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न बुढ़ापा और न मौत... अगर इंसान अमर हो जाएं तो क्या होगा, जानें हमारा शरीर कभी क्यों नहीं हो सकता अमर?

अमरता सुनने में तो खूबसूरत है, लेकिन बायोलॉजी इसे खतरे की घंटी मानती है. अगर मौत रुक जाए, तो इंसान ही नहीं पूरी प्रकृति संकट में पड़ सकती है. आइए जानें कि इंसान अमर क्यों नहीं हो सकता है.

अगर इंसान कभी बूढ़ा ही न हो, कभी मरे ही नहीं तो क्या होगा? पहली नजर में यह किसी जादुई वरदान जैसा लगता है, लेकिन विज्ञान कहता है कि अमरता का सपना असल में एक बड़ा जैविक जाल हो सकता है. हमारा शरीर, हमारी कोशिकाएं, हमारा दिमाग और पूरी पृथ्वी का संतुलन- सब कुछ सीमित समय के हिसाब से बना है. आइए जानें कि अगर इंसान अमर हो जाए तो क्या होगा, क्या हमारा शरीर अमर हो सकता है.

शरीर की बनावट ही सीमित है

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि हमारा शरीर अमर होने के लिए बना ही नहीं है. शरीर की हर कोशिका एक तय संख्या तक ही विभाजित हो सकती है. इसे विज्ञान में हेफ्लिक लिमिट कहा जाता है. सामान्य मानव कोशिकाएं लगभग 40 से 60 बार ही विभाजित हो पाती हैं. हर बार जब सेल डिवाइड होती है, तो डीएनए के सिरों पर मौजूद टेलोमीयर थोड़ा-थोड़ा छोटा होता जाता है. जब यह बहुत छोटा हो जाता है, तो कोशिका बूढ़ी हो जाती है और विभाजन रोक देती है. यही उम्र बढ़ने की एक बड़ी वजह है.

अगर इस लिमिट को हटा दिया जाए और कोशिकाएं अनंत बार विभाजित होने लगें, तो वे कंट्रोल से बाहर हो सकती हैं. यही स्थिति कैंसर में देखने को मिलती है, जहां सेल्स बिना रुके बढ़ती रहती हैं. यानी अमरता का रास्ता कैंसर के बड़े खतरे से होकर गुजरता है.

डीएनए डैमेज और मरम्मत की कितनी सीमा है?

हमारा शरीर रोज लाखों बार डीएनए डैमेज झेलता है. धूप, प्रदूषण, खान-पान और शरीर के अंदर की केमिकल प्रक्रियाएं डीएनए को प्रभावित करती हैं. शरीर में मरम्मत का सिस्टम मौजूद है, लेकिन वह भी परफेक्ट नहीं है. जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, यह मरम्मत सिस्टम कमजोर पड़ता है. अगर इंसान अनंत समय तक जिए, तो डीएनए में छोटी-छोटी खामियां होती जाएंगी. लंबे समय में यह गंभीर बीमारियों और शारीरिक कमजोरी का कारण बन सकती हैं.

दिमाग की मेमोरी की हद कितनी?

अक्सर लोग सोचते हैं कि अगर शरीर जवान रहे तो समस्या खत्म हो जाएगी, लेकिन दिमाग का क्या? हमारा ब्रेन प्लास्टिक यानी लचीला है, लेकिन इसकी भी क्षमता सीमित है. हर नई याद न्यूरॉन्स के बीच नए कनेक्शन बनाती है. एक सामान्य इंसान 80-100 साल की यादों को संभाल सकता है, लेकिन अगर जीवन 300 या 500 साल तक बढ़ जाए, तो मेमोरी का बोझ बढ़ता जाएगा.

बहुत ज्यादा जानकारी से न्यूरल नेटवर्क पर दबाव पड़ सकता है. यादें गड़बड़ा सकती हैं, पहचान कमजोर हो सकती है. वैज्ञानिक मानते हैं कि अनंत जीवन की स्थिति में न्यूरोनल ओवरलोड की समस्या आ सकती है, जिससे व्यक्ति अपनी पहचान तक खो सकता है.

जनसंख्या का संकट

अगर कोई मरता ही नहीं, तो पृथ्वी पर जनसंख्या तेजी से बढ़ेगी. सीमित संसाधनों के बीच भोजन, पानी और रहने की जगह का संकट गहराएगा. ऐसी स्थिति में जन्म दर रोकनी पड़ेगी. लेकिन अगर प्रजनन रुक गया, तो नई पीढ़ी नहीं आएगी. इससे समाज ठहराव का शिकार हो सकता है. युवा ऊर्जा और नए विचारों की कमी पड़ सकती है.

अगर मौत न हो तो?

प्रकृति का नियम है कि पुरानी पीढ़ी जाती है और नई आती है. इसी प्रक्रिया को इवोल्यूशन कहते हैं. नई पीढ़ी में जीन का मिश्रण होता है, जिससे बेहतर गुण आगे बढ़ते हैं. अगर मौत खत्म हो जाए, तो कमजोर या दोषपूर्ण जीन भी बने रहेंगे. इससे पूरी मानव प्रजाति धीरे-धीरे जैविक रूप से कमजोर हो सकती है. यानी अमरता विकास की प्रक्रिया को रोक सकती है.

हार्मोन और मानसिक प्रभाव

हमारे शरीर के हार्मोन समय की भावना से जुड़े हैं. उम्र के साथ लक्ष्य बदलते हैं, सोच बदलती है. सीमित जीवन हमें फैसले लेने के लिए प्रेरित करता है. अगर जीवन का अंत ही न हो, तो समय का दबाव खत्म हो जाएगा. अभी की अहमियत कम हो सकती है. प्रेरणा घट सकती है. मानसिक ठहराव बढ़ सकता है. कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि सीमित जीवन ही जीवन को अर्थ देता है. अगर अंत न हो, तो शुरुआत का महत्व भी कम हो सकता है.

क्या मौत जरूरी है?

मौत को अक्सर डर के रूप में देखा जाता है, लेकिन बायोलॉजी में यह जीवन चक्र का हिस्सा है. यह शरीर की गलतियों को आगे बढ़ने से रोकती है. नई पीढ़ी को जगह देती है. संतुलन बनाए रखती है. इसीलिए अब तक के वैज्ञानिक शोध यही बताते हैं कि इंसान का शरीर अमर बनने के लिए डिजाइन नहीं हुआ है. उम्र बढ़ना और मृत्यु प्रकृति की योजना का हिस्सा हैं.

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About the author निधि पाल

निधि पाल एबीपी लाइव में कंटेंट राइटर हैं. ये यहां पर जीके सेक्शन की जिम्मेदारियां संभाल रही हैं. पिछले 7 साल से पत्रकारिता की दुनिया में कार्यरत निधि पाल ने इससे पहले अमर उजाला डिजिटल, न्यूज 24, ईटीवी भारत हैदराबाद जैसे बड़े संस्थानों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है.

पढ़ाई-लिखाई की बात करें तो उन्होंने आईआईएस ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन लखनऊ से जर्नलिज्म में मास्टर्स की डिग्री हासिल की है.

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