप में काम किया. वे 1997 से 1990 तक हिमाचल प्रदेश की गवर्नर और 1999 से 2002 तक कर्नाटक की गवर्नर रहीं.
उनकी नियुक्तियां अलग-अलग केंद्र सरकारों के दौरान हुईं. इनमें कांग्रेस समर्थित एच डी देवेगौड़ा और आई के गुजराल के नेतृत्व वाली यूनाइटेड फ्रंट सरकार और बाद में अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार शामिल थी.

आर के त्रिवेदी
आर के त्रिवेदी ने 1982 से 1985 तक भारत के 7वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में काम किया. 1986 में अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद उन्हें गुजरात का गवर्नर नियुक्त किया गया.वह 1990 तक इस पद पर रहे. यह नियुक्ति प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के दौरान की गई थी. त्रिवेदी उन पूर्व चुनाव प्रमुखों में से एक है जिन्होंने आयोग छोड़ने के बाद राज्य के संवैधानिक पद को संभाल.
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ये करियर क्या दिखाते हैं?
ये उदाहरण मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में सेवा करने के बाद के अलग-अलग रास्तों को दिखाते हैं. गिल कांग्रेस के राजनेता और केंद्रीय मंत्री बने, शेषन ने अलग-अलग राजनीतिक समूहों से समर्थन मिलने के बाद राष्ट्रीय चुनाव लड़ा और रमादेवी और त्रिवेदी राज्य के गवर्नर बने. उनकी नियुक्तियां अलग-अलग केंद्र सरकारों के तहत हुईं. इनमें कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकारें, यूनाइटेड फ्रंट और एनडीए शामिल थे.
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