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फांसी देने के कितने मिनट के भीतर चली जाती है जान, क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

फांसी के दौरान रीढ़ की हड्डी टूटने से व्यक्ति सेकंडों में बेहोश हो जाता है और कुछ देर में उसकी मौत हो जाती है. जबकि कानूनी प्रक्रिया के तहत डॉक्टर 30 मिनट बाद ही शव को मृत घोषित करते हैं.

भारत की न्यायिक व्यवस्था में फांसी यानी मृत्युदंड की सजा को केवल दुर्लभतम मामलों में ही लागू किया जाता है. अदालत जब किसी दोषी को सजा-ए-मौत सुनाती है, तो इसके बाद जेल प्रशासन द्वारा एक बेहद जटिल और निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन किया जाता है. फांसी देने के लिए जारी होने वाले डेथ वारंट से लेकर फंदे पर लटकाने और डॉक्टर द्वारा मृत घोषित करने तक हर कदम कानूनी नियमों से बंधा होता है. इसके साथ ही चिकित्सीय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि फंदे पर लटकने के बाद मुजरिम के शरीर में क्या जैविक बदलाव होते हैं और वास्तव में उसकी जान निकलने में कितना समय लगता है. आइए समझ लेते हैं.

ब्लैक वारंट जारी होना और कैदी को मिलने वाली छूट

कानूनी भाषा में फांसी का आदेश ब्लैक वारंट कहलाता है, जिसे आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत अदालत जारी करती है. इसके चारों ओर काले रंग की पट्टी बनी होती है, जिसमें फांसी की तारीख और स्थान दर्ज होता है. वारंट जारी होने के बाद सजा पाने वाले कैदी को कम से कम 14 दिनों का समय दिया जाता है. इस अवधि का मुख्य मकसद कैदी को मानसिक रूप से तैयार करना, काउंसलिंग दिलाना और उसे अपने परिवार के सदस्यों से आखिरी बार मिलने का मौका देना होता है. यदि कैदी अपनी वसीयत या अंतिम इच्छा लिखना चाहता है या किसी धर्मगुरु की मौजूदगी चाहता है, तो जेल अधीक्षक इसकी विशेष व्यवस्था करते हैं.

जेल प्रशासन की पूर्व तैयारियां और ट्रायल

फांसी की प्रक्रिया पूरी करने का संपूर्ण उत्तरदायित्व जेल अधीक्षक का होता है. कैदी को बाकी बंदियों से अलग एक सुरक्षित विशेष सेल में स्थानांतरित कर दिया जाता है. फांसी देने से एक दिन पहले शाम को पूरी व्यवस्था का ट्रायल किया जाता है. फांसी का तख्ता, लीवर और इस्तेमाल में आने वाली खास रस्सी की जांच की जाती है. रस्सी की मजबूती को परखने के लिए कैदी के वास्तविक वजन से डेढ़ गुना भारी रेत की बोरी को फंदे पर लटकाकर देखा जाता है. इसके अलावा जल्लाद को तय तारीख से दो दिन पहले ही जेल परिसर में बुला लिया जाता है.

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फांसी वाले दिन क्या-क्या होता है?

फांसी के तय समय से कुछ मिनट पहले जेल अधीक्षक और उप-अधीक्षक कैदी की सेल में प्रवेश करते हैं. सबसे पहले कैदी के नाम और हुलिए का मिलान करके उसकी आधिकारिक पहचान की पुष्टि की जाती है. इसके बाद जेल अधीक्षक कैदी को उसकी अपनी मातृभाषा में डेथ वारंट पढ़कर सुनाते हैं और उसकी अंतिम बातें रिकॉर्ड की जाती हैं. तत्पश्चात उप-अधीक्षक की निगरानी में मुजरिम को काले कपड़े पहनाए जाते हैं, उसके हाथ पीछे से बांध दिए जाते हैं और पैरों की लोहे की बेड़ियां हटा दी जाती हैं.

फांसी के तख्ते तक का सफर और अंतिम क्षण

तैयारियों के बाद कैदी को छह सुरक्षा वार्डनों और उप-अधीक्षक के कड़े पहरे में फांसी घर की ओर ले जाया जाता है. वहां मजिस्ट्रेट, मेडिकल ऑफिसर और जेल अधीक्षक पहले से उपस्थित रहते हैं. अधीक्षक द्वारा मजिस्ट्रेट को प्रक्रिया की जानकारी देने के बाद कैदी को जल्लाद के सुपुर्द कर दिया जाता है. जल्लाद कैदी को फंदे के ठीक ऊपर खड़ा करके उसके पैर कसकर बांधता है और चेहरे पर काला सूती नकाब डाल देता है. फिर फंदा गले में सेट किया जाता है. जैसे ही जेल अधीक्षक हाथ का इशारा करते हैं, जल्लाद लीवर खींच देता है और फर्श के फट्टे नीचे गिरते ही कैदी कुएं में लटक जाता है.

फांसी के दौरान कितनी देर में मौत हो जाती है?

चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, लॉन्ग ड्रॉप पद्धति से दी जाने वाली फांसी में फंदे का झटका लगते ही रीढ़ की हड्डी (गर्दन की वर्टेब्रा) टूट जाती है. इससे मस्तिष्क का शरीर से संपर्क तुरंत कट जाता है और व्यक्ति कुछ ही सेकंड में पूरी तरह बेहोश हो जाता है. जैविक रूप से मस्तिष्क और दिल की धड़कन पूरी तरह बंद होने में 3 से 10 मिनट का समय लगता है. हालांकि, अगर झटका न लगे तो गला घुटने से मौत में 5 मिनट या उससे अधिक समय लग सकता है.


फांसी देने के कितने मिनट के भीतर चली जाती है जान, क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

शव की जांच, पोस्टमॉर्टम और वारंट की वापसी

फांसी लगने के बाद भी कैदी के शरीर को लगभग 30 मिनट तक फंदे पर ही लटका कर रखा जाता है. इस अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि शरीर में जीवन का कोई भी सूक्ष्म लक्षण या धड़कन न बची हो. 30 मिनट बाद मेडिकल अफसर फांसी के कुएं में जाकर कैदी के शरीर की गहन जांच करते हैं और औपचारिक रूप से उसे मृत घोषित करते हैं. इसके बाद शव को नीचे उतारकर पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा जाता है और जेल अधीक्षक अदालत को वारंट वापस भेजकर सजा पूरी होने की आधिकारिक पुष्टि करते हैं.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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