Midterm Election Voting: बैलेट पेपर या EVM... अमेरिका में कैसे हो रहा मतदान, भारत से कितना अलग प्रोसेस?
Us Midterm Election Voting: अमेरिका में मतदान की प्रक्रिया भारत से काफी अलग है. वहां मुख्य तारीख से हफ्तेभर पहले अर्ली वोटिंग होती है और सुरक्षा व पारदर्शिता के चलते एकदम अलग तरीका अपनाते हैं.

Us Midterm Election Voting: अमेरिका में मिडटर्म चुनाव के लिए वोटिंग चल रही है और लाखों नागरिक अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं. लोकतांत्रिक देशों में मतदान की व्यवस्थाएं हमेशा से बेहद दिलचस्प रही हैं, और जब दुनिया की दो बड़ी महाशक्तियों यानी अमेरिका और भारत की चुनावी प्रणालियों की तुलना की जाती है, तो कई हैरान करने वाले फर्क सामने आते हैं. अमेरिका में होने वाले चुनावों का यह पूरा ताना-बाना, बैलेट पेपर का दबदबा और आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल भारत के चुनावी मॉडल से काफी अलग है, जिसे समझना हर किसी के लिए बेहद रोचक है. आइए जानें.
अमेरिका में अर्ली वोटिंग की प्रणाली
भारत में जैसे ही चुनाव की तारीख नजदीक आती है, प्रचार थम जाता है और एक ही दिन या कुछ चरणों में तय समय पर वोटिंग होती है. इसके विपरीत, अमेरिकी चुनावी व्यवस्था में अर्ली वोटिंग यानी प्रारंभिक मतदान का प्रावधान है. मुख्य चुनाव की तारीख से कई हफ्ते पहले ही मतदान की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. इसके तहत मतदाता व्यक्तिगत रूप से यानी बूथ पर जाकर या फिर मेल-इन-बैलेट यानी डाक के जरिए अपने मत का प्रयोग बहुत पहले ही कर सकते हैं, जो काफी हद तक भारत की पोस्टल बैलेट व्यवस्था से मिलती-जुलती है.
अमेरिका में बैलेट पेपर का आज भी है दबदबा
तकनीक के मामले में सबसे आगे रहने वाले देश अमेरिका में आज भी अधिकांश जगहों पर लोग कागज यानी बैलेट पेपर के जरिए ही वोट डालते हैं. हालांकि 1800 के दशक के अंत में ही वहां मैकेनिकल वोटिंग मशीनें आ गई थीं, लेकिन आज भी लोग कागजी तरीकों को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं. कोलोराडो, ओरेगन और वाशिंगटन जैसे राज्यों में शत-प्रतिशत मतदान केवल कागजी बैलेट के माध्यम से ही कराया जाता है, जो पूरी दुनिया का ध्यान खींचता है.
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कुछ राज्यों में इलेक्ट्रॉनिक मशीनों का प्रयोग
अमेरिका के सभी राज्य एक ही नियम का पालन नहीं करते हैं, बल्कि हर राज्य को अपने हिसाब से चुनाव कराने की छूट होती है. देश के अधिकांश राज्यों में मतदाताओं के पास कागज और इलेक्ट्रॉनिक दोनों तरह के विकल्प मौजूद रहते हैं. हालांकि, डेलावेयर और जॉर्जिया समेत चुनिंदा राज्यों में ही पूरी तरह से मशीनों के जरिए वोटिंग कराई जाती है, लेकिन इसके बावजूद देश के बड़े हिस्से में आज भी कागजी पर्चियों का ही बोलबाला है.
कागजी वोटिंग से सुरक्षा और जनता का अटूट भरोसा
दुनिया की सबसे बड़ी तकनीकी ताकत होने के बावजूद अमेरिका द्वारा कागजी वोटिंग पर टिके रहने के पीछे सबसे बड़ी वजह सुरक्षा और जनमानस की प्राथमिकता है. चुनाव सहायता आयोग के अधिकारियों का यह मानना है कि कागज के इस्तेमाल से चुनाव प्रक्रिया में लोगों का भरोसा बना रहता है. कागजी मतपत्रों को कोई हैक नहीं कर सकता और इसे पारदर्शिता की दिशा में सबसे सुरक्षित माध्यम माना जाता है, जिससे किसी भी तरह की गड़बड़ी की गुंजाइश खत्म हो जाती है.
यूरोपीय देशों और अमेरिका में बदला रुझान
साल 2000 के दशक के मध्य से अमेरिका के साथ-साथ कई यूरोपीय देशों में भी पेपरलेस इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग की लोकप्रियता में तेजी से गिरावट आई है. इन विकसित देशों का यह मानना है कि चुनाव के दौरान किसी भी प्रकार की गड़बड़ी का पता लगाने और उसका सही ऑडिट करने के लिए कागजी रिकॉर्ड होना सबसे जरूरी है. डिजिटल छेड़छाड़ के खतरों को भांपते हुए इन देशों ने मशीनों के मुकाबले कागजी प्रणाली को ज्यादा सुरक्षित और विश्वसनीय माना है.
अमेरिका में साल 2000 के चुनाव के बाद क्या बदला?
अमेरिकी चुनावी इतिहास में साल 2000 का राष्ट्रपति चुनाव एक बड़ा मोड़ साबित हुआ था, जब मतगणना के दौरान भारी गड़बड़ियां सामने आई थीं. इस घटना के बाद सरकार ने चुनावी सुधारों के लिए तीन अरब डॉलर का भारी-भरकम बजट जारी किया था. कई राज्यों ने इस राशि का उपयोग डायरेक्ट रिकॉर्डिंग इलेक्ट्रॉनिक मशीनें खरीदने में किया, जिसका मुख्य उद्देश्य जनता का विश्वास जीतना था, लेकिन इस कदम का परिणाम पूरी तरह से उम्मीद के विपरीत निकला.
EVM से बढ़ा मतदाताओं का संदेह
नई इलेक्ट्रॉनिक मशीनें आने से चुनावी प्रक्रिया आसान होने के बजाय मतदाताओं के बीच अविश्वास और संदेह और अधिक बढ़ गया. लोगों को यह डर सताने लगा कि इन आधुनिक मशीनों के जरिए चुनावी परिणामों के साथ छेड़छाड़ की जा सकती है. जब भी किसी चुनाव में मामूली विवाद सामने आता, तो जनता का पूरा गुस्सा इन मशीनों की तरफ मुड़ जाता, जिससे सरकार और चुनाव आयोग के सामने एक नई और बड़ी चुनौती खड़ी हो गई.

EVM में फिजिकल रिकॉर्ड की सबसे बड़ी कमी
अमेरिकी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की सबसे बड़ी तकनीकी कमजोरी यह मानी जाती है कि इनमें डाले गए वोटों के सत्यापन के लिए कोई ठोस फिजिकल या कागजी रिकॉर्ड नहीं होता है. इसका सीधा मतलब यह है कि चुनाव अधिकारियों और जनता को पूरी तरह से मशीनों के सॉफ्टवेयर पर ही निर्भर रहना पड़ता है. यदि कोई तकनीकी खराबी आ जाए या डेटा में फेरबदल हो जाए, तो उसका स्वतंत्र रूप से मिलान करना बेहद मुश्किल हो जाता है.
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