इंसान की आंख क्या-क्या देख सकती है, कितने Megapixel के बराबर?
Human Eye VS Megapixel: इंसानी आंख को 576 मेगापिक्सल के बराबर बताया जाता है. यह सिर्फ एक अंदाजा है. आंख और कैमरे की वर्किंग अलग होने के कारण इसकी क्षमता को सिर्फ मेगापिक्सल से नहीं मापा जा सकता.

Human Eye VS Megapixel: इंसान की आंख को अक्सर एक कैमरे की तरह समझा जाता है, लेकिन दोनों का काम करने का तरीका काफी अलग है. आंख लगातार बदलती रोशनी, रंग, गति और गहराई की जानकारी दिमाग तक भेजती है. इसलिए यह कहना कि इंसान की आंख ठीक इतने मेगापिक्सल की है, वैज्ञानिक तौर पर पूरी तरह सही नहीं है. फिर भी कैमरे से तुलना करने के लिए कुछ अनुमान लगाए जाते हैं.
क्या आंख 576 मेगापिक्सल की होती है?
इंटरनेट पर अक्सर कहा जाता है कि इंसान की आंख 576 मेगापिक्सल के बराबर होती है. यह एक लोगो का अनुमान है, लेकिन इसे आंख का वास्तविक या आधिकारिक रेसोल्यूशन नहीं माना जाता. आंख में मौजूद रेटिना पर करीब 12 करोड़ रोड सेल्स और लगभग 60 लाख कोन सेल्स होते हैं. रोड्स कम रोशनी और मूवमेंट समझने में मदद करते हैं, जबकि कोनेस रंग और ज्यादा डीटेल देखने में अहम भूमिका निभाते हैं. इलिए आंख को सीधे किसी कैमरे के मेगापिक्सल से जोड़ना सही तुलना नहीं है.
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आंख एक साथ हर जगह साफ नहीं देखती
हमारी आंख का सबसे साफ देखने वाला हिस्सा फओवेय होता है. जब हम किसी चीज को ध्यान से देखते हैं तो आंख उस चीज की इमेज को फओवेय पर लाने के लिए लगातार छोटी छोटी मूवमेंट करती है. आंख का बीच वाला हिस्सा ज्यादा डिटेल्स और रंगों को पहचानता है, जबकि पेरिफेरल विरसिऑन यानी किनारे की नजर से हमें आसपास की मॉवईमेन्ट और चीजों का अंदाजा मिलता रहता है. यही वजह है कि इंसान सामने की किसी छोटी चीज को साफ देख सकता है, लेकिन उसी समय आंख के किनारे मौजूद चीज की डिटेल्स उतनी स्पष्ट नहीं होती.
आंख कितनी रोशनी देख सकती है?
इंसानी आंख अलग अलग रोशनी के हिसाब से खुद को अजस्ट कर सकती है. तेज धूप से लेकर बहुत कम रोशनी वाली जगह तक आंख की सेन्सिटिविटी बदलती रहती है. अंधेरे में रोड्स ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं, जबकि अच्छी रोशनी में कॉनेस रंग और डिटेल्स देखने में बाद रोल निभाता है. लेकिन इंसान की आंख विजबल लाइट की एक सीमित रेंज ही देख सकती है. आम तौर पर यह लगभग 380 से 700 नॅनोमेटर्स के बीच मानी जाती है. इसके बाहर की अल्ट्रावॉइलेट और इन्फ्रारेड जैसी रोशनी हमें सामान्य तौर पर दिखाई नहीं देती.
दिमाग के साथ काम करती है आंख
आंख में रोशनी पहुंचने के बाद रेटिना उसे इलेक्ट्रिकल सिग्नलस में बदलती है. ये सिग्नलस आप्टिक नर्व के जरिए दिमाग तक पहुंचते हैं. इसके बाद दिमाग इन संकेतों को प्रोसेस करके हमें रंग, आकार, दूरी, मूवमेंट और आसपास की दुनिया का एहसास कराता है. इसलिए आंख की क्षमता को केवल मेगापिक्सल में मापना वैसा ही है, जैसे पूरे कंप्यूटर की क्षमता को सिर्फ उसकी स्क्रीन के पिक्सल से बताना है.
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