तमिलनाडु-कर्नाटक के बीच क्या है कावेरी जल विवाद, क्यों लड़ रहे दोनों राज्य?
Cauvery Water Dispute: कावेरी जल विवाद एक बार फिर से चर्चा में आ चुका है. इसी बीच आइए जानते हैं कि आखिर क्या है यह विवाद.

- कावेरी जल विवाद कर्नाटक-तमिलनाडु के बीच दशकों पुराना मुद्दा है।
- ऊपरी तटवर्ती कर्नाटक, कृषि के लिए तमिलनाडु नदी पर निर्भर है।
- 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने जल बँटवारे का फैसला सुनाया था।
- कम बारिश के कारण यह विवाद हर साल गहराता रहता है।
Cauvery Water Dispute: कावेरी दक्षिण भारत की सबसे जरूरी नदियों में से एक है. लेकिन इसका पानी एक सदी से भी ज्यादा समय तक कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कड़े विवाद का केंद्र रहा है. संघर्ष बार-बार ट्रिब्यूनल और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा है. खासकर कम बारिश वाले सालों के दौरान. मूल रूप से विवाद इस बात को लेकर है की नदी का पानी दोनों राज्यों के बीच कैसे बांटा जाना चाहिए और कर्नाटक को तमिलनाडु के लिए कितना पानी छोड़ना चाहिए. मामला एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. तमिलनाडु का यह आरोप है कि उसे अपना उचित हिस्सा समय पर नहीं मिला है.
कर्नाटक और तमिलनाडु क्यों लड़ रहे हैं?
कावेरी कर्नाटक के कोडागु जिले से निकलती है और बंगाल की खाड़ी तक पहुंचने से पहले कर्नाटक और तमिलनाडु से होकर बहती है. इस वजह से कर्नाटक ऊपरी तटवर्ती राज्य है जबकि तमिलनाडु निचला तटवर्ती राज्य है.
यह भौगोलिक स्थिति बुनियादी संघर्ष पैदा करती है. तमिलनाडु तक पहुंचने से पहले कर्नाटक जलाशयों और ज्यादातर जल प्रवाह को कंट्रोल करता है. दूसरी तरफ तमिलनाडु कृषि के लिए नदी पर काफी ज्यादा निर्भर है. खासकर कावेरी डेल्टा में.
रिपोर्ट्स के मुताबिक तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा में लगभग 14.91 लाख एकड़ कृषि भूमि कावेरी जल पर ही निर्भर है. कुरुवई फसल सहित धान की खेती के लिए खास समय पर पानी की जरूरत होती है. इस वजह से तमिलनाडु का तर्क है कि कर्नाटक को कानूनी रूप से निर्धारित साझा व्यवस्था के मुताबिक पानी छोड़ना चाहिए.
कर्नाटक का तर्क अलग है. कर्नाटक के मुताबिक कम बारिश वाले सालों के दौरान इसके जलाशयों को सभी मांगों को पूरा करने के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिलता है. राज्य को अपने किसानों के साथ-साथ बेंगलुरु और दूसरे शहरों के लाखों लोगों को पानी देना पड़ता है. इस वजह से कर्नाटक का तर्क है कि पानी छोड़ने को हर साल एक जैसा व्यवहार करने के बजाय वास्तविक बारिश और जलाशय के स्तर को ध्यान में रखना चाहिए.

कावेरी विवाद कितना पुराना है?
इस विवाद की जड़ें ब्रिटिश काल से जुड़ी हुई हैं. 1892 और 1924 में तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी और मैसूर रियासत के बीच दो जरूरी समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए थे. स्वतंत्रता और राज्य के पुनर्गठन के बाद कर्नाटक ने इन समझौतों की निरंतर प्रासंगिकता और निष्पक्षता पर सवाल उठाया है. उसका यह तर्क है कि वह पूर्व मद्रास प्रेसीडेंसी के हितों के पक्ष में थे.
जैसे-जैसे असहमति बढ़ती गई केंद्र सरकार ने 1990 में कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया. ट्रिब्यूनल ने 2007 में अपना अंतिम फैसला सुनाया. इसने तमिलनाडु को लगभग 419 टीएमसी और कर्नाटक को 270 टीएमसी पानी आवंटित किया. बाकी पानी केरल और पुडुचेरी को आवंटित किया गया. हालांकि दोनों राज्यों ने व्यवस्था के पहलुओं को चुनौती दी. अंत में विवाद को सर्वोच्च न्यायालय में ले जाया गया.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
2018 के अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कावेरी को राष्ट्रीय संपत्ति माना और ट्रिब्यूनल के आवंटन को संशोधित किया. न्यायालय ने बेंगलुरु की पेयजल जरूरत को ध्यान में रखते हुए कर्नाटक का हिस्सा 14.75 टीएमसी बढ़ा दिया. इस वक्त कर्नाटक को बिलिगुंडलू अंतर राज्य सीमा बिंदु पर तमिलनाडु को सालाना 177.25 टीएमसी जारी करने की जरूरत थी.
क्या है मेकेदातु विवाद?
कावेरी विवाद वार्षिक जल छोड़ने तक ही सीमित नहीं है. कर्नाटक का प्रस्तावित मेकेदातु संतुलन जलाशय असहमति का एक और बड़ा मुद्दा बन गया है. कर्नाटक का कहना है कि यह परियोजना बेंगलुरु के लिए पीने के पानी को सुरक्षित करने और बिजली पैदा करने में मदद करेगी. तमिलनाडु इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध करता है. ऐसा इसलिए क्योंकि उसे डर है कि कर्नाटक में एक जलाशय राज्य को कावेरी प्रवाह पर ज्यादा कंट्रोल दे सकता है और तमिलनाडु तक पहुंचने वाले पानी की मात्रा को प्रभावित कर सकता है.
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विवाद बार-बार क्यों लौटता है?
सबसे बड़ी समस्या यह है कि कावेरी में हर साल समान मात्रा में पानी नहीं आता है. अच्छे मानसून के दौरान दोनों राज्यों को अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए पर्याप्त पानी मिल सकता है. लेकिन जब बारिश कम होती है तो जलाशयों का स्तर गिर जाता है और विवाद और ज्यादा हो जाता है.
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