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India Developed Country Criteria: भारतीय कितने अमीर हो जाएं, तब डिवेलप कहलाएगा देश? समझ लें सारे समीकरण

India Developed Country Criteria: भारत एक विकासशील देश है, लेकिन इसको विकसित बनाने के लिए अगले 25 सालों तक लगातार 7.5% की वास्तविक विकास दर बनाए रखनी होगी.

India Developed Country Criteria: दुनिया का हर देश खुद को अमीर और विकसित देखना चाहता है, लेकिन एक आम इंसान के मन में हमेशा एक सवाल उठा करता है कि आखिर वो तरक्की का कौन सा पैमाना है, जो कि किसी देश को विकसित बना देता है? इसको लेकर अर्थशास्त्रियों और दार्शनिकों के बीच अमीरी की परिभाषा को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है. वैश्विक मंच पर किसी देश की अमीरी को मापने का सबसे सीधा और सटीक जरिया वहां के नागरिकों की औसत कमाई यानी प्रति व्यक्ति आय को माना जाता है. भारत इस वक्त तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन विकसित देशों की कतार में खड़े होने के लिए भारतीयों को अभी कितनी दूरी तय करनी होगी, चलिए इसका गणित समझें.

विकसित कहलाने का वैश्विक पैमाना

विश्व बैंक किसी भी देश को अमीर या फिर विकसित घोषित करने के लिए एक खास नियम का पालन करता है. इसके तय मानकों के अनुसार जिस देश की सालाना प्रति व्यक्ति नॉमिनल जीडीपी कम से कम 14,000 डॉलर (करीब 11.6 लाख रुपये) पहुंच जाती है, उसे उच्च आय वाले देशों की श्रेणी में शामिल कर लिया जाता है. इस नियम की शुरुआत साल 1987 में की गई थी. उस वक्त यह सीमा सिर्फ 6000 डॉलर थी, लेकिन विकसित देशों की महंगाई दर के हिसाब से हर साल इसमें करीब 2 फीसदी की बढोतरी की जाती है. वर्तमान में दुनिया के करीब 85 देश, जो कि कुल देशों का करीब 40 फीसदी हैं, इस अमीर क्लब का हिस्सा बन चुके हैं.

प्रति व्यक्ति आय का गणित और जमीनी हकीकत

भले ही प्रति व्यक्ति आय को तरक्की का मुख्य पैमाना माना जाता है, लेकिन यह पूरी तरह से सटीक तस्वीर नहीं दिखाता है. मान लीजिए किसी देश में कुछ मुट्ठीभर लोग बेहद अमीर हैं और बाकी की आबादी गरीब है, तब भी वहां की औसत प्रति व्यक्ति आय कागजों पर ज्यादा नजर नहीं आएगी. इसलिए अर्थशास्त्री औसत के बजाय मिडिल वैल्यू को देखना ज्यादा पसंद करते हैं, जिससे समाज के आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति की असली आर्थिक स्थिति का पता चलता है. हालांकि जैसे-जैसे कोई अर्थव्यवस्था मजबूत होती जाती है, वैसे-वैसे अमीर और गरीब का यह फासला अपने आप कम हो जाता है.

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क्रय शक्ति और महंगाई का असर

किसी देश में रहने का खर्चा कैसा है, यह भी वहां के नागरिकों की खुशहाली तय करती है. इसी को समझने के लिए पर्चेजिंग पावर पैरिटी यानी पीपीपी का इस्तेमाल किया जाता है. उदाहरण के लिए देखें तो अमेरिका में सिर्फ बाल कटवाने या फिर टैक्सी में घूमने का खर्चा भारत के मुकाबले बहुत ज्यादा है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दोनों जगहों पर सर्विस एक जैसी मिल रही है. अगर हम सीधे डॉलर के मुकाबले देखें तो अमेरिकी नागरिक की औसत आय भारतीयो से 29 गुना ज्यादा है. लेकिन अगर महंगाई और रहन-सहन के खर्च को मिला दें, तो यह अंतर घटकर सिर्फ 7 गुना रह जाता है. भारत इस मामले में लगातार अपनी स्थिति में सुधार कर रहा है.

चीन और वियतनाम की जीडीपी रफ्तार

साल 2005 में नॉमिनल जीडीपी के मामले में भारत दुनिया में 162वें स्थआन पर था, जो वर्तमान में सुधरकर 140वें नंबर पर आ चुका है और साल 2030 तक इसके 134वें स्थान पर पहुंचने की उम्मीद जताई जा रही है. भारत में पिछले दो दशकों में लगातार बेहतरीन विकास किया है, लेकिन हमारे पड़ोसी देशों ने हमसे भी तेज छलांग लगाई है. चीन साल 2007 में उसी आर्थिक स्तर पर था जहां आज भारत खड़ा है, लेकिन आज वह हमसे पांच गुना आगे निकलकर अमीर देशों की दहलीज पर खड़ा है. वहीं वियतनाम की प्रति व्यक्ति आय भी फिलहाल भारत से करीब 60 फीसदी ज्यादा हो चुकी है, जो हमारी रफ्तार को और तेज करने का इशारा करती है.

साल 2047 का लक्ष्य और आर्थिक रफ्तार

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत कब तक अमीर देशों की सूची में शामिल हो पाएगा? भारत सरकार ने साल 2047 तक देश को पूरी तरह से विकसित बनाने का लक्ष्य रखा है. इस जादुई आंकड़े को छूने के लिए भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी को डॉलर के भाव में हर साल कम से कम 9 फीसदी की रफ्तार से बढ़ाना होगा. अगर देश की महंगाई दर 4 फीसदी रहे और रुपया हर साल डॉलर के मुकाबले 2 फीसदी कमजोर हो, तो भी भारत को अगले 25 सालों तक लगातार 7.5 फीसदी की वास्तविक आर्थिक विकास दर बनाए रखनी होगी, जो कि एक बड़ी चुनौती है.

महिलाओं की हिस्सेदारी और युवाओं की ताकत

इस रफ्तार को हासिल करने के लिए देश को अपनी कार्यबल नीति में बदलाव करने की जरूरत है. भारत के पास इस वक्त दुनिया की सबसे युवा आबादी है, जिसे डेमोग्राफिक डिविडेंड कहा जाता है. लेकिन इस ताकत का फायदा तब तक नहीं मिलेगा जब तक हम कामकाजी महिलाओं की भागीदारी को नहीं बढ़ाएंगे. भारत में फिलहाल कामकाजी महिलाओं की संख्या बेहद कम है. इसे सुधारने के लिए कानून-व्यवस्था को बेहतर करना, पार्ट टाइम काम के नियमों को आसान बनाना और उन सेक्टर्स में ज्यादा नौकरियों की बढ़ोतरी करना जरूरी है, जहां दुनियाभर की महिलाएं सबसे ज्यादा काम करती हैं, जैसे टेक्सटाइल और टूरिज्म.

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घरेलू बचत निवेश और छोटे उद्योगों को सहारा

आर्थिक तरक्की को रफ्तार देने के लिए देश में भारी पूंजी निर्माण की जरूरत है. अच्छी बात यह है कि सरकार के वित्तीय अनुशासन के कारण देश में ब्याज की दरें कम हुई हैं और आम भारतीय परिवारों की बचत का पैसा म्यूचुअल फंड, बीमा और पेंशन के जरिए शेयर बाजार में आ रहा है, जो कुल जीडीपी का लगभग 2 फीसदी है. अब इस भारी-भरकम पैसे को देश के छोटे और मझोले उद्योगों तक आसानी से पहुंचाने के लिए ओपन क्रेडिट इनेबलमेंट नेटवर्क जैसे आधुनिक डिजिटल सिस्टम को और मजबूत करने की जरूरत है, ताकि छोटे कारोबारियों को बिना किसी परेशानी के लोन मिल सके.

बुनियादी ढांचा और जमीनी सुधार

किसी भी विकसित देश की असली पहचान वहां का इंफ्रास्ट्रक्चर और रियल एस्टेट सेक्टर होता है. भारत को अपने शहरों का कायाकल्प करने के लिए नियमों को लचीला बनाना होगा और शहरी बुनियादी ढांचे पर भारी निवेश करना होगा. जब सड़कों, पुलों और बहुमंजिला इमारतों का निर्माण होता है, तो इससे न सिर्फ सीमेंट और स्टील जैसे उद्योगों में मांग बढ़ती है, बल्कि लाखों मजदूरों और इंजीनियरों को सीधे रोजगार भी मिलता है. यही वजह है कि विकसित देशों की कुल संपत्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा उसके शानदार इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में दिखाई देता है.

स्वदेशी तकनीक और खुद पर भरोसा

दुनिया के इतिहास को देखें तो जापान, कोरिया और चीन जैसे देशों को विकसित बनने में वैश्विक परिस्थितियों से थोड़ी मदद मिली थी. लेकिन भारत को अपनी राह खुद बनानी होगी, क्योंकि आज के दौर में तकनीक को लेकर कड़ा मुकाबला देखने को मिलता है. भारत को मिडिल इनकम ट्रैप से बचने के लिए विज्ञान और तकनीक में भारी इन्वेस्टमेंट करना होगा, ताकि हम दूसरों पर निर्भर रहने की बजाय अपनी खुद की क्रिटिकल टेक्नोलॉजी विकसित कर सकें. इसके लिए देश में इनोवेशन और रिस्क कैपिटल यानि स्टार्टअप्स में पैसा लगाने की संस्कृति को बढ़ावा देना बेहद जरूरी है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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