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टर्की-मिस्र हो या सऊदी अरब और ईरान, मुस्लिम देश होने के बावजूद एक-दूसरे से अलग क्यों?

मिडिल ईस्ट में इस समय काफी तनाव चल रहा है. इसी बीच आइए जानते हैं कि अगर तुर्की, मिस्त्र, सऊदी अरब और ईरान सभी मुस्लिम देश हैं तब भी ये एक दूसरे से अलग क्यों है?

मिडिल ईस्ट में काफी ज्यादा अस्थिरता देखी जा रही है. ईरान के खिलाफ यूनाइटेड स्टेट्स और इजरायली मिलट्री एक्शन के बाद तेहरान ने इलाके के कुछ हिस्सों में मिसाइल हमले करके जवाब दिया है. इससे कई अरब देशों के बीच तनाव और बढ़ चुका है. इस अस्थिर माहौल में एक बड़ा सवाल उठ रहा है. अगर तुर्की, मिस्त्र, सऊदी अरब और ईरान सभी मुस्लिम देश हैं तो पॉलिटिक्स और आईडियोलॉजी में ये सभी एक दूसरे से इतने अलग क्यों है? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

क्यों है ये सभी देश अलग?

इसका जवाब सिर्फ धर्म में नहीं है.  इसका जवाब एथनिसिटी, इतिहास, सेक्टेरियन आईडेंटिटी, गवर्नेंस मॉडल और जियोपॉलिटिकल कॉम्पिटिशन के मिक्स में है. इस्लाम एक साझा धर्म हो सकता है लेकिन नेशनल आइडेंटिटी और पॉलिटिकल विजन में काफी ज्यादा अंतर होता है.

क्या है इनका इतिहास?

सबसे बुनियादी अंतर एथेनिक और लिंग्विस्टिक आइडेंटिटी है. सऊदी अरब और मिस्र अरब देश हैं. यहां अरबी भाषा और अरब  कल्चर नेशनल आइडेंटिटी की रीढ़ हैं.  उनकी ऐतिहासिक कहानियां अरब सभ्यता की गहराई से जुड़ी हुई हैं. हालांकि ईरान और तुर्की नॉन अरब देश हैं. ईरानी लोग ज्यादातर खुद को  पर्शियन मानते हैं और पर्शियन बोलते हैं. वहीं तुर्क लोग खुद को तुर्की एथिनिसिटी से जोड़ते हैं और तुर्की बोलते हैं.  हिस्टॉरिकली पर्शियन एम्पायर और ऑटोमन एम्पायर ताकतवर सिविलाइजेशन थे जो अरब असर को टक्कर देते थे.

इस्लाम के अंदर भी डिवाइडिंग लाइन

धर्म खुद एक डिवाइडिंग लाइन है. इस्लाम और नॉन इस्लाम के बीच नहीं बल्कि इस्लाम के अंदर ही. ईरान दुनिया का सबसे बड़ा शिया मेजोरिटी वाला देश है और खुद को शिया कम्युनिटीज का ग्लोबल प्रोटेक्टर मानता है. वहीं सऊदी अरब खुद को सुन्नी इस्लाम का लीडर और इस्लाम के दो सबसे पवित्र शहर मक्का और मदीना का कस्टोडियन मानता है.

यह डिवीजन सिर्फ सोच में नहीं है. यह पूरे इलाके में अलायंस, फॉरेन पॉलिसी और प्रॉक्सी कॉन्फ्लिक्ट को बनाता है. रियाद और तेहरान के बीच दुश्मनी ने यमन, सीरिया, इराक और लेबनान जैसे देशों में तनाव को बढ़ाया है. तुर्की और मिस्त्र ज्यादातर सुन्नी बहुल देश हैं.

सरकार के अलग-अलग सिस्टम

सऊदी अरब पूरी तरह से राजशाही है. यहां राजनीतिक अधिकार शाही परिवार के पास होता है. ईरान 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद विलायत-ए-फकीह के सिद्धांत के तहत एक धर्म शासित गणराज्य बन गया. यहां आखिरी आधिकारिक सुप्रीम लीडर के पास होता है जो कि एक सीनियर मौलवी होता है. तुर्की ने भी ऐतिहासिक रूप से एक सेक्युलर गणराज्य के रूप में काम किया है. हालांकि हाल के दशकों में इस्लामी राजनीतिक प्रभाव बढ़ा है. वहीं मिस्त्र एक मजबूत सेंट्रलाइज्ड लीडरशिप मॉडल और एक शक्तिशाली मिलिट्री एस्टेब्लिशमेंट के साथ एक गणराज्य के रूप में काम करता है.

विदेश नीति में अंतर

ग्लोबल ताकतों के साथ उनके रिश्ते उन्हें और अलग कर देते हैं. तुर्की NATO का सदस्य है और यूरोप और यूनाइटेड स्टेट्स के साथ स्ट्रैटेजिक रिश्ते बनाए रखता है. सऊदी अरब और मिस्त्र की वाशिंगटन के साथ लंबे समय से सिक्योरिटी पार्टनरशिप है. लेकिन ईरान खुद को यूनाइटेड स्टेट्स के असर के खिलाफ खड़ा करता है. इसी के साथ इजरायल के प्रति भी दुश्मनी बनाए रखता है. वहीं तुर्की इजरायल के साथ डिप्लोमेटिक रिश्ते बनाए रखता है. ईरान इजरायल की लेजिटिमेसी को पूरी तरह से खारिज करता है.

यह भी पढ़ें: परमाणु युद्ध हुआ तब भी बचे रहेंगे ये देश, जानें कितनी मजबूत है इनकी न्यूक्लियर शील्ड?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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