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फिटनेस नहीं इस खौफनाक काम के लिए हुआ था ट्रेडमिल का आविष्कार, जानिए इसका इतिहास

आज की तारीख में लोग वजन घटाने के लिए घंटों ट्रेडमिल पर पसीन बहाते हैं, लेकिन जब इसका अविष्कार हुआ था तब यह वजन घटाने के लिए नहीं बनाई गई थी. चलिए इसका इतिहास जानें.

आज के समय में जिम की सबसे लोकप्रिय चीजों में शुमार ट्रेडमिल का इतिहास बेहद हैरान कर देने वाला है. आज जिस मशीन का इस्तेमाल लोग अपनी मर्जी से वजन घटाने, पसीना बहाने और खुद को सेहतमंद रखने के लिए करते हैं, उसका पुराना दौर बेहद खौफनाक था. दरअसल इन मशीनों को लोगों की सेहत सुधारने के लिए नहीं, बल्कि कैदियों को कड़ा सबक सिखाने के लिए और उनको शारीरिक रूप से तोड़ने के लिए बनाया गया था. चलिए इसके बारे में विस्तार से जानें.

खाली बैठे कैदियों को सुधारने की सोच

ट्रेडमिल का इतिहास बहुत पुराना है, जहां शुरुआत में इसका इस्तेमाल जानवरों की मदद से भारी सामान उठाने या निर्माण कार्यों के लिए किया जाता था. लेकिन साल 1817 में ब्रिटेन के एक जाने-माने इंजीनियर विलियम क्यूबिट ने जेलों का दौरा किया. वहां उन्होंने कैदियों को एकदम खाली और सुस्त बैठे हुए देखा. क्यूबिट का मानना था कि कैदियों को सुधारने के लिए उनसे लगातार मेहनत कराना जरूरी है, जिससे कि वे अनुशासन में रहें. इसी सोच के साथ उन्होंने इंसानी ताकत से चलने वाली एक खास मशीन तैयार की, जिसे ट्रेडमिल कहा गया. 

सीढ़ीनुमा पहिए पर लगातार चलना

विलियम क्यूबिट द्वारा बनी शुरुआती ट्रेडमिल आज की बिजली से चलने वाली आधुनिक मशीनों की तरह बिल्कुल नहीं थी. वह लकड़ी और लोहे से बना एक बहुत बड़ा पहिया होता था, जिसके चारों तरफ सीढ़ी जैसे स्टेप्स बने थे. सजा पाने वाले कैदियों को इन सीढ़ियों पर लगातार ऊपर की तरफ कदम बढ़ाना होता था. कैदियों के वजन और उनके चलने की रफ्तार से पूरा पहिया गोल-गोल घूमता था. कई बार एकसाथ 15 से 20 कैदियों को इसपर खड़ा करके एकसाथ घंटो बिना रुके चलने के लिए मजबूर किया जाता था.

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बिना किसी काम के लगातार खुद को थकाना

इस मशीन की सबसे क्रूर बात यह थी कि शुरुआत में कैदियों के द्वारा की जाने वाली इस हाड़तोड़ मेहनत का कोई सीधा फायदा नहीं था. बीबीसी की एक रिपोर्ट की मानें तो इतिहासकार मानते हैं कि यह पूरी तरह से निरर्थक लेकिन बेहद थका देने वाली सजा थी. इसका एकमात्र मकसद कैदियों को शारीरिक रूप से इस कदर तोड़ देना था कि वे दोबारा अपराध करने के बारे में सोचें.

रोजाना छह घंटे और हजारों फीट की चढ़ाई

19वीं सदी के दौरान कैदियों को कठोर कारावास की सजा सुनाई जाती थी, उनको रोज कम के कम छह घंटे इस ट्रेडमिल पर चलना होता था. इतिहासकारों के अनुसार यह रोजाना लगभग हजारों फीट की खड़ी पहाड़ी चढ़ने के जितना जानलेवा मेहनत थी. कई गंभीर मानलों में तो कैदियों को 10 घंटे भी इसपर दौड़ाया जाता था, जिससे उनकी हालत खराब हो जाती थी.

जब ब्रिटेन में लगाई गई पूर्ण पाबंदी

यह काम कैदियों के स्वास्थ्य के लिहाज से हानिकारक था. इस क्रूर मशीन पर चलने से कैदी रोज 2000 कैलोरी बर्न करते थे. जबकि जेल में मिलने वाला घटिया खाना इसकी भरपाई नहीं कर पाता था. जिससे कैदी बीमार रहने लगे. बाद में मानवाधिकार हनन को देखते हुए ब्रिटेन सरकार ने इसपर 1902 में जेल में इसके इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगा दी.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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