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क्या है Right to Recall और किन देशों में लागू, अभी किसने की डिमांड और कब-कब उठ चुका यह मुद्दा?

संसद में राइट टू रिकॉल पर एकबार फिर से बहस छिड़ गई है. आइए जान लेते हैं कि आखिर यह क्या है और संसद में इसका मुद्दा किसने उठाया है व कब-कब इस पर बहस छिड़ चुकी है.

हम हर पांच साल में वोट देकर अपने सांसद और विधायक चुनते हैं, लेकिन अगर वही नेता चुनाव जीतने के बाद जनता से दूर हो जाए तो क्या किया जा सकता है? क्या वोटर के पास उसे बीच कार्यकाल में हटाने का कोई हक है? इसी सवाल ने एक बार फिर देश की राजनीति में हलचल मचा दी है. राज्यसभा में ‘राइट टू रिकॉल’ की मांग उठी है. यह अधिकार क्या है, कहां लागू है और भारत में इसे लेकर बहस क्यों तेज हो रही है, आइए समझते हैं. 

क्या है राइट टू रिकॉल, किसने उठाया मुद्दा और क्यों हो रही चर्चा?

लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधि को चुनती है, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में सांसद या विधायक को हटाने का अधिकार सीधे जनता के पास नहीं होता है. ‘राइट टू रिकॉल’ यानी जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें मतदाता अपने चुने हुए प्रतिनिधि को कार्यकाल पूरा होने से पहले ही पद से हटा सकते हैं.

हाल ही में आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने संसद में यह मुद्दा उठाया था. उन्होंने कहा कि अगर कोई सांसद या विधायक अपने काम से जनता को संतुष्ट नहीं कर पा रहा है, तो मतदाताओं को उसे हटाने का अधिकार मिलना चाहिए. उनके इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में नई बहस शुरू हो गई है. 

कैसे काम करता है राइट टू रिकॉल?

राइट टू रिकॉल एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है. इसमें किसी क्षेत्र के मतदाता एक तय प्रक्रिया के तहत हस्ताक्षर अभियान शुरू करते हैं. अगर तय संख्या में लोग लिखित रूप से मांग करते हैं, तो उस जनप्रतिनिधि के खिलाफ दोबारा मतदान कराया जा सकता है. आप एमपी राघव चड्ढा ने सुझाव दिया कि इस अधिकार के दुरुपयोग को रोकने के लिए कुछ सुरक्षा उपाय जरूरी हैं. जैसे- पहले 35 से 40 प्रतिशत मतदाताओं के हस्ताक्षर से याचिका दायर हो. प्रतिनिधि को कम से कम 18 महीने काम करने का मौका मिले. इसके बाद अगर 50 प्रतिशत से ज्यादा मतदाता हटाने के पक्ष में वोट दें, तभी उसे पद से हटाया जाए.

किन देशों में लागू है यह व्यवस्था?

राइट टू रिकॉल पूरी दुनिया में बहुत आम नहीं है, लेकिन कुछ देशों में यह लागू है. अमेरिका के कई राज्यों में स्थानीय स्तर पर यह प्रावधान है. स्विट्जरलैंड और कुछ लैटिन अमेरिकी देशों में भी इस तरह की व्यवस्था मौजूद है. भारत में राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर यह लागू नहीं है, लेकिन राजस्थान और कर्नाटक जैसे राज्यों में पंचायत स्तर पर राइट टू रिकॉल का प्रावधान है. यानी ग्राम प्रधान या स्थानीय निकाय के प्रतिनिधि को मतदाता वापस बुला सकते हैं. 

भारत में पहले कब उठा मुद्दा?

राइट टू रिकॉल कोई नया विचार नहीं है. 1944 में स्वतंत्रता सेनानी और विचारक एम.एन. रॉय ने सबसे पहले इस अवधारणा की बात की थी. 1974 में जयप्रकाश नारायण ने ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन के दौरान इसे लागू करने की वकालत की थी. 2006 से 2019 के बीच राहुल चिमनभाई मेहता ने ‘राइट टू रिकॉल पार्टी’ के जरिए इस मुद्दे को लगातार उठाया. लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने भी अतीत में इसका समर्थन किया था. 
यानी यह मांग समय-समय पर उठती रही है, लेकिन अब तक इसे व्यापक स्तर पर लागू नहीं किया गया है.

क्या भारत में संभव है बदलाव?

भारत का संविधान सांसदों और विधायकों को हटाने के लिए महाभियोग जैसी प्रक्रिया नहीं देता है. हालांकि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और जजों के लिए महाभियोग का प्रावधान है. इसी आधार पर राइट टू रिकॉल की मांग उठती रही है कि जब ऊंचे संवैधानिक पदों को हटाने का नियम है, तो जनता को अपने प्रतिनिधि के लिए ऐसा अधिकार क्यों नहीं है?

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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