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Bangle History: महिलाओं ने हाथों में चूड़ियां पहनना कब से किया शुरू, जानें क्या है इसका इतिहास?

Bangle History: भारतीय महिलाएं अपने हाथों में चूड़ियां पहनती हैं. आइए जानते हैं कि यह परंपरा कब से शुरू हुई है और क्या है इसका इतिहास.

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  • चूड़ियों के सबसे पुराने साक्ष्य सिंधु घाटी सभ्यता से मिलते हैं।
  • प्राचीन भारत में धातु, शंख; मुगल काल में रत्न-जड़ित चूड़ियां।
  • कांच की चूड़ियां आम युग में लोकप्रिय; अनेक क्षेत्रीय पहचान बनीं।

Bangle History: दक्षिण एशिया में महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले गहनों में चूड़ियां सबसे जानी पहचानी चीजों में से एक हैं. सजावटी होने के अलावा इनका गहरा सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक महत्व है. प्राचीन सभ्यताओं से लेकर आज के समय में चूड़ियां परंपरा का एक स्थायी प्रतीक बन चुकी हैं. इसी बीच आइए जानते हैं कि महिलाओं का हाथों में चूड़ियां पहनना कब शुरू हुआ था और क्या है इसका इतिहास.

सिंधु घाटी सभ्यता से सबूत 

चूड़ियों का सबसे पुराना ज्ञात सबूत लगभग 5000 साल पहले की सिंधु घाटी सभ्यता से मिलता है. आज के पाकिस्तान में मौजूद प्राचीन शहर मोहनजो-दड़ो की खुदाई के दौरान पुरातत्वविदों को डांसिंग गर्ल नाम की एक मशहूर कांस्य मूर्ति मिली थी. लगभग 2600 ईसा पूर्व की यह मूर्ति एक महिला की है जिसने एक हाथ में कलाई से लेकर कंधे तक कई चूड़ियां पहनी हुई हैं. इस खोज को सबसे शुरुआती और जरूरी सबूत में से एक माना जाता है. 

प्राचीन भारत में चूड़ियां 

सिंधु घाटी काल के दौरान चूड़ियां टेराकोटा, पत्थर, शंख, तांबे और कांसे जैसी कई सामग्रियों से बनाई जाती थीं. जैसे-जैसे भारतीय सभ्यता का विकास हुआ कारीगरों ने और भी बेहतर डिजाइन बनाना शुरू किया. मौर्य और गुप्त काल के दौरान सोने और बारीक नक्काशीदार शंख से बनी चूड़ियां अमीर परिवार और शाही घरों में काफी ज्यादा मशहूर हो गईं. 

कांच की चूड़ियां 

भारत में कांच की चूड़ियां पहनने की परंपरा आम युग की शुरुआती सदियों में शुरू हुई.  रिपोर्ट्स के मुताबिक रोमन व्यापारी और मध्य पूर्वी सभ्यताओं के संपर्क से भारतीय उपमहाद्वीप में कांच बनाने की एडवांस तकनीक आई. वक्त के साथ कांच की चूड़ियां अपने चमकीले रंग, कम कीमत और आकर्षक लुक की वजह से काफी मशहूर हो गईं. 

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मुगल काल के दौरान विकास 

मुगल काल ने चूड़ी बनाने की कला को एक बेहतरीन कला के रूप में बदलने में बड़ी भूमिका निभाई. कारीगरों ने सोने, चांदी, हाथी दांत और कीमती रत्नों से बनी खूबसूरत चूड़ियां बनाना शुरू किया. इसी समय उत्तर प्रदेश का फिरोजाबाद कांच की चूड़ियां बनाने का एक बड़ा केंद्र बन गया था. यह एक ऐसी पहचान थी जो आज भी कायम है. 

पूरे भारत में क्षेत्रीय परंपरा 

भारत के अलग-अलग इलाकों में चूड़ियां पहनने की अपनी खास परंपरा है. राजस्थान में रंग बिरंगी लाख की चूड़ियां सांस्कृतिक पहचान बन गईं. बंगाल अपनी पारंपरिक शंख पोला चूड़ियों के लिए मशहूर हुआ. ये चूड़ियां शंख से बनती हैं. दक्षिण भारत में शादियों और धार्मिक समारोह के दौरान महिलाओं के बीच सोने के भारी कड़े और ब्रेसलेट काफी मशहूर हुए.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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