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न मुख्यमंत्री रहीं और न विधायक, लेकिन अब भी मिलेंगी ममता बनर्जी को ये सुविधाएं; जानें क्यों?

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद ममता बनर्जी अब न मुख्यमंत्री हैं और न विधायक, लेकिन नियमों के तहत उन्हें पेंशन और आजीवन मुफ्त चिकित्सा जैसी सुविधाएं मिलती रहेंगी. आइए जानें उनको और क्या मिलेगा.

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  • ममता बनर्जी पूर्व मुख्यमंत्री के तौर पर सुविधाएं जारी रखेंगी.
  • उन्हें सरकारी नियमों के तहत पेंशन और सुरक्षा मिलेगी.
  • निजी आवास में रहेंगी, चिकित्सा और यात्रा लाभ भी जारी.
  • वेतन न लेने वाली ममता बनर्जी पेंशन स्वीकारेंगी या नहीं?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर हो चुका है. तृणमूल कांग्रेस के 15 साल पुराने शासन का अंत हो गया है और ममता बनर्जी न केवल मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवा चुकी हैं, बल्कि अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर से चुनाव भी हार चुकी हैं. अब वे न तो सूबे की मुखिया हैं और न ही विधानसभा की सदस्य. बावजूद इसके, सरकारी नियमों और सुरक्षा प्रोटोकॉल के चलते उन्हें कई ऐसी सुविधाएं मिलती रहेंगी जो एक आम नागरिक को मयस्सर नहीं होतीं. भारतीय संविधान और राज्य के नियमों के दायरे में ममता बनर्जी को पूर्व मुख्यमंत्री के तहत क्या सुविधाएं मिलेंगी.

संविधान और राज्यों के विशेषाधिकार

भारत के संविधान का अनुच्छेद 164(5) राज्यों को यह अधिकार देता है कि वे अपने मंत्रियों और विधायकों के वेतन, भत्ते और सुविधाओं का निर्धारण खुद करें. पश्चिम बंगाल में यह व्यवस्था ‘द वेस्ट बंगाल सैलरीज एंड अलाउंस एक्ट’ और ‘द वेस्ट बंगाल लेजिस्लेटर (मेंबर्स पेंशन) एक्ट’ के जरिए संचालित होती है. ममता बनर्जी चूंकि लंबे समय तक विधायक और मुख्यमंत्री रही हैं, इसलिए पद पर न रहने के बावजूद विधानसभा सचिवालय के नियमों के तहत वे पेंशन और अन्य सुविधाओं की हकदार बनी रहेंगी.

वेतन और पेंशन 

पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री का वेतन लगभग 2 लाख 10 हजार रुपये और विधायकों का वेतन 1 लाख 21 हजार रुपये प्रति माह के करीब होता है. पद से हटने के बाद ममता बनर्जी एक पूर्व विधायक के तौर पर पेंशन की हकदार हैं. राज्य के नियमों के अनुसार, एक पूर्व विधायक को न्यूनतम 31 हजार रुपये प्रति माह पेंशन मिलती है. यदि कोई सदस्य 5 साल से अधिक समय तक सदन में रहा है, तो उसे हर अतिरिक्त साल के लिए 2500 रुपये की अतिरिक्त राशि दी जाती है. ममता बनर्जी के लंबे कार्यकाल को देखते हुए उनकी पेंशन राशि अच्छी-खासी होगी, हालांकि यह उनकी इच्छा पर निर्भर करेगा कि वे इसे स्वीकार करती हैं या नहीं.

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सुरक्षा का अभेद्य किला रहेगा बरकरार

ममता बनर्जी के लिए सबसे महत्वपूर्ण सुविधा उनकी सुरक्षा है. मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद भी उनकी राजनीतिक सक्रियता और उनके प्रति संभावित खतरों को देखते हुए उन्हें सुरक्षा मिलती रहेगी. गृह मंत्रालय के खतरे के आकलन के आधार पर पूर्व मुख्यमंत्रियों को भारी पुलिस बल और अंगरक्षकों का घेरा प्रदान किया जाता है. यह एक ऐसी सुविधा है जिसे सरकार किसी भी बड़े कद के नेता की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य रूप से प्रदान करती है.

निजी आवास 

अक्सर देखा जाता है कि मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद नेताओं को सरकारी बंगला खाली करना पड़ता है, लेकिन ममता बनर्जी के मामले में स्थिति अलग है. वे मुख्यमंत्री रहते हुए भी कभी सरकारी आवास में नहीं रहीं. वे हमेशा कोलकाता के कालीघाट स्थित अपने छोटे से निजी घर में ही रहीं. पद से हटने के बाद भी वे उसी घर में रहेंगी, इसलिए उन्हें सरकारी बंगले की न तो जरूरत है और न ही इसकी पात्रता को लेकर कोई विवाद होगा.

चिकित्सा सुविधाएं

ममता बनर्जी को ‘वेस्ट बंगाल लेजिस्लेटिव असेंबली रूल्स’ के तहत आजीवन बेहतर चिकित्सा सुविधाएं मिलती रहेंगी. पूर्व विधायकों और उनके जीवनसाथी को सरकारी कर्मचारियों (ग्रुप-ए) के समान स्वास्थ्य लाभ दिए जाते हैं. सरकारी अस्पतालों में उनका इलाज पूरी तरह मुफ्त होगा. इसके अलावा, यदि वे निजी अस्पताल में इलाज कराती हैं, तो सरकारी नियमों के तहत एक निश्चित सीमा तक बिलों के पुनर्भुगतान (रीइम्बर्समेंट) का प्रावधान भी मौजूद है.

रेल यात्रा और अन्य भत्ते

एक पूर्व विधायक होने के नाते ममता बनर्जी को देश भर में यात्रा करने के लिए रेलवे ट्रैवल कूपन (RTC) मिलेंगे. इसके जरिए वे भारतीय रेल के AC-II टियर में मुफ्त सफर कर सकती हैं. इसके साथ ही, नियमों के मुताबिक पूर्व मुख्यमंत्रियों को उनके कार्यों में सहायता के लिए कुछ सीमित सचिवालय स्टाफ, जैसे व्यक्तिगत सहायक या चपरासी की सुविधा भी दी जा सकती है, ताकि वे अपने सामाजिक और राजनीतिक दायित्वों का निर्वहन कर सकें.

वेतन न लेने वाली मुख्यमंत्री का भविष्य

ममता बनर्जी की एक पहचान यह भी रही है कि उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए कभी सरकारी वेतन स्वीकार नहीं किया. वे अपनी किताबों की रॉयल्टी और पेंटिंग्स की बिक्री से होने वाली आय पर ही निर्भर रही हैं. ऐसे में राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या वे पद से हटने के बाद मिलने वाली सरकारी पेंशन और अन्य वित्तीय लाभ लेंगी? संभावना यही जताई जा रही है कि वे अपनी सादगी और सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए पेंशन को भी ठुकरा सकती हैं.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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