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मौत के कितने दिन बाद तक हो सकता है पोस्टमॉर्टम, बॉडी कैसे करते हैं प्रिजर्व?

Post Mortem After Death: मौत के बाद शव का पोस्टमार्टम करने से मृत्यु की सही वजह पता चलती है. आइए जानते हैं कि मृत्यु के कितने समय बाद पोस्टमार्टम किया जा सकता है.

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  • सीबीआई की चार्जशीट ने फोरेंसिक जांच के महत्व को बताया।
  • पोस्टमॉर्टम आदर्श रूप से 48-72 घंटे में, संरक्षित कर बाद में भी।
  • शव को रेफ्रिजरेशन और लेप द्वारा संरक्षित किया जाता है।
  • देरी से जांच कठिन, प्राकृतिक बदलाव साक्ष्य को बदलते हैं।

Post Mortem After Death: मध्य प्रदेश के भोपाल में ट्विशा शर्मा की मौत के मामले में हाल ही में आई सीबीआई की चार्ज शीट ने एक बार फिर से फोरेंसिक जांच पर ध्यान आकर्षित किया है. सीबीआई ने 636 पन्नों की चार्ज शीट दायर की है. साथ ही कहा है कि मौत आत्महत्या का मामला है. एजेंसी ने यह भी कहा है कि दूसरी पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आत्महत्या के निष्कर्ष का समर्थन करती है. लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर मृत्यु के कितने समय बाद वास्तव में पोस्टमार्टम किया जा सकता है. आइए जानते हैं कि एक शव को कैसे संरक्षित किया जाता है.

पोस्टमार्टम कितनी जल्दी किया जाना चाहिए? 

पोस्टमार्टम जिसे ऑटोप्सी भी कहा जाता है आमतौर पर मृत्यु के बाद जितनी जल्दी हो सके किया जाता है. आदर्श रूप से जांच 48 से 72 घंटे के अंदर की जाती है. ऐसा इसलिए क्योंकि मृत्यु के बाद शरीर में कई प्राकृतिक परिवर्तन होते हैं जो फॉरेंसिक निष्कर्ष को प्रभावित कर सकते हैं. हालांकि ऐसा कोई भी सरल नियम नहीं है कि इस अवधि के बाद शव परीक्षण असंभव हो जाता है. अगर शव को ठीक से संरक्षित किया गया है तो फोरेंसिक विशेषज्ञ काफी बाद में इसकी जांच कर सकते हैं. कुछ परिस्थितियों में मृत्यु के महीनों या फिर सालों बाद भी जांच और फोरेंसिक जांच की जा सकती है. मौजूद साक्ष्य की गुणवत्ता और प्रकार काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि शरीर को कैसे संरक्षित किया गया था.


मौत के कितने दिन बाद तक हो सकता है पोस्टमॉर्टम, बॉडी कैसे करते हैं प्रिजर्व?

मृत्यु के बाद शव को कैसे संरक्षित किया जाता है?

एक बार जब भी कोई व्यक्ति मर जाता है तो शरीर की प्राकृतिक अपघटन प्रक्रिया शुरू हो जाती है. इस प्रक्रिया को धीमा करने के लिए अस्पताल, मुर्दाघर और फोरेंसिक सुविधा मुख्य रूप से रेफ्रिजरेशन या फिर रासायनिक संरक्षण पर निर्भर हैं.

कोल्ड स्टोरेज और रेफ्रिजरेशन 

शरीर को अल्पकालिक संरक्षण के लिए रेफ्रिजरेशन सबसे आम तरीका है. किसी भी शव के लिए जिसे कुछ दिनों तक संरक्षित करने की जरूरत होती है मुर्दाघर आमतौर पर 4 डिग्री सेल्सियस से 6 डिग्री सेल्सियस के कंट्रोल्ड तापमान का इस्तेमाल करता है. कम तापमान बैक्टीरिया की गतिविधि और डीकंपोजिशन के लिए जिम्मेदार दूसरी प्रक्रियाओं को धीमा कर देते हैं. 

अगर किसी शरीर को काफी लंबे समय तक संरक्षित करने की जरूरत है तो इस खास फ्रीजिंग सुविधा में काफी कम तापमान पर रखा जा सकता है. परिस्थिति और सुविधा के आधार पर तापमान लगभग -10 डिग्री सेल्सियस से - 20 डिग्री सेल्सियस तक हो सकता है. कोल्ड स्टोरेज स्थायी रूप से डीकंपोजिशन को नहीं रोकता. लेकिन यह प्रक्रिया को काफी धीमा कर सकता है और फोरेंसिक विशेषज्ञों को जांच करने के लिए ज्यादा समय दे सकता है. 


मौत के कितने दिन बाद तक हो सकता है पोस्टमॉर्टम, बॉडी कैसे करते हैं प्रिजर्व?

शवलेपन क्या है?

लंबे समय तक संरक्षण के लिए लेप का इस्तेमाल किया जा सकता है. यह खास तौर से तब इस्तेमाल किया जाता है जब किसी शव को लंबी दूरी तक ले जाने या फिर लंबे समय तक संरक्षित करने की जरूरत होती है. इसके दौरान खास रासायनिक घोल को शरीर के वैस्कुलर सिस्टम में डाला जाता है.  इन्हें समाधानों में आमतौर पर फॉर्मेल्डिहाइड आधारित यौगिक, ग्लूटाराल्डिहाइड और अल्कोहल जैसे संरक्षक होते हैं. 

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क्या होता है जब पोस्टमार्टम में देरी होती है?

देरी से फॉरेंसिक जांच काफी ज्यादा मुश्किल हो सकती है क्योंकि शरीर में प्राकृतिक परिवर्तन होते रहते हैं. सबसे शुरुआती परिवर्तन में से एक है रिगोर मोर्टिस या फिर मरणोपरांत मांसपेशियों का सख्त हो जाना. यह आमतौर पर मृत्यु के कुछ घंटे के अंदर शुरू होता है और शरीर की जांच को प्रभावित कर सकता है. 

एक दूसरी प्रकिया ऑटोलाइसिस है. इसमें कोशिकाओं के अंदर एंजाइम ऊतकों को तोड़ना शुरू करते हैं. बैक्टीरिया भी डीकंपोजिशन में योगदान करते हैं, धीरे-धीरे अंगों और शरीर के दूसरे हिस्सों को प्रभावित करते हैं. 

जैसे-जैसे डीकंपोजिशन बढ़ता है साक्ष्य के कुछ रूपों को पहचानना मुश्किल हो जाता है. मृत्यु के बाद होने वाली रासायनिक और जैविक प्रक्रिया की वजह से रक्त की स्थिति, पेट की सामग्री और विषाक्त पदार्थ के संभावित निशान बदल सकते हैं.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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