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क्या होते हैं US बॉन्ड, जिनके बिकते ही धड़ाम हो जाएगी ट्रंप की चौधराहट, यूरोप के पास कितने बॉन्ड?

यूरोपियन देशों के पास कुछ ऐसे अदृश्य हथियार हैं, जिनसे बिना युद्ध के भी अमेरिका को झुकाया जा सकता है. ऐसे में ग्रीनलैंड से पीछे हटना ट्रंप की कमजोरी नहीं, बल्कि यूरोपीय यूनियन का डर बताया जा रहा है.

दुनिया की सबसे ताकतवर अर्थव्यवस्था अमेरिका, एक ऐसे हथियार से डर रही है जिसमें न सेना है, न मिसाइल और न ही युद्ध का शोर. यह हथियार है US बॉन्ड. ग्रीनलैंड को लेकर डोनाल्ड ट्रंप की जिद अचानक क्यों ढीली पड़ गई, इसका जवाब टैरिफ या कूटनीति में नहीं बल्कि बॉन्ड मार्केट में छिपा है. यूरोप के हाथों में मौजूद यही बॉन्ड अमेरिका की आर्थिक नींव तक हिला सकते हैं और दुनियाभर में उसकी चौधराहट को पल में खत्म कर सकते हैं.

ग्रीनलैंड पर ट्रंप का अचानक यू-टर्न क्यों?

डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से ग्रीनलैंड को लेकर आक्रामक रुख अपनाए हुए थे. कभी टैरिफ की धमकी, कभी रणनीतिक दबाव, तो कभी सीधे अधिग्रहण की बात, लेकिन दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान उन्होंने अचानक ग्रीनलैंड मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया. सवाल उठा कि जो नेता दबाव में झुकने के लिए जाने ही नहीं जाते, उन्होंने ऐसा क्यों किया. असल वजह जमीन या बॉर्डर नहीं, बल्कि बॉन्ड मार्केट का डर है. 

क्या होते हैं US बॉन्ड?

अब सवाल है कि आखिर US बॉन्ड क्या होते है? दरअसल यूएस बॉन्ड अमेरिकी सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले ट्रेजरी बॉन्ड होते हैं. जब अमेरिका को खर्च चलाने के लिए पैसे की जरूरत होती है, तो वह ये बॉन्ड बेचता है. दुनिया के बड़े देश, बैंक, पेंशन फंड और निवेशक इन्हें खरीदते हैं. बदले में अमेरिका उन्हें ब्याज देता है. अमेरिका की पूरी अर्थव्यवस्था काफी हद तक इसी उधार प्रणाली पर टिकी हुई है. 

अमेरिका क्यों है बॉन्ड पर निर्भर?

अमेरिका दुनिया का सबसे ज्यादा कर्ज लेने वाला देश है. वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक सरकारी कर्ज 110.9 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा है, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा अमेरिका का है. इस कर्ज को संभालने के लिए अमेरिका लगातार ट्रेजरी बॉन्ड बेचता है. अमेरिका के कुल कर्ज का करीब 25 फीसदी हिस्सा विदेशी सरकारों और संस्थानों के पास है. 

यूरोप के हाथों में ‘बॉन्ड किल स्विच’

यूरोपीय देशों के पास 10 से 12 ट्रिलियन डॉलर तक के अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड मौजूद हैं. यह मात्रा चीन के पास मौजूद बॉन्ड से लगभग बारह गुना ज्यादा है. यही वजह है कि इसे यूरोप का ‘बॉन्ड किल स्विच’ कहा जा रहा है. अगर यूरोपीय देश सामूहिक रूप से इन बॉन्ड को बेचना शुरू कर दें या उनकी खरीद रोक दें, तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भूचाल आ सकता है.

चीन की धमकी से क्यों घबरा गया था अमेरिका?

अप्रैल 2025 में जब ट्रंप ने कई देशों पर टैरिफ लगाए थे, तब चीन ने चेतावनी दी थी कि अगर दबाव बढ़ा तो वह US बॉन्ड बेचना शुरू कर देगा. सिर्फ इस बयान से ही बॉन्ड मार्केट में घबराहट फैल गई थी. हालात संभालने के लिए ट्रंप को खुद सामने आकर कहना पड़ा था कि बॉन्ड मार्केट पूरी तरह सुरक्षित हैं. अब सोचिए, अगर चीन से कहीं ज्यादा ताकत रखने वाला यूरोप ऐसा करे तो असर कितना बड़ा होगा.

यूरोप क्यों नहीं बेच सकता सीधे बॉन्ड?

हालांकि यूरोप सीधे और अचानक US बॉन्ड डंप नहीं कर सकता है. ऐसा करने से यूरोपीय पेंशन फंड, बीमा कंपनियां और हेज फंड भी नुकसान में आ जाएंगे. इसलिए यूरोप की रणनीति सीधी बिक्री की नहीं, बल्कि धीरे-धीरे दबाव बनाने की हो सकती है. 

यूरोप के पास क्या विकल्प हैं?

यूरोप US बॉन्ड की नई खरीद को रोक सकता है. इसके साथ-साथ वह अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड से पैसा निकालकर यूरो बॉन्ड में निवेश बढ़ा सकता है. इससे अमेरिकी बॉन्ड की मांग घटेगी और उनकी यील्ड बढ़ेगी. यील्ड बढ़ने का मतलब है कि अमेरिका के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाएगा. महंगा कर्ज सीधे तौर पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था, बाजार और आम जनता पर असर डालेगा.

बॉन्ड मार्केट हिली तो क्या होगा?

अगर यूरोप की ओर से संकेत भी मिलते हैं कि US बॉन्ड जोखिम भरे हो सकते हैं, तो ट्रेडर्स बिकवाली शुरू कर सकते हैं. इससे अमेरिकी बाजार गिर सकते हैं, ब्याज दरें बढ़ सकती हैं और महंगाई काबू से बाहर हो सकती है. पहले से कर्ज और महंगाई से जूझ रहे अमेरिका के लिए यह हालात बेहद खतरनाक होंगे.

ट्रंप के सामने आगे कुआं पीछे खाई

ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की जिद ने उन्हें मुश्किल स्थिति में डाल दिया है. अगर वह यूरोप के दबाव में पीछे हटते हैं, तो आने वाले मिड टर्म चुनावों में उनकी छवि कमजोर हो सकती है, लेकिन अगर वह जिद पर अड़े रहते हैं और यूरोप जवाबी कदम उठाता है, तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लग सकता है. यही वजह है कि ट्रंप फिलहाल पीछे हटते नजर आ रहे हैं और अगर इस मुद्दे को लेकर ये आगे बढ़ते हैं और यूरोपियन देशों पर और टैरिफ लगाते हैं तो बदले में यूरोपियन देशों ने इनके बॉन्ड तेजी से बेचने शुरू कर दिए तो इनकी इकोनॉमी एक झटके में गिरेगी. और स्थिति ऐसी हो जाएगी कि अगले इलेक्शन में इनको ग्रेट अमेरिका अगेन की बजाए मेक अमेरिका अगेन का नारा लगाना पड़ जाएगा. 

यह भी पढ़ें: पाकिस्तान पर किन-किन देशों का है उधार, जानें सबसे ज्यादा किसके बकाया?

About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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