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क्या है AI Exoskeletons, पहाड़ पर रहने वाले आम लोगों के लिए यह कितना होगा मददगार?

पहाड़ों पर चढ़ाई आमतौर पर सबसे ज्यादा थकाने वाली होती है. एक्सोस्केलेटन का दावा है कि यह चलने में लगने वाली मेहनत को लगभग 30 प्रतिशत तक कम कर सकता है.

पहाड़ों पर रहने वाले लोगों की जिंदगी आसान नहीं होती है रोजाना के काम से लेकर आने-जाने तक हर कदम पर उतार-चढ़ाव करने पड़ते हैं. वहीं उम्र बढ़ने के साथ घुटनों और जोड़ों में दर्द, चोट या कमजोरी की समस्या बढ़ जाती है. ऐसे में पहाड़ों पर रहने वाले लोगों को कहीं तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है. हालांकि अब इसे लेकर एक नई तकनीक एआई आधारित एक्सोस्केलेटन चर्चा में है. यह एक पहनने वाला रोबोटिक डिवाइस है जो चलने और चढ़ाई करने में पैरों को एक्स्ट्रा ताकत देता है. इसके साथ ही सवाल यह भी उठा है कि क्या यह तकनीक पहाड़ी इलाकों में रहने वाले आम लोगों के लिए सच में उपयोगी साबित हो सकती है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि एआई एक्सोस्केलेटन क्या है और क्या पहाड़ पर रहने वाले आम लोगों के लिए यह मदद कर साबित हो सकता है.

क्या है एआई एक्सोस्केलेटन?

एक्सोस्केलेटन हल्का कमर और जांघों पर बांधा जाने वाला उपकरण होता है.  इसमें सेंसर लगे होते हैं जो व्यक्ति के चलने के तरीके को समझते हैं. जैसे ही व्यक्ति कदम बढ़ाने की कोशिश करता है डिवाइस का मोटर हल्का खिंचाव देकर पैर उठाने में मदद करता है. कुछ मॉडल एआई एल्गोरिदम के जरिए उपयोगकर्ता की चाल को पहचानते हैं और उसी हिसाब से हेल्प करते हैं. मोबाइल ऐप के जरिए इसमें अलग-अलग मोड सेलेक्ट कर सकते हैं. जैसे समतल रास्ते के अनुसार, चढ़ाई के दौरान, दौड़ने के दौरान या सीढ़ियां चढ़ने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.

पहाड़ पर चढ़ाई में कितना कारगर है यह डिवाइस

पहाड़ों पर चढ़ाई आमतौर पर सबसे ज्यादा थकाने वाली होती है. एक्सोस्केलेटन का दावा है कि यह चलने में लगने वाली मेहनत को लगभग 30 प्रतिशत तक कम कर सकता है. कहीं यूजर्स ने भी पाया की चढ़ाई के दौरान जांघों और पिंडलियों पर पड़ने वाला दबाव कम महसूस होता है. लंबी दूरी तक बिना ज्यादा थके चल पाना संभव हो जाता है. हालांकि तेज ढलान या पथरीले रास्तों पर उतरते समय यह उतना मददगार नहीं होता है. वहीं संकरी पगडंडियों या फिसलन वाले हिस्सों में डिवाइस कभी भी दिक्कत कर सकता है.

किसके लिए यह डिवाइस सबसे ज्यादा फायदेमंद?

यह डिवाइस घुटनों या जोड़ों की समस्या से जूझ रहे लोगों, उम्र दराज व्यक्ति जिनकी ताकत कम हो रही है, चोट के बाद दोबारा चलने की कोशिश कर रहे लोगों और लंबी दूरी की ट्रैकिंग करने वाले लोगों के लिए फायदेमंद माना जा रहा है. कुछ कंपनियां ऐसे मॉडल भी बना रही है जो रिहैबिलिटेशन के लिए डिजाइन किए गए हो. उदाहरण के तौर पर भारत की एक स्टार्टअप कंपनी ने एआई आधारित स्कूल एक्सोस्केलेटन तैयार किया है जो लकवा स्ट्रोक या स्पाइनल इंजरी से जूझ रहे मरीजों को चलने में मदद करता है. यह डिवाइस मरीज की चाल को रिकॉर्ड कर डॉक्टर को रिपोर्ट भेज सकता है, जिससे इलाज सही तरीके से हो सके.

इस डिवाइस की कीमत और बैटरी

ज्यादातर हाइकिंग एक्सोस्केलेटन 1.5 से 2 किलो के बीच हो सकते हैं. वहीं एक बैटरी पर लगभग 20 से 30 किलोमीटर तक चला जा सकता है, जबकि ज्यादा कठिन चढ़ाई में बैटरी ज्यादा खत्म हो सकती है. वहीं इसकी कीमत 500 से लेकर 2000 डॉलर तक बताई जा रही है जो फिलहाल आम लोगों के लिए महंगी मानी जा रही है.

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कविता गाडरी बीते कुछ साल से डिजिटल मीडिया और पत्रकारिता की दुनिया से जुड़ी हुई है. राजस्थान के जयपुर से ताल्लुक रखने वाली कविता ने अपनी पढ़ाई माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय भोपाल से न्यू मीडिया टेक्नोलॉजी में मास्टर्स और अपेक्स यूनिवर्सिटी जयपुर से बैचलर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन में की है. 
पत्रकारिता में अपना सफर उन्होंने राजस्थान पत्रिका से शुरू किया जहां उन्होंने नेशनल एडिशन और सप्लीमेंट्स जैसे करियर की उड़ान और शी न्यूज के लिए बाय लाइन स्टोरी लिखी. इसी दौरान उन्हें हेलो डॉक्टर शो पर काम करने का मौका मिला. जिसने उन्हें न्यूज़ प्रोडक्शन के लिए नए अनुभव दिए. 

इसके बाद उन्होंने एबीपी नेटवर्क नोएडा का रुख किया. यहां बतौर कंटेंट राइटर उन्होंने लाइफस्टाइल, करंट अफेयर्स और ट्रेडिंग विषयों पर स्टोरीज लिखी. साथ ही वह कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी लगातार सक्रिय रही. कविता गाडरी हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में दक्ष हैं. न्यूज़ राइटिंग रिसर्च बेस्ड स्टोरीटेलिंग और मल्टीमीडिया कंटेंट क्रिएशन उनकी खासियत है. वर्तमान में वह एबीपी लाइव से जुड़ी है जहां विभिन्न विषयों पर ऐसी स्‍टोरीज लिखती है जो पाठकों को नई जानकारी देती है और उनके रोजमर्रा के जीवन से सीधे जुड़ती है.

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