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स्वामी विवेकानंद को पहले से पता था कब होगी उनकी मौत? कर दी थी ऐसी भविष्यवाणी

युवाओं के प्रेरणास्त्रोत स्वामी विवेकानंद की आज जयंती है.उनके जीवन के कई प्रेरणादायक वचन है,जिसपर आज के युवा चल रहे हैं.लेकिन क्या आप जानते हैं कि उन्होंने अपनी मृत्य की भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी.

 

हर साल 12 जनवरी को युवाओं के प्रेरणास्त्रोत स्वामी विवेकानंद की जयंती मनाई जाती है. पूरे विश्व के लोग स्वामी विवेकानंद के विचारों से प्रभावित होते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि स्वामी विवेकानंद को पहले से पता था कि उनकी मौत कब होगी. उन्होंने पहले ही इसकी भविष्यवाणी कर दी थी. आज उनकी जयंती पर हम आपको स्वामी विवेकानंद से जुड़े कुछ तथ्य बताएंगे.

स्वामी विवेकानंद का जीवन

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी, 1863 को कोलकाता (पहले कलकत्ता) में हुआ था. उनका घर का नाम नरेंद्र दत्त था. वे काफी तीव्र बुद्धि वाले थे. जब उन्होंने रामक्रष्ण परमहंस की प्रशंसा सुनी तो वो उनके पास कुछ तर्क करने के उद्देश्य से गए थे, लेकिन रामक्रष्ण जी पहचान गए थे कि ये वही शिष्य है जिनका उनको काफी समय से इंतज़ार था. आगे चलकर विवेकानंद जी के गुरु रामकृष्ण ही हुए. स्वामी विवेकानंद ने 25 वर्ष में ही गेरुआ वस्त्र धारण कर लिया था और इसके बाद पैदल ही उन्होंने सम्पूर्ण भारतवर्ष की यात्रा की थी. स्वामी विवेकानंद जी का दृण विश्वास था कि अध्यात्म-विद्या और भारत दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जाएगा. उन्होंने रामकृष्ण मिशन की भारत में और विदेश में कई शाखाएँ स्थापित की थी. इस तथ्य के बारे में कोई रहस्य नहीं है कि स्वामी विवेकानंद की मृत्यु 1902 ई. में हुई थी. लेकिन हम सभी को उनके निधन के पीछे के असली कारणों की जानकारी नहीं है. इस लेख में हम स्वामी विवेकानंद की मृत्यु के साथ-साथ उनके जीवन के जुड़े कुछ अज्ञात पहलुओं से संबंधित विभिन्न सिद्धांतों का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं.

कब होगी उनकी मौत? कर दी थी भविष्यवाणी

स्वामी विवेकानंद को 31 से अधिक बीमारियां थी, जिनमें से एक बीमारी उनका निद्रा रोग से ग्रसित होना भी था. अपने जीवन के अन्तिम दिन स्वामी विवेकानंद ने अपने शिष्यों के बीच शुक्ल-यजुर्वेद की व्याख्या की थी और कहा कि “यह समझने के लिये कि इस विवेकानंद ने अब तक क्या किया है हमें एक और विवेकानंद चाहिए” उनके शिष्यों के अनुसार जीवन के अन्तिम दिन 4 जुलाई 1902 को भी उन्होंने अपनी ध्यान करने की दिनचर्या को नहीं बदला और प्रात: दो-तीन घंटे तक ध्यान किया और ध्यानावस्था में ही अपने ब्रह्मरन्ध्र को भेदकर महासमाधि ले ली थी.उनके निधन की वजह तीसरी बार दिल का दौरा पड़ना था. उनकी अंत्येष्टि बेलूर में गंगा के तट पर चन्दन की चिता पर की गयी थी.इसी गंगा तट के दूसरी ओर उनके गुरू रामकृष्ण परमहंस का सोलह वर्ष पूर्व अन्तिम संस्कार हुआ था. अपनी मृत्यु के समय विवेकानंद की उम्र 39 वर्ष थी. बता दें कि विवेकानंद ने अपनी मृत्यु के बारे में पहले की भविष्यवाणी कर रखी थी कि वह चालीस वर्षों तक जीवित नहीं रहेंगे.इस प्रकार उन्होंने महासमाधि लेकर अपनी भविष्यवाणी को पूरा किया."

विवेकानंद के 10 प्रेरणादायक कथन

कई सुधारों एवं पहल के अगुआ

स्वामी विवेकानंद वेदांत और योग को पश्चिमी विश्व के देशों में प्रारंभिक रूप में स्थापित करने वाले एक प्रमुख व्यक्ति थे.उन्हें 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में हिन्दू धर्म को एक प्रमुख विश्व धर्म के स्तर तक लाने और लोगों में इसके प्रति जागरूकता बढ़ाने का श्रेय दिया जाता है.

हिन्दू धर्म का प्रचार

वह भारत में हिन्दू धर्म के पुनरूत्थान के प्रमुख स्तंभ थे और उन्होंने औपनिवेशिक भारत में राष्ट्रवाद की अवधारणा में महत्वपूर्ण योगदान दिया था.विवेकानंद ने हिन्दू धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी.

प्रसिद्ध भाषण

स्वामी विवेकानंद को शायद उनके उस प्रेरक भाषण के लिए भी जाना जाता है, जो उन्होंने 1893 में शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन में हिन्दू धर्म के प्रचार के दौरान दिया था.उन्होंने अपने भाषण की शुरूआत “अमेरिका के भाइयों और बहनों” के साथ किया था जिसके कारण उस सभा में काफी देर तक तालियाँ बजती रही थी.

एक प्रेरणादायी व्यक्तित्व

वर्तमान समय में सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व के लोग सवामी विवेकानंद को अपना प्रेरणास्रोत मानते हैं और उनके द्वारा बताए गए मार्ग पर चल रहे हैं.

 

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