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डॉलर से भी मजबूत है इस देश की करेंसी, फिर क्यों नहीं होती दुनियाभर में इस्तेमाल?

अमेरिकी डॉलर दुनिया की सबसे मजबूत और सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली मुद्रा है, जबकि कुवैती दीनार की कीमत डॉलर से अधिक है. इसके बावजूद दीनार की जगह डॉलर का ग्लोबली यूज होता है?

दुनिया में ऐसे कई देश हैं जिनकी करेंसी अमेरिकी डॉलर से कहीं ज्यादा मजबूत है, जिनमें कुवैती दीनार, ओमानी दीनार और बहरीन दीनार शामिल हैं. इन सभी देशों की करेंसी की वैल्यू दुनिया में सबसे ज्यादा है, जिनके सामने डॉलर टिकता नहीं. इसके बावजूद भी इन देशों की करेंसी डॉलर के मुकाबले बहुत छोटी दिखती है. तो सवाल ये उठता है कि जब इन करेंसियों का मूल्य डॉलर से अधिक है, तो फिर ये करेंसियां दुनियाभर में क्यों नहीं चलतीं? और क्यों हर देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार में प्रमुख रूप से डॉलर का ही इस्तेमाल करता है?

आपको यह समझने की जरूरत है कि किसी भी देश की करेंसी की ताकत इस बात पर निर्भर नहीं करती कि उसकी कीमत कितनी है, बल्कि इसमें कई और कारण शामिल होते हैं जैसे देश की अर्थव्यवस्था, स्थिरता और देश की वैश्विक ताकत.

कुवैती दीनार

कुवैत दुनिया के सबसे अमीर देशों में से एक है. यह मिडिल ईस्ट में स्थित छोटा लेकिन समृद्ध मुस्लिम देश है. इसकी करेंसी की बात करें तो एक कुवैती दीनार लगभग तीन अमेरिकी डॉलर के बराबर होता है, यानी दीनार की कीमत डॉलर से लगभग 3 गुना अधिक है. कुवैत दीनार की कीमत इतनी ज्यादा होने का सबसे बड़ा कारण है इसकी तेल उत्पादन क्षमता. कुवैत हर दिन लगभग 2.4 से 3 मिलियन बैरल तेल का उत्पादन और निर्यात करता है, जो उसे दुनिया के शीर्ष तेल उत्पादकों में शामिल करता है. इसके बावजूद डॉलर विश्व बाजार में सबसे ताकतवर मुद्रा बना रहता है और दीनार कहीं नजर नहीं आता. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि कुवैत की जीडीपी अमेरिकी जीडीपी की तुलना में बहुत छोटी है. इसके अलावा और भी कई कारण हैं जिन्हें समझना जरूरी है.

डॉलर सबसे मजबूत करेंसी क्यों है?

सबसे बड़ी जीडीपी: अमेरिका का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) दुनिया में सबसे बड़ा है. अमेरिका की मजबूत अर्थव्यवस्था डॉलर को स्थिरता देती है, इसलिए हर देश विदेशी व्यापार के लिए डॉलर को अपनाता है.

अंतरराष्ट्रीय व्यापार: दुनिया के लगभग सभी देश आयात–निर्यात और अंतरराष्ट्रीय लेनदेन के लिए अमेरिकी डॉलर का उपयोग करते हैं. कच्चे तेल और सोने जैसी जरूरी चीजों की कीमत भी डॉलर में तय होती है. इसी वजह से डॉलर की वैश्विक पकड़ सबसे मजबूत है.

वैश्विक वित्तीय संस्थानों की भूमिका: अमेरिकी डॉलर दुनिया की प्रमुख वित्तीय संस्थाओं की आधिकारिक मुद्रा है. IMF (अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष) और वर्ल्ड बैंक अपने अधिकांश वित्तीय लेनदेन डॉलर में करते हैं, जिससे डॉलर की स्थिति और मजबूत होती है.

ऐतिहासिक कारण: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं कमजोर हो गई थीं. इसी दौरान 1944 में ब्रेटन वुड्स समझौता हुआ. इसमें तय किया गया कि वैश्विक व्यापार को सरल बनाने के लिए अमेरिकी डॉलर को मुख्य अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनाया जाएगा. इसके बाद दुनिया के लगभग हर देश ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर रखना शुरू कर दिया.

अमेरिकी वित्तीय संगठन: संयुक्त राज्य अमेरिका के पास दुनिया के सबसे बड़े वित्तीय संस्थान हैं जैसे न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज (NYSE) और फेडरल रिज़र्व. ये संस्थान डॉलर की वैश्विक मांग और उसकी स्थिरता को बनाए रखते हैं.

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