Iran India Relations: हथियार, घोड़े और कालीन... ईरान से क्या-क्या मंगाते थे मुगल, जानें तब कैसे थे भारत से रिश्ते?
मुगल दौर में ईरान सिर्फ पड़ोसी ताकत नहीं, बल्कि शाही जरूरतों का बड़ा सोर्स था. ईरान से घोड़े, हथियार, कालीन, रेशम, मेवे और शराब भारत आते थे. जानें कि उस वक्त दोनों देशों के कैसे रिश्ते थे?

आज जब ईरान खबरों में जंग और राजनीति की वजह से है, तब इतिहास का एक अहम अध्याय याद आता है. कभी यही ईरान मुगल दरबार का भरोसेमंद साझेदार था. वहां से घोड़े, हथियार, कालीन, रेशम, मेवे और यहां तक कि कवि-कलाकार भी भारत आते थे. तब यह रिश्ता सिर्फ व्यापार का नहीं, बल्कि संस्कृति, भाषा और सत्ता से जुड़ा था. आइए जानें कि मुगल दौर में ईरान और भारत के रिश्ते कितने गहरे थे.
मुगल-ईरान रिश्तों की बुनियाद
मुगल साम्राज्य की जड़ें मध्य एशिया से जुड़ी थीं. बाबर जिस क्षेत्र से आए, वहां फारसी संस्कृति का गहरा असर था. यही वजह रही कि मुगल दरबार में फारसी भाषा और परंपराओं को शुरू से महत्व मिला. जब हुमायूं को शेरशाह सूरी से हार के बाद भारत छोड़ना पड़ा, तब उन्हें ईरान के शाह तहमास्प ने शरण दी थी. शाह ने सैन्य मदद भी की, जिससे हुमायूं दोबारा दिल्ली की गद्दी हासिल कर सके. इस राजनीतिक सहयोग ने दोनों देशों के रिश्तों को मजबूत आधार दिया.
इसके बाद मुगल दरबार में फारसी भाषा प्रशासन की आधिकारिक भाषा बन गई. दरबारी संस्कृति, पहनावा, कला और शाही रस्मों में ईरानी असर साफ दिखने लगा.
ईरान से आने वाले घोड़े और हथियार
मुगल सेना के लिए उच्च नस्ल के घोड़े बेहद जरूरी थे. भारत में अच्छी नस्ल के घोड़ों की कमी मानी जाती थी, इसलिए ईरान और मध्य एशिया से घोड़े आयात किए जाते थे. ये घोड़े युद्ध और शाही सवारी दोनों के लिए इस्तेमाल होते थे. उनकी ताकत और सहनशक्ति की वजह से वे सेना की रीढ़ माने जाते थे.
हथियारों के मामले में भी ईरान का नाम था. फारसी तलवारें, कवच और कुछ खास तरह के इस्पाती हथियार मुगल दरबार में पसंद किए जाते थे. हालांकि मुगल खुद भी हथियार बनाते थे, लेकिन ईरानी डिजाइन और गुणवत्ता का असर दिखता था.
कालीन और रेशम शाही ठाठ की पहचान
ईरानी कालीन उस दौर में दुनिया भर में मशहूर थे. बारीक कारीगरी, रंगों का मेल और जटिल डिजाइन उन्हें खास बनाते थे. मुगल महलों, दीवान-ए-खास और खास मेहमानों के स्वागत में ये कालीन बिछाए जाते थे. यह सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि शाही ताकत और समृद्धि का प्रदर्शन था.
रेशमी कपड़े भी ईरान से मंगवाए जाते थे. बादशाहों की पोशाक, बेगमों के लिबास और विदेशी मेहमानों को दिए जाने वाले तोहफों में इनका इस्तेमाल होता था. इन चीजों पर भारी खर्च होता था, जो शाही खजाने से दिया जाता था.
शराब और अफीम
मुगल दौर में फारसी शराब की खास पहचान थी. जहांगीर को फारसी शराब का शौक बताया जाता है. यह सिर्फ पीने की चीज नहीं, बल्कि विदेशी संस्कृति और शाही रुतबे का प्रतीक मानी जाती थी. अफीम भी सीमित मात्रा में इस्तेमाल होती थी. इसे दवा और आराम देने वाले पदार्थ के रूप में देखा जाता था.
ये सामान कारवां के जरिए महीनों की यात्रा कर भारत पहुंचते थे. रास्ते में सुरक्षा, टैक्स और व्यापारियों की फीस जुड़ने से इनकी कीमत और बढ़ जाती थी. इसलिए यह आम लोगों की पहुंच से बाहर और शाही वर्ग तक सीमित रहता था.
फल, मेवे और विलासिता का सामान
ईरान से अंगूर, सेब, बादाम, पिस्ता और दूसरे सूखे मेवे आयात होते थे. उस समय भारत में ये चीजें हर जगह आसानी से उपलब्ध नहीं थीं. शाही दावतों और त्योहारों में इनका खास इस्तेमाल होता था. इसके अलावा गुलाब जल, जैतून का तेल और कीमती कपड़े भी ईरान से आते थे. ये सामान सिर्फ खाने-पीने या इस्तेमाल की चीजें नहीं थे, बल्कि विदेशी संपर्क और समृद्धि का संकेत माने जाते थे.
ईरान से लोग भी आते थे भारत
ईरान से सिर्फ सामान नहीं, बल्कि विद्वान, कवि, चित्रकार और अधिकारी भी मुगल दरबार में आते थे. फारसी कवियों और लेखकों ने मुगल साहित्य को समृद्ध किया है. इतिहास लेखन और शायरी में फारसी शैली का असर साफ दिखता है.
मिनिएचर पेंटिंग में भी ईरानी शैली का प्रभाव था. अकबर के दरबार में कई ईरानी कलाकार और चिकित्सक थे. हाकिम हमाम जैसे चिकित्सक यूनानी चिकित्सा पद्धति के जानकार थे. इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने मुगल दरबार को अंतरराष्ट्रीय पहचान दी.
राजनीति और संस्कृति का संतुलन
मुगल और ईरान के रिश्ते हमेशा आसान नहीं रहे. कंधार जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों को लेकर दोनों के बीच तनाव भी हुआ, लेकिन कुल मिलाकर सांस्कृतिक और आर्थिक रिश्ते मजबूत बने रहे. मुगल दरबार में फारसी भाषा का वर्चस्व, ईरानी पहनावा, कला और खान-पान इस गहरे संबंध का प्रमाण हैं.
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Source: IOCL

























